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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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पृष्ठ 21

१८ पाकदर्पणम्
नलोक्तान्योन्यद्रव्यसंसर्गजविषनिरूपणम्
श्रूयतां पाचकश्रेष्ठ ! त्वदुक्तं गरलं पुनः ।
सर्वं वस्तुस्वरूपेण सुधा भवति वै ध्रुवम् ॥ ११२ ॥
अन्योन्यद्रव्यसंसर्गाद्विषं भवति वै तृणम् ।
अत्रापि तैलसंसर्गात् कर्पूरस्य कृतं त्वया ॥ ११३ ॥
इदं हि गरलं प्रोक्तं प्राणिनां दृश्यते मृतिः ।
राज्ञश्च वचनं श्रुत्वा बाहुकः पुनरब्रवीत् ॥ ११४ ॥
नल कथित अन्योन्य द्रव्यसंसर्गज विष का निरूपण—राजा ऋतुपर्ण ने नल
के कथन को स्मरण दिलाया कि हे पाचकश्रेष्ठ बाहुक ! तुमने संसर्गज विष का
निरूपण किया है। सभी द्रव्य अपने स्वरूप में निश्चय ही अमृत के समान होते
हैं। किन्तु विभिन्न द्रव्यों के संसर्ग से तृण भी विष हो जाता है। यहाँ पर भी
आपने तैल के संसर्ग से कर्पूर को विष बताया है। इसको गरल (संसर्गज विष)
कहते हैं और इससे प्राणियों की मृत्यु होती है। इस प्रकार राजा के वचन सुनकर
बाहुक ने उत्तर दिया ॥ ११२-११४ ॥
संसर्गजविषनिराकरणपूर्वक ममृतत्वनिरूपणम्
सत्यमुक्तं महाराज ! नत्वेतद् गरलं भवेत् ।
किन्तु पीयूषसदृशमन्नमेतद् भवेद् ध्रुवम् ॥ ११५ ॥
सत्यं संगविशेषेण विषमप्यमृतायते ।
हरिसन्निधिमात्रेण शेषो निर्विषतां यथा ॥ ११६ ॥
तथायोगस्तु कर्पूरंतैलयोरमृतायते ।
मांसशाल्यन्नयोगाद्धि तद्विषं निर्विषायते ॥ ११७ ॥
सूदस्य हस्तकरणममृतं तद्द्भवेद्ध्रुवम् ।
तदेतन्मात्रया युक्तं विषमप्यमृतं भवेत् ॥ ११८ ॥
अमात्रयाभिसंयुक्तममृतं विषमेव तत् ॥ ११९ ॥
संसर्गज विष का निराकरणपूर्वक अमृत स्वरूप का निरूपण- हे महाराज !
आपने सत्य कहा है किन्तु मैंने जो मांसोदन पदार्थ निर्माण किया है वह गरल
(संसर्गज विष) नहीं होता है। किन्तु निश्चय ही वह अन्न अमृत सदृश
होता है। यह सत्य है कि विशिष्ट पदार्थ का संसर्ग होने से विष भी अमृत हो जाता
है। जैसे भगवान् विष्णु के संसर्ग से शेषनाग भी निर्विष हो जाते हैं उसी प्रकार
कर्पूर और तैल का संयोग भी अमृत सदृश हो जाता है। कर्पूर तथा तैल का
संसर्गज विष मांस एवं शाल्यन्न के संयोग से निर्विष हो जाता है। पाचक के
नलविरचितम् १९
हाथ से बनाया हुआ वह निश्चय ही अमृत हो जाता है। वह विष भी उचित
मात्रा में मिलने पर विष अमृत हो जाता है, किन्तु विषम मात्रा (अनुपयुक्त
मात्रा) में मिलने पर अमृत भी विष हो जाता है ॥ ११५-११९ ॥
स्वकृतपाकप्रशस्तिः
नानाद्रव्यसमन्वितं बहुगुणं प्राणस्वरूपन्नृणाम्
धातूनाञ्च विवर्धनं कलिमलध्वंसं त्रिवर्गप्रदम् ।
नानाव्याधिहरं परत्र हिमकृत्कायस्य कान्तिप्रदम्
पीयूषालयमीदृशञ्च न हि तं भक्तं मया साधितम् ॥ १२० ॥
स्वकृत पाक की प्रशंसा—मैंने विविध द्रव्यों से युक्त अनेक गुणवाला मनुष्यों
के प्राणस्वरूप, धातुओं (रस-रक्त-मांस-भेदादि) को बढ़ाने वाला कलिकाल के
मल (रोगादि) की नाश करने वाला, त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) देने वाला,
अनेक व्याधियों को दूर करनेवाला, दूसरों का हित करने वाला शरीर की शोभा
को बढ़ाने वाला अमृत भण्डारस्वरूप अन्न का निर्माण किया है। मैंने आपके
कथनानुसार विषाक्त अन्न का निर्माण नहीं किया है ॥ १२० ॥
सूपानां निर्माणविधिः
कुलित्थमाषनिष्पावतुवरीचणकादयः ।
शूर्पेण शोधयेत् सम्यक् मुद्गादीन्चितुषीकृतान् ॥ १२१ ॥
पचेत्प्रवण्यां पाकज्ञः समभागोदकैश्च तान् ।
पक्वे सूपे समालोक्य यथाहं सैन्धवं क्षिपेत् ॥ १२२ ॥
सुवर्णार्थञ्च तत्रैव निशाचूर्णं विनिक्षिपेत् ।
पुनश्च वासनाथंन्तु यथाहं हिंगु निक्षिपेत् ॥ १२३ ॥
दर्वीपुटेन निर्मथ्य पयसा लोडयेच्च तम् ।
कर्पूरपुष्पमुख्यैश्च सुहृदश्वाधिवासयेत् ॥ १२४ ॥
एवं मत्साधितं सूदः प्रदद्यात् सूपमुत्तमम् ॥ १२५ ॥
सूप (दाल) बनाने की विधि—कुरथी, उड़द, भटवास, अरहर तथा चना
आदि को सूप से अच्छी तरह साफ करे और पाचक भूसी रहित मूंग आदि के
दाल को समान भाग जल के साथ बटलोही में पकावे । पका हुआ दाल देखकर
उचित मात्रा में सेन्धा नमक छोड़ दे। दाल को सुन्दर रंग वाला बनाने के लिए
उस में हल्दी का चूर्ण मिला दे। उसमें सुगन्ध लाने के लिये पुनः उचित मात्रा
में हींग (घृतभर्जित) छोड़ दे। इसके बाद कलछुल से अच्छी तरह मथ कर
जल मिला दे। तदनन्तर कर्पूर तथा विभिन्न सुगन्धित पुष्पों से अच्छी तरह सुवा-
४ पा.द.