पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाकदर्पणम्
ततो हविर्भुजः प्रादादग्निसिद्धिं निरिन्धनीम् ॥ १६ ॥
ततोऽन्नग्ससिद्धिंश्च सूर्य्यपुत्रश्च लौकिकीम्।
वरुणो जलसिद्धिञ्च विना यत्नेन सत्तम ॥ १७ ॥
इति विद्याः सुरास्ते तु दत्त्वा निजपदं ययुः ।
इति तस्य वचः श्रुत्वा राजा त विस्मितोऽब्रवीत ॥ १८ ॥
इन्द्रादि लोकपालों के द्वारा दिये वरों का निरूपण—हे राजन् ! सबसे
पहले इन्द्र संतुष्ट होकर स्वयं अदृश्यसिद्धि (अदृश्य विद्या) को दिये। इसके
बाद अग्निदेव बिना लकड़ी के ही अग्नि उत्पन्न कर देने की शक्ति (अग्निसिद्धि)
को दिये। तत्पश्चात् सूर्य पुत्र (यमराज) लौकिक अन्नसिद्धि (अनेक प्रकार के
अन्न-व्यञ्जनादि को बनाने की शक्ति) को दिये। इसके बाद वरुण बिना प्रयत्न के
ही जल उत्पन्न करने की शक्ति (जलसिद्धि) को दिये। इसप्रकार वे देवगण इन
विद्याओं को देकर अपने धाम को चले गये। इस प्रकार उनके वाक्यों को सुनकर
राजा ऋतुपर्ण आश्चर्यित होकर नल से बोले ॥ १६-१८ ॥
इयं त्वलौकिकी विद्या त्वद्गता नरदुर्लभा ।
अतो नरहितार्थाय निदर्शनमुखेन ताम् ॥ १९ ॥
दर्शनं कुरु तत्त्वेन दृष्टेः कौतूहलं हि नः ।
इत्युक्तवति राजेन्द्र नैषधः पुनरब्रवीत् ॥ २० ॥
तुम्हारे अन्दर मनुष्यों के लिये दुर्लभ यह अलौकिकी विद्या प्राप्त हुई है।
अतः इस विद्या को मनुष्यों के हित के लिये प्रत्यक्ष रूप से विधिपूर्वक प्रदर्शन
कीजिये। हम लोगों को वह विद्या देखने के लिए बहुत बड़ी उत्कण्ठा है। इस
प्रकार राजा ऋतुपर्ण के कहने पर राजा नल फिर बोले ॥ १९-२० ॥
नलेन स्वनिर्मितग्रन्थविषयवर्णनम्
अस्मिन्नर्थे मयाऽकारि ग्रन्थो लोकहिताय च ।
लोकपालप्रसादेन पाकदर्पणनामतः ॥ २१ ॥
तस्यावलोकनेनैव दृश्यन्ते विविधाः क्रियाः ।
सूदस्य लक्षणं तावद् वक्ष्ये संक्षेपतः प्रभो ॥ २२ ॥
राजा नल के द्वारा स्वनिर्मित ग्रन्थ के विषय का वर्णन—राजा ऋतुपर्ण के
वाक्य को सुनकर राजा नल ने कहा कि अन्नसिद्धि के विषय में मैंने सभी लोगों
के कल्याणार्थ लोकपालों के प्रसाद से पाकदर्पण नामक ग्रन्थ बनाया है। उस ग्रन्थ
को देखने से ही सभी अनेक प्रकार के पाकनिर्माण सम्बन्धी क्रियाओं का ज्ञान हो
जाता है, हे राजन् ! सर्वप्रथम रसोइया का लक्षण संक्षेप में कहता हूँ ॥ २१-२२ ॥
नलविरचितम्
सूदस्य लक्षणम्
स्वदेशसम्भवः प्राज्ञः सर्वलक्षणलक्षितः ।
सदाचारसमायुक्तो विशिष्टकुलसम्भवः ॥ २३ ॥
शान्तो दान्तो दानशीलो राजपूज्यो शुचिस्मितः ।
स्वदारनिरतः शुद्धः परदारविवर्जितः ॥ २४ ॥
मितभाषी सदा दाता दयालुश्च सुभाषितः ।
धातुज्ञो देशकालज्ञो वयोऽवस्थादिविद्बुधः ॥ २५ ॥
रसोइया का लक्षण—रसोइया को निम्न लक्षणों से युक्त होना चाहिए।
जिस देश में काम करता हो वहीं का उत्पन्न हो, विद्वान् हो, सभी अच्छे लक्षणों
से युक्त हो, सदाचारी हो, अच्छे विशिष्ट कुल में उत्पन्न हो, शान्त स्वभाव का
हो, इन्द्रियों को वश में किया हो, दान प्रवृत्ति वाला हो, राज्य परिवार का
विश्वासपात्र हो, पवित्र हो, अपनी धर्मपत्नी से ही सम्बन्ध रखने वाला हो, शुद्ध
हो, परायी स्त्री से सम्बन्ध न रखता हो, थोड़ा बोलने वाला हो, हमेशा दान देने
वाला हो, दयालु हो, मृदुभाषी हो, धातुओं (अनेक प्रकार के लौह, ताम्र आदि
धातुओं) की जानकारी रखनेवाला हो, देश-विदेश तथा कालविशेष की जानकारी
रखने वाला हो, आयु एवं अवस्था आदि का जानकार हो ॥ २३-२५ ॥
परिवेशकस्य लक्षणं विधिश्च
प्रक्षाल्य चरणौ हस्तौ कृतशौचविधिस्तदा ।
सम्पूर्णकामो निष्ठात्मा राजभोजनकालवित् ॥ २६ ॥
राज्ञश्चावसरं ज्ञात्वा पाकादींश्च प्रदापयेत् ।
यदा पथ्यं भवेद्राज्ञः क्रमेण प्रक्षिपेच्च तान् ॥ २७ ॥
परोसने वाले का लक्षण तथा विधि—रसोइया सभी शौच क्रिया (उठने
से लेकर पूजन पर्यन्त शौच विधि) को सम्पन्न कर, हाथ-पैर को अच्छी तरह
धोकर, संतुष्ट मन से निष्ठावान् होकर राजा के भोजन काल को जानने वाला,
राजा के भोजन समय को जानकर भोजन सामग्री को राजा के सामने रखे।
जब जो पदार्थ राजा के लिए हितकर हो उन पदार्थों को भोजन¹परिवेशण क्रम से
रखे ॥ २६-२७ ॥
ग्रन्थस्योपक्रमणिका
ओदनस्य प्रभेदोऽत्र प्रथमं कथ्यते मया ।
द्वितीयं सूपभेदश्च सर्पिषश्च तृतीयकम् ॥ २८ ॥
१. विविध भोजन-सामग्री रखने का क्रम आगे के श्लोक में देखें।