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सर्वकोश
पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 69 में से

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पृष्ठ 17

१० पाकदर्पणम्
दग्धान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
पावकस्यातियोगाद्धि दग्धं भवति चोदनम् ।
भक्षितं येन कुक्षिस्र्थं तत्कुर्याद्धातुशोषणम् ॥ ५३ ॥
दग्धान्न के लक्षण तथा दोष—तेज अग्नि के सहयोग से जो अन्न जल
जाता है उसे दग्धान्न कहते है । उस अन्न को जो खाता है उसके पेट में स्थित
होकर वह अन्न धातुओं (रस, रक्त, मांस आदि का) शोषण करता है ॥ ५३ ॥
विरूपान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
ओदनं स्याद्विरूपाख्यं पाकादक्षुण्णतण्डुलम् ।
कुक्षिस्र्थं यस्य तद्भुक्तमायुरादीन्निहन्ति च ॥ ५४ ॥
विरूपान्न का लक्षण तथा दोष—बिना अच्छी तरह कूटा-छाँटा चावल
पाक करने से विकृत रूप हो जाता है उसे विरूपान्न (विरूपौदन) कहते हैं। वह
खाया हुआ भात जिसके पेट में रहता है उसकी आयु, बल, वीर्य आदि को नष्ट
कर देता है ॥ ५४ ॥
अनर्तुजान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
अनर्तुजाभिधानादन्नं पर्युषितं भवेत् ।
निद्राशीतादिरोगः स्याद्कुक्षितस्य च तस्य वै ॥ ५५ ॥
विपरीत ऋतुज अन्न के लक्षण तथा दोष--अनर्तुज कहने से पर्युषित (ऋतु
विपरीत-बासी) अन्न होता है। जो उस अन्न को खाता है उसको निद्रा आलस्य
दौर्बल्यादि रोग होते हैं ॥ ५५ ॥
राज्ञे निर्दोषान्नप्रदानस्य विधानम्
एते चान्नाश्रिता दोषाः मया सम्यक् प्रकाशिताः ।
एभिर्दोषैर्विहीनं यदन्नं राज्ञे प्रदापयेत् ॥ ५६ ॥
राजा के लिए निर्दोष अन्न देने का विधान--पूर्वोक्त अन्नगत आठ दोष
हैं उनको मैंने अच्छी तरह बता दिया है। जो अन्न पूर्वोक्त दोषों से रहित हो उस
अन्न को राजा को खाने के लिए देना चाहिए ॥ ५६ ॥
अन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
विधानमत्र पाकस्य वक्ष्ये सर्वहिताय च ।
अखण्डतण्डुलान् क्षुष्यान् पुराणव्रीहिसम्भवान् ॥ ५७ ॥
क्षालयेत्तान् बुधः सम्यगोषदुष्णेन वारिणा ।
शुद्धोदकं पुनः स्थाल्यां पूरयेत्तत्रिभागिकम् ॥ ५८ ॥
नलविरचितम् ११
चुल्यामारोपयेत्स्थालीं पूरितां पाककोविदः ।
शीतबुद्बुदसंयुक्ते पक्वे पयसि तान् क्षिपेत् ॥ ५९ ॥
तण्डुलानां यथा मध्ये ईषत्कठिनता भवेत् ।
दर्वीपुटेन तान् सम्यगवलोड्य पुनः पुनः ॥ ६० ॥
तत्रैव तु सदा सिञ्चेत् तक्रं क्षीरं पयोऽथवा ।
तदावतार्य प्रस्थाप्य चाङ्गारेषु¹ पुनर्न्यसेत् ॥ ६१ ॥
तदन्नं सम्यगालोक्य मृदुभूतं च दापयेत् ।
इदं तण्डुलसम्भूतमायुरारोग्यवर्द्धनम् ॥ ६२ ॥
अन्न (भात) बनाने की विधि तथा गुण--यहाँ पर सभी लोगों के लिए
पाक बनाने की विधि कहता हूँ। बुद्धिमान व्यक्ति पुराने धान के बिना टूटे, सूखे
चावल को थोड़े गरम जल से अच्छी तरह धो कर बटलोही (भोजन-निर्माण-
पात्र) में चावल से तीन गुना शुद्ध जल भर दे। इसके बाद पाचक जलपूर्ण भोजन-
निर्माण पात्र को चूल्हा के ऊपर रक्खे । जल के थोड़े गरम हो जाने पर पूर्वोक्त
धोये हुए चावल को छोड़ दे । जब चावल में थोड़ा कड़ापन रह जाय तब कलछुल
से बार-बार अच्छी तरह चलाये और उसी में मट्ठा, दूध या जल छोड़ दे । इसके
बाद उतार कर तथा रख कर पुनः अंगार (आग) के ऊपर रखे । उस अन्न
(भात) को अच्छी तरह मुलायम देखकर खाने के लिए दे। यह चावल का भात
आयु एवं आरोग्य को बढ़ाने वाला है ॥ ५७-६२ ॥
मांसग्रहणविधिः
छागमेषशकुन्तादिप्राणिनां पलं बुधः ।
समादाय पुनस्तस्य त्वगन्त्राणि समुत्सृजेत् ॥ ६३ ॥
तेषामेकतमं मांसं क्षालयेद्वारिणा ततः ।
अस्थिभिस्सह संच्छिद्य निक्षिपेत्तस्य भाजने ॥ ६४ ॥
मांसग्रहण करने का नियम - बुद्धिमान व्यक्ति बकरी, भेड़, शकुन्त (पक्षी)
आदि प्राणियों के मांस लेकर उसके चमड़े तथा आँतों को निकाल दे। पुनः उनमें
से किसी एक का मांस लेकर जल से प्रक्षालन करे । इसके बाद उस मांस को
अस्थिसहित काटकर मांस बनाने के पात्र में रक्खे ॥ ६३-६४ ॥
१. भात को उतार कर आग के ऊपर रखने की प्रक्रिया आज भी प्रचलित
है । इससे भात में एक प्रकार का स्वाद आ जाता है और कच्चा रहने की आशंका
नहीं रहती । योग्य पाचक अब भी इस प्रक्रिया को अपनाते हैं ।