पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ पाकदर्पणम्
व्यञ्जनस्य च भेदश्च चतुर्थः स प्रपञ्चकः ।
पञ्चमो मांसशाकोऽत्र सप्रभेदश्च कथ्यते ॥ २९ ॥
ग्रन्थ के उपक्रम विषय--सर्वप्रथम ओदन (भात, रोटी, विविध अन्न आदि
के विविध भेदों को कहेंगे । दूसरा सूप (दाल) के भेद, तीसरा घी के भेद,
चौथा सप्रपञ्च (विधिविधान पूर्वक) व्यंजनों के भेद तथा पाँचवां मांस एवं
शाक आदि के भेदों को कहेंगे ॥ २८-२९ ॥
षष्ठोऽत्र भक्ष्यभेदश्च सप्तमः पायसस्य च ।
रसायनश्चाष्टमोऽत्र नवमः पानभेदतः ॥ ३० ॥
दशमं यूषभेदश्च घृताद्यन्नप्रभेदकः ।
एकादशश्च लेह्यस्य भेदो द्वादशकस्तथा ॥ ३१ ॥
त्रयोदशन्तु पानीयं क्षीरभेदश्चतुर्दशः ।
दधिभेदः पञ्चदशः षोडशः तक्रभेदकः ॥ ३२ ॥
छठवाँ भक्ष्य प्रकार के भेद, सातवाँ पायस (खीर) के भेद, आठवाँ रसायन
भेद, नवाँ पानक भेद, दसवाँ यूष का भेद, ग्यारहवाँ घृतपक्वादि अन्न के भेद,
बारहवाँ लेह्य पदार्थों का भेद, तेरहवाँ विविध प्रकार के जल का भेद, चौदहवाँ
दूध का भेद, पन्द्रहवाँ दही का भेद तथा सोलहवाँ तक्र का भेद कहा गया
है ॥ ३०-३२ ॥
षोडशो मुख्यभेदश्च दृष्टान्तेन प्रदर्शितः ।
मृग्योऽवान्तरभेदश्च तत्र तत्र महद्धिया ॥ ३३ ॥
प्रधान सोलह भेदों को दृष्टान्त के साथ दिखाया गया है । उसके सम्बन्ध में
अपनी विशद बुद्धि के अनुसार अवान्तर भेदों को भी विज्ञजन खोज करें ॥ ३३ ॥
तत्र तत्र यथायोग्यो वादस्तु कथितो मया ।
पानीयनामदेशे हि पानीयस्य समुद्भवः ॥ ३४ ॥
पुनश्चित्रं च कथितं पायसं चाम्लसम्भवम् ।
एवमादीनि चित्राणि कार्याणि विविधानि च ॥ ३५ ॥
पाकोत्थितान्यपाकानि कर्तव्यानि मनीषिभिः ।
किमत्र बहुनोक्तेन युक्तं चैकं शृणु प्रभो ! ॥ ३६ ॥
पूर्वोक्त सोलह प्रकार के पाकों के सम्बन्ध में मैंने यथायोग्य विवेचन किया
है । पानीय नामक देश में ही पानी का उद्भव बताया गया है। इसके बाद चित्र-
पाक का वर्णन है और आम्लवस्तु से पायस निर्माण का वर्णन है। इस तरह अनेक
नलविरचितम् ७
प्रकार के चित्र-विचित्र विधियों का वर्णन किया गया है। विद्वानों को विना
पकाये ही पाक बनाना चाहिए। इस सम्बन्ध में अधिक कहना भी ठीक नहीं है।
हे राजन् ! वहाँ पर एक उपयोगी विषय को सुनें ॥ ३४-३६ ॥
यस्मिन् काले देशकाले दयाभावो हि भूमिप ! ।
तथा तस्मिन्नुपायेन कथितस्तस्य सम्भवः ॥ ३७ ॥
हे राजन् ! जिस समग्र तथा जिस काल में दयाभाव (दयालुता) रहता है,
उस समय तथा उस काल में उसका उत्पादन उसी प्रकार के उपायों से कहा
गया है ॥ ३७ ॥
अन्नस्य प्राशस्त्यनिरूपणम्
सर्वेषां प्राणिनां प्राणमन्नं प्रथममुच्यते ।
ब्रह्मरूपमिदं सम्यक् त्रिषष्टिरसरूपकम् ॥ ३८ ॥
दोषाष्टकेन रहितमाहरेदन्नमुत्तमम् ।
अन्न की प्रशंसा—सभी प्राणियों का प्राण सर्व प्रथम अन्न ही कहा गया
है, अच्छी तरह तिरसठ रस वाला यह अन्न ब्रह्म स्वरूप है अतः आठ दोषों से
रहित उत्तम अन्न को ग्रहण करना चाहिए ॥ ३८ ॥
अन्नगतदोषाणां विवेचनम्
दोषस्वरूपमज्ञात्वा तद्राहित्यं कथं लभेत् ॥ ३९ ॥
अनिन्द्यत्वाददोषत्वाद् दोषो नास्ति तदाश्रयः ।
अतोऽष्टरूपो दोषो हि नास्त्यत्र श्रुतिमानतः ॥ ४० ॥
अन्न सम्बन्धी दोषों का विवेचन—अन्न सम्बन्धी दोषों की जानकारी के
बिना अन्नगत दोषों को कैसे दूर किया जा सकता है। क्योंकि अन्न अनिन्द्य एवं
दोषरहित है । अतः उसमें दोष नहीं रह सकते, साथ ही शास्त्रनिर्देश के अनुसार
उसमें आठ दोष नहीं हैं ॥ ३९-४० ॥
अन्नेऽष्टदोषसम्भव निरूपणम्
विद्यते ह्यष्टदोषो हि प्रत्यक्षेण प्रमादतः ॥
अन्न में आठ दोषों का उत्पत्ति-निरूपण—अन्न में प्रमाद (असावधानी)-
वश प्रत्यक्ष कारणों से अन्न में आठ दोष उत्पन्न होते हैं ॥ ४०½ ॥
के ते दोषाः सदाविष्टाः प्रत्यक्षेण बलीयसा ॥ ४१ ॥
वे कौनसे दोष हैं जो बलवान् प्रत्यक्ष कारणों से अन्न में उत्पन्न होते हैं ॥४१॥