पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना
पुरातनवाङ्मय मानवोचित सुख-साधन सामग्री को संजोने में कुछ कसर
नहीं रक्खा है। या यों कहना चाहिए कि वेद, उपनिषद्, पुराण, धर्मशास्त्र
आदि ग्रंथ मानव को सर्वोत्तम सुख शान्ति की ओर प्रेरित करते हैं। जहां पर
परम श्रेय की प्राप्ति के लिए शास्त्र उपदेश देते हैं वही व्यवहार जगत् में
मनुष्य के ऐहिक सुख को प्राप्त कराने में कुछ उठा नहीं रखते। पहले मनुष्य को
स्वस्थ्य रहना है तभी परम श्रेय की प्राप्ति हो सकती है। "धर्मार्थकाममोक्षाणा-
मारोग्यं मूलमुत्तमम्" इस सूक्ति को किसने नहीं दुहराया है और आरोग्य के बिना
किस ने परम पद को प्राप्त किया है।
महर्षि चरक ने स्वस्थवृत्त उपदेश के साथ उपस्तम्भत्रय को विधिवत्
पालन करने की ओर संकेत किया है। "त्रय उपस्तम्भाः आहारो निद्रा ब्रह्मचर्य-
मिति"। स्वस्थ रहने के लिये सभी साधनों में आहार का प्रमुख स्थान है।
उसका विविध निर्माण, उपयुक्त समय, उपयोग, प्रकार आदि के प्रकार का ज्ञान
स्वस्थ वृत्त के साथ होना आवश्यक है।
प्रस्तुत ग्रन्थ नलविरचित 'पाकदर्पण' में स्वस्थ वृत्त के विवेचन के साथ
आहार सम्बन्धी पाक निर्माण प्रकार का भी विस्तृत निरूपण करने में ग्रन्थकार
ने बहुत बड़ा प्रयास किया है। स्वस्थ वृत्त में दिनचर्या, रात्रिचर्या, ऋतुचर्या
आदि सभी विषयों पर स्पृहणीय प्रकाश डाला गया है। ग्रन्थकार ने दिन-रात
में किस प्रकार छः ऋतुओं का परिभ्रमणचक्र चलता रहता है इस बात को
बड़ी बारीकी के साथ प्रस्तुत किया है। इनके अनुसार अन्न में ६३ रस होते हैं
और असुत, पिच्छल, अशुचि शुष्कान्न, दग्धान्न, विरूपान्न, क्वथितान्न आदि आठ
दोष होते हैं। जिनका सलक्षण वर्णन मिलता है। आगे चलकर उन्होंने पाक के
विविध निर्माण प्रकार को स्पष्ट वर्णन किया गया है। भात बनाने में कितना जल
कितना चावल एवं कितने आँच पर बनाना चाहिए इसको दर्शाया है जिसकी
अनुकृति आजकल कदम-कदम पर देखी जा रही है। पाक निर्माण में मांस,
मछली, पुलाव आदि का निर्माण प्रकार उपयोग एवं उसके लाभ का भी वर्णन
है। विविध दालों का नाम, निर्माण प्रकार एवं उनके गुणों का भी वर्णन है।