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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

२२ पाकदर्पणम्
प्रकार के मूँग की दाल लेकर बटलोही में पकावे । अच्छी तरह दाल के पक जाने
पर सेन्धानमक तथा हींग छोड़ दे । विद्वान् पाचक इस प्रकार के दाल को कर्पूर
आदि सुगन्धित द्रव्य से सुवासित कर ले । इसके बाद कलछुल से धीरे चलाकर
दाल को राजा के लिये दे । यह स्वादिष्ट दाल संसार के हित के लिये कहा गया
है । अमृत समान दाल सद्यः वीर्यवर्द्धक है और देवताओं को भी दुर्लभ है ।
सूपप्रशस्तिः
माषादिसामन्तनृपैरनेकैः रम्भाप्रसूनप्रमुखैर्बलौघैः ।
शाल्यन्नसिंहासनगो विभाति घृतात्तपत्रः खलु सूपभूपः ॥ १४१ ॥
सूप (दाल) की प्रशंसा—माष (उड़द) अरहर आदि रूप अनेक सामन्त
राजाओं से तथा केला, पुष्प आदि रूप प्रमुख सेनासमूहों से घृत रूप छत्र से युक्त
सूपराज मूंग की दाल शालि (जड़हन चावल का) भातरूपी सिंहासन पर स्थित
होकर सु शोभित हो रहा है ॥ १४१ ॥
तेमनतक्रनिर्माणविधिर्गुणाश्चः
सप्रभेदः सूपभेदः कथितः कथ्यते खलु ।
जातितोलुलितं तक्रं तिलतैलेन संयुतम् ॥ १४२ ॥
सुगन्धगुणसंयुक्तं कुसुमैरधिवासयेत् ।
मुहूर्त्तमात्रं संस्थाप्य कुसुमानि परित्यजेत् ॥ १४३ ॥
लशुनार्द्रकयोः खण्डान् पुनस्तत्र विनिक्षिपेत् ।
कुम्भीदलं च धान्याकं शुण्ठीचूर्णं च निक्षिपेत् ॥ १४४ ॥
सैन्धवं च यथा योग्यं जम्बीराम्लञ्च निक्षिपेत् ।
रामठं तत्र निक्षिप्य कुर्यादालोडनं बुधः ॥ १४५ ॥
चुल्यां पचेच्च तं तक्रं दवघट्टनपूर्वकम् ।
पाकार्थं निक्षिपेत्तत्र शुचिभिन्नमरीचिकाः ॥ १४६ ॥
तद्यावतां कटु भवेत्तावत् पाकावतारयेत् ।
प्रवणीभाण्डमारोप्य चुल्यामस्यां प्रदापयेत् ॥ १४७ ॥
दर्वीविघट्टनं कृत्वा तेमनं तत्र निक्षिपेत् ।
पिधानेन समाच्छाद्य तन्मुखं तत्पुनः पचेत् ॥ १४८ ॥
प्रकृतेऽस्मिन् तदादाय मातुलुंगदलं क्षिपेत् ।
कर्पूरं मृगनाभि च केतकी कुसुमं न्यसेत् ॥ १४९ ॥
स्वादु पथ्यं लघुतरं तेमनं तत्र सम्भवम् ।
आरोग्यदं रोगहरं वातश्लेष्महरं शुभम् ॥ १५० ॥
नलविरचितम् २३
तेमन तक्र (मट्ठा) बनाने की विधि तथा गुण—सूप (दाल) के विविध
भेद को मैंने कहा । अब तेमन तक्र को कहता हूँ। अच्छी तरह मथा हुआ तक्र
(मट्ठा) तिल तैल के साथ मिला दे और सुगन्ध से युक्त कर फूल से सुवासित
कर दे । पुष्पों को मट्ठा में थोड़ा देर रखकर निकाल दे । इसके बाद लहसुन
तथा अदरक के टुकड़ों को उसमे छोड़ दे । पुनः कट्फल का पत्र, धनिया तथा
सोंठ का चूर्ण, उचित मात्रा में सेन्धानमक तथा जम्बीरी नीबू छोड़ दे । इसके
बाद उसमें हींग छोड़कर बुद्धिमान् पाचक अच्छी तरह मिला दे । इन द्रव्यों से
युक्त तक्र को कलछुल से चलाते हुए चुल्ही के ऊपर पकाये । उसमें पाक के लिये
शुद्धमरिच का चूर्ण छोड़ दे । जब तब वह कड़ुआ न हो जाय तब तक पाक करे ।
वटलोही में रखकर चूल्हे के ऊपर रखे । कलछुल से चला कर उसमें "तेमन"१
छोड़ दे, और ढक्कन से उसका मुँह ढँक कर पुनः पाक करें । अच्छी तरह परि-
पाक हो जाने पर विजोरा नीबू का दल छोड़ दे इसके बाद उसमें कर्पूर, कस्तूरी
तथा केवड़ा का फूल रक्खे । इस प्रकार तैयार "तेमन तक्र" स्वादिष्ट, पथ्यकारक
तथा हल्का होता है। यह आरोग्यप्रद, रोगनाशक, वात-कफ को दूर करनेवाला
तथा कल्याण कारक होता है ॥ १४२-१५० ॥
'खलतक्रनिर्माणविधिर्गुणाश्च
पुनर्नवा तथा वह्निघजाजीतक्रसमुद्भवम् ।
वासितं घनशारेण वातश्लेष्महरं शुभम् ॥ १५१ ॥
खलं गुल्महरं शीघ्रं पुष्पैश्च सुमनोहरैः ।
अशीतिवातजान् रोगान् जठरानलवृद्धिकृत् ॥ १५२ ॥
खल तक्र बनाने की विधि तथा गुण—पुनर्नवा, चित्रक, अजाजी (जीरा)
तथा तक्र से बनाया हुआ कर्पूर तथा मनोहर पुष्पों से सुवासित किया हुआ "खल
तक्र"२ शीघ्र ही गुल्म रोग को दूर करता है। यह अस्सी प्रकार के वात रोगों
को नाश करता है तथा जाठराग्नि को प्रदीप्त करता है ॥ १५१-१५२ ॥
१. व्यञ्जनं सूपशाकादि मिष्ठान्न तेमनं स्मृतम्—(रा० नि० २०) ।
२. मालवे व्यञ्जनविशेषः । मातुधानीयकपुष्पैर्योषितगुणः स "खल" इत्युच्यते ।
फलमूलैर्धनादानं व्यञ्जनं पाकतो घनम् । लेहवत् खल इत्यन्ये दोषलाः स्व
स्व योनिवत् ।। कल्को विल्वशलाटूनां तिलकल्कश्च तत्समः । दध्नः सरोऽम्लः
सस्नेहः खलो हन्ति प्रवाहिकाम् । श्रीकुक्कुटः अपराजितश्च नामपरो खला-
वपि । (वा० चि०-९।१२) ।