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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 69 में से

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पृष्ठ 8

( ८ )

में नियुक्त होने की चर्चा है। पाकदर्पण १ में नल ने स्वयं अपने को बाहुक नाम
से ऋतुपर्ण के नगर में जाना तथा अश्ववाहन विद्या तथा पाक विद्या में अपने
को प्रवीण बता कर रहने का उल्लेख किया है।
राजा नल का जन्म कब हुआ, इसका निर्णय करना कठिन हैं क्योंकि इनके
सम्बन्ध में कोई उल्लेख नहीं मिलता । कवि कुल चूडामणि हर्ष ने सत्ययुग में
उत्पन्न होने की बात दर्शाई है "पदैश्चतुर्भिः सुकृते स्थिरी कृते कृतेऽमुना केन तपः
प्रपेदिरे" इत्यादि वाक्यों से ज्ञात होता है। इन की उत्पत्ति सत्ययुग में हुई
इसका कोई विशिष्ट प्रमाण उपलब्ध न होने से उनका जन्म काल अन्वेषणीय है।
यह ग्रन्थ प्राचीन काल का आहार-विचार रहन-सहन आदि का ज्वलन्त
प्रतीक है। इससे हम प्राचीन परम्पराओं का स्वरूप आधुनिक समय में जन-
साधारण के सामने रख सकते हैं कि उस समय हमारा विज्ञान कितना परिपूर्ण था।
क्षेम कुतूहम् के प्रकाशन के समय से ही मेरा मन नल पाकदर्पण के प्रकाशन
की ओर लगा था अनुवाद भी उसके बाद ही हो गया था। किन्तु कुछ कार्य
कारण वश विलम्ब हो गया। प्रसङ्गतः बात चीत के प्रवाह में चौखम्भा संस्कृत
संस्थान के संस्थापक श्रीमोहनलाल गुप्त के सौजन्य से इसको प्रकाशित करने में
अधिक बिलम्ब नहीं हुआ और अब पाठकों के सामने प्रस्तुत है। आशा है यह
हिन्दी रूपान्तर साहित्यिकों की रुचि को बढ़ायेगा ।
इसके अनुवाद में अनेक ग्रन्थों का सहयोग लेना पड़ा है जिनके कर्त्ता का
आभारी हूँ। प्रूफ संशोधन एवं संयोजन में मेरे कनिष्ठ पुत्र रजनीश त्रिपाठी का
बहुत सहयोग रहा है। उनके भविष्य की शुभकामना करता हूँ। श्री कपिल देव
गिरिजी शोध सहायक, संस्कृत महाविद्यालय का० हि० वि० वि० का सहयोग ही
नहीं मार्ग प्रदर्शन भी अद्वितीय रहा है। अतः उनको हार्दिक धन्यवाद है।
यह कृति विश्वनाथ की अनुकम्पा से सम्पन्न हुई है। अतः उनके चरण
कमलों में समर्पित करता हूँ ।
श्रीरामनावमी काशी गुरुवार २१ अप्रैल ८३,
इन्द्रदेव त्रिपाठी


१. एकाकी नैषधः प्राप्तः कदाचित् कलिनाशनः ।
ऋतुपर्णस्य नगरीं राजानमिदमब्रवीत् ॥
अश्वानां वाहने राजन् पृथिव्यां नास्ति मत्समः ।
अर्थज्ञानाय चैवाहं द्रष्टव्यो नैषधेन च ।
अन्नसंस्कारमपि च जानामि पिशितस्य च ॥ पा० द० प्र० १।१-३


विषय सूची

पृष्ठ सं०
प्रथम प्रकरण
ग्रन्थोपत्रम १-७२
ग्रन्थ प्रारम्भ करने का उपक्रम १
पाँच प्रकार के भोजन के भेद १
नल तथा राजा-ऋतुपर्ण का सम्बाद ३
इन्द्रादि लोकपालों के द्वारा दिये वरों का निरूपण ४
राजा नल के द्वारा स्वनिर्मित ग्रन्थ के विषय का वर्णन ४
रसोइया का लक्षण ५
परोसने वाले का लक्षण तथा विधि ५
ग्रन्थ के उपक्रम विषय ६
अन्न की प्रशंसा ७
अन्न सम्बन्धी दोषों का विवेचन ७
अन्न में आठ दोषों का उत्पत्ति निरूपण ७
अन्नगतदोषविचार का प्रयोजन ८
अमृत अन्न का लक्षण तथा दोष ८
पैच्छिल अन्न का गुण तथा दोष ९
अशुचि (अपवित्र) अन्न का लक्षण तथा दोष ९
क्वथितान्न का लक्षण तथा दोष ९
शुष्क-अन्न का लक्षण तथा दोष ९
दग्धान्न के लक्षण तथा दोष १०
विरूपान्न का लक्षण तथा दोष १०
विपरीत ऋतुज-अन्न के लक्षण तथा दोष १०
राजा के लिये निर्दोष अन्न देने का विधान १०
अन्न (भात) बनाने की विधि तथा गुण ११
मांसग्रहण करने का नियम ११
उत्तक्राणोदक बनाने की विधि १२