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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 69 में से

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पृष्ठ 13

पाकदर्पणम् (पृष्ठ २)

पाकदर्पणम्
सर्वेषां व्यञ्जनानाञ्च संस्कारं लवणादिभिः ।
एभिर्विना च तोयैश्च चित्रपाकं रसावहम् ॥ ५ ॥
सभी व्यञ्जनों का संस्कार लवणादिरसद्रव्यों से होता है। इन नवों के
बिना तथा जल से भी पाक होता है और चित्रपाक उत्तम रस लाने वाला
होता है ॥ ५ ॥
यानि शिल्पानि लोकेऽस्मिन् यच्चान्यदपि दुर्लभम् ।
मया कृतरसः किञ्च सुधाताभ्यश्च दुर्लभः ॥ ६ ॥
इस संसार में जितने भी शिल्पी कर्म हैं और भी जो कुछ दुर्लभ हैं तथा
पाकसम्वन्धित शिल्पकर्म हैं उन रसपाककार्य को भी मैंने बनाया है। वह कार्य
अच्छे धातुओं (पदार्थों) से भी बनना दुर्लभ है ॥ ६ ॥
भुज्यते येन यत्नेन तस्यारोग्यं भवेद्ध्रुवम् ।
वातजं पित्तजं रोगं श्लेष्मजं हन्ति सर्वदा ॥
सकृन्निषेवणेनैव त्रिपुरं त्र्यम्बको यथा ॥ ७ ॥
मेरे द्वारा बनाये हुए सरस पाक को जो व्यक्ति प्रयत्न पूर्वक खाता है
उसको अवश्य ही आरोग्य प्राप्त होता है। एक ही बार सेवन करने से वातज,
पित्तज तथा कफज रोगों को हमेशा नष्ट करता है। जैसे शंकर जी त्रिपुर नामक
राक्षस को एक ही बार में नष्ट कर दिये थे ॥ ७ ॥
अजीर्णदोषादुत्पन्नं ज्वरं माहेश्वरादिकम् ।
हृद्रोगं राजयक्ष्मादिरोगं शूलादिकं ततः ॥ ८ ॥
भगन्दरातिसारञ्च सन्निपातादिकं तथा ।
इत्थमेवादिकं सर्वं रोगजालं निहन्ति सः ॥ ९ ॥
यह रसपाक अजीर्ण आदि दोष से उत्पन्न माहेश्वर¹आदि ज्वर, हृदयरोग,
राजयक्ष्मा, श्वास, कास आदि रोग, शूल, उदरशूल, अंगशूल आदि रोग,
भगन्दर, अतिसार तथा सान्निपातिक रोग, इसी प्रकार के सभी रोग समूहों को
नष्ट करता है ॥ ८-९ ॥
सर्वं यतिष्ये तत्कर्तुं ऋतुपर्ण ! भरस्व माम् ।
इत्युक्त्वां वसतीं चक्रे ऋतुपर्णस्य वेश्मनि ॥ १० ॥
हे राजा ऋतुपर्ण ! पूर्वोक्त सभी प्रकार के कर्मों को करने का मैं प्रयत्न

१. दक्षापमानसंक्रुद्धरुद्रनिःश्वाससम्भवः ।
ज्वरोऽष्टधा पृथग्द्वन्द्वसंघातागन्तुजः स्मृतः ॥
(मा० नि० ज्व० नि० १)


नलविरचितम् (पृष्ठ ३)

नलविरचितम् ३
करूँगा, आप मेरा भरण-पोषण करें। यह कहकर नल राजा ऋतुपर्ण के घर में
रहने लगे ॥ १० ॥
नल-ऋतुपर्णयोः सम्वादः
ऋतुपर्ण उवाच
तं कदाचित्समाहूय स राजा राजसत्तमः ।
एताः कलाः कुतो लब्धास्त्वमस्माकं वद प्रियम् ॥ ११ ॥
नल तथा राजा-ऋतुपर्ण का सम्वाद—किसी समय राजाओं में श्रेष्ठ राजा
ऋतुपर्ण नल को बुलाकर पूछे कि हे नल तुम इन कलाओं को कहाँ से प्राप्त किये
हो, इस प्रिय कथा को हमसे कहो ॥ ११ ॥
नल उवाच
श्रुत्वा तद्वचनं साधुस्तद्वक्तुमुपचक्रमे ।
शृणु राजेन्द्र! विद्याया निदानं मम तत्त्वतः ॥ १२ ॥
राजा के वचन को सुनकर नल बोले—हे राजन् ! मेरे इन विद्याओं को प्राप्त
करने का आदि कारण विधिवत् सुनें ॥ १२ ॥
स्वयम्बरार्थं वैदर्भ्याः समायाताः सुरेश्वराः ।
अहमप्यागतस्तत्र दृष्ट्वा दृष्टश्च तैः पथि ॥ १३ ॥
हे राजन् ! वैदर्भी (दमयन्ती) के स्वयंवर के लिये सुरेश्वर (इन्द्रादि)
देवता आये। वहाँ पर वे लोग मार्ग में ही सौभाग्यवश मुझे देख लिये ॥ १३ ॥
मामूचुस्तत्र वै देवा वञ्चनार्थमिदं वचः ।
अस्मान् वै पुरुषव्याघ्र यथा भैमी वरिष्यति ॥ १४ ॥
तथा कुरु वतेत्युक्ते स्वस्ति तेऽस्त्विति चाब्रुवन् ।
वे इन्द्रादिक देवता वहाँ पर ठगने के लिये मुझसे कहे कि हे पुरुषों में श्रेष्ठ
नल ! दमयन्ती हम लोगों को ही जैसे वरण करे वैसा करें। 'करूँगा' ऐसा कहने
पर 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा बोले ॥ १४ ॥
दूतरूपं समाभृत्य मामकार्थी यथार्थतः ॥
ते नैषधं समालोक्य वरान् ददुरनुत्तमान् ॥ १५ ॥
इन्द्रादि देवगण मेरे स्वीकार करने पर दूत के रूप में यथार्थ में मुझे ही
खोजनेवाले मुझ नल को देखकर उत्तम वरों को दिये ॥ १५ ॥
इन्द्रादि लोकपालप्रदत्तवरनिरूपणम्
अदृश्यसिद्धिं प्रथममिन्द्रस्तुष्टोऽददात्स्वयम् ।
३ पा.द.