पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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दशम प्रकण
क्षीरादिपाकनिरूपण १०९-१११
क्षीरपाक बनाने का प्रकार १०९
क्षीर पाक बनाने की विधि तथा गुण १०९
अन्य प्रकार के क्षीर पाक बनाने के विधि तथा गुण १११
क्षीरपाक के गुण १११
एकादश प्रकरण
दधिभेदप्रकरण १३१-११४
दही बनाने की विधि तथा गुण ११३
॥ श्रीः ॥
अथ नलविरचितं
पाकदर्पणम्
ग्रन्थोप्रक्रमः
एकाकी नैषधः प्राप्य कदाचित् कलिनाशनः ।
ऋतुपर्णस्य नगरीं राजानमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
ग्रन्थ प्रारम्भ करने का उपक्रम— किसी समय झगड़ा को दूर करने के
अभिप्राय से नैषध (निषध देश का राजा नल) अकेले ही ऋतुपर्ण की नगरी में
जाकर वहाँ के राज से इस प्रकार बोले ॥ १ ॥
स्वदेशं हि परित्यज्य बाहुकाख्योऽहमागतः ।
अश्वानां वाहने राजन् पृथिव्यां नास्ति मत्समः ॥ २ ॥
हे राजन् ! मेरा नाम बाहुक है और मैं अपना देश छोड़ कर आया हूँ ।
इस पृथिवी पर घोड़ों को हाँकने (घोड़सवारी करने) में मेरे समान कोई
नहीं है ॥ २ ॥
अर्थज्ञानस्य चैवाहं द्रष्टव्यो नैपुणेन च ।
अन्नसंस्कारमपि च जानामि पिशितस्य च ॥ ३ ॥
हे राजन् ! अश्व सम्बन्धी अर्थज्ञान में भी मेरे समान कोई नहीं है । अच्छी
तरह आप मुझे देख लें । अर्थात् परीक्षा कर लें । मैं अन्नसंस्कार (विभिन्न प्रकार
के भोजननिर्माण-प्रकार) को भी जानता हूँ और मांसमिश्रित अन्नसंस्कार (मांस-
मिश्रित ओदन निर्माण प्रकार) को भी जानता हूँ ॥ ३ ॥
पञ्चविधभोजनस्य भेदाः
भक्ष्यं भोज्यं तथा लेह्यञ्चोष्यं पेयं पयोगतम् ।
भेदं रसानां षण्णाञ्च शुद्धसंस्कारभेदतः ॥ ४ ॥
पाँच प्रकार के भोजन का भेद— भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य तथा दुग्धगत
पेय ये पाँच प्रकार के भोजन शुद्धसंस्कार भेद से छः रसों का भेद होता है ॥ ४ ॥