पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 69 में से
संदर्भ में पढ़ें२० पाकदर्पणम्
सित (सुगन्धित) कर ले। इस प्रकार मेरा बनाया हुआ उत्तम स्वादिष्ट दाल
पाचक राजा के लिये दे ।। १२१-१२५ ।।
सूपस्य गुणाः
अयं रुचिकरात्सूपः रुच्यः पित्तविनाशकः ।
सर्वैर्गुणैस्समाविष्टो लघुरूपो निरामयः ।। १२६ ।।
दाल के गुण—पूर्वोक्त प्रकार से निर्मित दाल मन के अनुकूल होने से रुचि-
कारक एवं पित्तनाशक होता है। यह सभी गुणों से युक्त, हल्का तथा आरोग्यप्रद
होता है ।। १२६ ।।
विशिष्टसूप (द्विदल) निर्माणविधिः
सामान्यसूपस्सुपोऽत्र कथितो व्यञ्जनाग्रणीः ।
अत्र सिंहासनारूढः कथ्यते सूपभूपतिः ।। १२७ ।।
तेषां मध्ये समाधाय मुद्गोहितकरं परम् ।
तिलतैलेन संमृज्य तक्राम्ले तत्र लोडयेत् ।। १२८ ।।
शोषयित्वाऽऽतपे तन्तु भिन्नं कुर्यात् हरदृके ।
अपक्वतण्डुलोप्तेऽत्र साकं सूदस्तुषैश्च तम् ।। १२९ ।।
पूरयित्वाधितिष्ठेच्च दिनानि दशपञ्च च ।
मुसलेन सुतं यावद् भवेत्तावत् प्रसादयेत् ।। १३० ।।
एवञ्च निस्त्वचं कृत्वा क्षालयेद् वारिणा च तम् ।। १३१ ।।
विशेष प्रकार का दाल तैयार करने का प्रकार—बाहक नल ने बताया कि
मैंने सभी व्यञ्जनों में श्रेष्ठ सामान्य दाल का निर्माण बताया। अब यहाँ पर
सिंहासनारूढ (राजासन पर बैठे हुए) दालों के राजा को कहता हूँ। पूर्वोक्त
कुरथी, उड़द, मूँग आदि शिम्बी धान्य में से उत्तम हितकारक मूँग को लेकर
तिल तैल से मींजकर खट्टे मठ्ठे में भिगो दे। इसके बाद उसको धूप में सुखा
कर हरहक (दाल दलने की चकरी) में दरकर अलग-अलग कर ले। इसके
बाद उसको कच्चे चावल के पात्र में धान की भूसी के साथ रखकर दस-पन्द्रह
दिन रहने दे। पुनः निकाल कर मुसली के आघात से जब तक वह स्वच्छ-मुलायम
न होजाय तब तक स्वच्छ करे। इस प्रकार दाल की भूसी निकाल कर जल से
धो दे ।। १२७-१३ १।।
विशिष्टसूपपाकविधिः
भिन्नमुद्गसमं तोयं प्रवण्वां सेचयेद्बुधः ।
तस्मिन् पयसि शोभार्थं निशाचूर्णं च निक्षिपेत् ।। १३२ ।।
नलविरचितम् २१
रामठं च तथा क्षीरमासिञ्चेत्तत्र मानवित् ।
चुल्ल्यामारोप्य तान् विद्वान् जले बुद्बुदसंयुते ।। १३३ ।।
निक्षिपेत् क्षालितं पक्वं तुषादिवितुषीकृतम् ।
ईषन्मृदुत्वे जातेऽस्मिन्नवतार्य स्रावेदबुधः ।। १३४ ।।
तमादाय पुनः पूगपट्टनेत्रेषु निक्षिपेत् ।
सैन्धवं च यथायोग्यं तत्रैव परिनिक्षिपेत् ।। १३५ ।।
कुर्वीत वासेन सम्यक् कर्पूरप्रमुखैश्च तम् ।
वासितं तं पुनः सम्यग् वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ।। १३६ ।।
विशेष प्रकार से दाल पकाने की विधि—बुद्धिमान् पाचक पूर्वोक्त प्रकार से
भूसीरहित मूँग की दाल के बराबर जल बटलोही में रक्खे और उस जल में शोभा
बढ़ाने के लिए हल्दी का चूर्ण छोड़ दे। इसके बाद प्रमाण को जानने वाला
पाचक हींग तथा दूध छोड़ दे। विद्वान् पाचक उनको चूल्हे पर रखकर बुदबुद
शब्द जल में होने पर भूसी आदि से रहित धोये हुए परिपक्व दाल को मिला-
दे। थोड़ा मुलायम हो जाने पर उतारकर जल को निकाल दे। इसके बाद
उसको लेकर पुनः सुपारी पात्र के मध्य में रख दे और उचित मात्रा में
सेन्धानमक मिला दे। इसके बाद कर्पूर आदि प्रमुख सुगन्धित द्रव्यों से सुगन्धित
बना कर तथा पुनः अच्छी तरह लपेटकर खाने के लिये राजा को दे। यह दक्षिण-
भारतीय "मसाल डोसा" का स्वरूप हो सकता है ।। १३२-३६।।
विशिष्टसूपपाकस्य गुणः
अयं स्वादुतरः रूपः सर्वेषां हितकृद्बली ।
स्निग्धो मनोहो रूपः सद्यः पित्तविमर्दकः ।। १३७ ।।
विशिष्ट परिपक्व दाल के गुण—पूर्वोक्त विशिष्ट प्रकार से निर्मित परिपक्व
दाल अत्यन्त स्वादिष्ट, सभी के लिये हितकर, बलकारक, स्निग्ध, मनोहर रूप-
कारक तथा शीघ्र ही पित्तनाशक होता है ।। १३७ ।।
अन्यविधसूपपाकविधिर्गुणाश्च
तादृशं मुद्गमादाय प्रवण्वां पाचयेद् बुधः ।
सम्यक् पक्वे ततः सूपे सैन्धवं हिंगु च क्षिपेत् ।। १३८ ।।
सूपमेवंविधं विद्वान् वासयेत्कर्पूरादिभिः ।
शनैः शलाकयालोड्य राजे तञ्च प्रदापयेत् ।। १३९ ।।
अयं स्वादुतरः सूपः प्रोक्तो लोकहितप्रदः ।
वृष्यः सुधासमः सद्यः सुराणामपि दुर्लभः ।। १४० ।।
अन्य प्रकार का दाल बनाने की विधि तथा गुण—बुद्धिमान् पाचक पूर्वोक्त