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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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१२ पाकदर्पणम्
उत्क्राणोदकनिर्माणविधिः
अनापलं ततो भाण्डे तण्डुलस्योदकं शुभे ।
निधाय शुद्धमुदकं समं कृत्वा पचेत्सुधीः ॥ ६५ ॥
तप्ते पयसि तन्मासं निक्षिपेत्क्षालितं पुनः ।
पुनश्च निक्षिपेत्तत्र कुम्भीकुस्तुम्बुरीं बुधः ॥ ६६ ॥
तप्ते मांसे पुनः सम्यक् शोधयेच्चिचक्रणं विना ।
शीतलञ्च पुनः कृत्वा कुसुमैरधिवासयेत् ॥ ६७ ॥
न्यसेच्च मृगनाभिश्च कर्पूरं हिमचारि च ।
मुहूर्त्तमेकं संस्थाप्य प्रसूनानि परित्यजेत् ॥ ६८ ॥
एतदुत्क्राणमुदकमाहुः सूदविशारदः ॥ ६९ ॥
उत्क्राणोदक बनाने की विधि - उत्क्राणोदक बनाने के लिये पहले शुद्ध पात्र
में चावल का जल रखकर सम भाग शुद्धजल मिलाकर बुद्धिमान रसोइया पकाये ।
जल गरम हो जाने पर पूर्वोक्त प्रक्षालित मांस को पुनः छोड़ दे । इसके बाद
उसमें कुम्भी, कुस्तुम्बुरी, (धनिया) आदि छोड़ दे । पुनः मांस के गरम हो जाने
पर चिकनापन के बिना ही छान ले । पुनः जल को शीतल कर पुष्पों से सुगन्धित
करे । पुनः उसमें कस्तूरी तथा कर्पूर मिला दे । उसमें एक घड़ी तक पुष्पों को
रखकर निकाल दे । इसको पाकशास्त्रवेत्ता उत्क्राणोदक कहते हैं ॥ ६६-७० ॥
उत्क्राणोदकशब्दस्य विवेचनम्
सर्वोदकातिक्रमणादुत्कृष्टत्वादितं पयः ।
रससर्वस्वरूपत्वादुत्क्राणमिति कथ्यते ॥ ७० ॥
उत्क्राणोदक शब्द की व्युत्पत्ति - सभी प्रकार के जल को अतिक्रमण करने
से तथा उत्कृष्ट (उत्तम) होने से और सभी रसस्वरूप होने से उत्क्राण
(उत्क्राणोदक) कहा जाता है ॥ ७१ ॥
सामान्यमांसौदननिर्माणविधिः
त्रिभागपूरितां स्थालीं तज्जलैश्च प्रमाणवित् ।
स्थापयेच्च तथा चुल्यां तप्ते पयसि वह्निना ॥ ७१ ॥
चतुर्थांशान्निक्षिपेत्सम्यक् क्षालितान् गौरतण्डुलान् ।
ईषत्पाके तु सञ्जाते सुशुभे शालितण्डुले ॥ ७२ ॥
आदाय पक्वपललमपक्वमथवामिषम् ।
तण्डुलाकारवच्छित्त्वा किञ्चित्सैन्धवमावहेत् ॥ ७३ ॥


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नलविरचितम् १३
भर्जयित्वा पुनस्थाल्यां किञ्चिदाज्यं च निक्षिपेत् ।
जले विलीने तद्भक्तमङ्गारेषु समाविशेत् ॥ ७४ ॥
क्षीरं च नारिकेलस्य नवसर्पिस्तथैव च ।
न्यसेत्तत्रैव रम्याणि केतकीकुसुमानि च ॥ ७५ ॥
निक्षिपेत् शकलांस्तत्र पर्पटप्रमुखोद्भवान् ।
गन्धैः कर्पूरकस्तूरीसम्भवैश्चाधिवासयेत् ॥ ७६ ॥
तन्मुखं छादयेत्सम्यग्विधानेन विचक्षणः ।
लिम्पेत्तद्गन्धरक्षार्थं तद्रन्ध्र कणिकैर्ध्रुवम् ॥ ७७ ॥
आवर्त्तनं पुनः कुर्यादङ्गारेष्वेव तान् पुनः ।
यावता मृदुभावं स्यात्तावत्तत्र प्रयोजयेत् ॥ ७८ ॥
एवमामिषसम्भूतं दापयेदन्नमीदृशम् ॥ ७९ ॥
सामान्य मांसोदन (पुलाव) बनाने की विधि - पूर्वनिर्मित उत्क्राणोदक से
प्रमाण जाननेवाला रसोइया स्थाली का तीन भाग भर दे तथा स्थाली को चूल्ही
पर रखे । इसके बाद आग से पानी गरम हो जाने पर अच्छी तरह प्रक्षालित
चतुर्थांश सफेद चावल को छोड़ दे । उत्तम शालिचावल के थोड़ा पक जाने पर
पका मांस या अपक्व मांस लेकर तथा चावल के बराबर-बराबर काट कर थोड़ा
नमक मिला दे । पुनः स्थाली में भूनकर मिला दे तथा थोड़ा घी मिला दे । जल
के नष्ट हो जाने पर उस भात को अंगार पर रखे । इसके बाद नारियल का
जल तथा नया घी मिला दे और वहीं पर रमणीय केवड़ा के फूल को रखे ।
तदनन्तर उसमें पर्पट (पापड़) आदि के टुकड़ों को छोड़ दे और कर्पूर-कस्तूरी
आदि के गन्ध से अधिवासित (सुगन्धित) करे । बाद में बुद्धिमान् पाचक उसके
मुख को ढक दे और उसके गन्ध को सुरक्षित रखने के लिये ढकने के छेद को
आटे से बन्द कर दे । पुनः अंगार के ऊपर ही उनको घुमाकर (झोंककर)
नीचे-ऊपर कर रख दे । जब