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पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)

Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary

राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished69 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

१६ पाकदर्पणम्
लावुक मांसौदन का गुण — लावा पक्षी का मांसौदन वीर्यवर्द्धक, रोगनाशक,
पथ्य, इन्द्रियों को बल देनेवाला, कफनाशक तथा थकावट को दूर करने वाला है
और अच्छी तरह बलकारक एवं आयुवर्द्धक है ॥ ९६ ॥
कुक्कुटमांसतैलौदननिर्माणविधिः
जाठरः कथितः सम्यक् लावुकस्यामिषोद्भवः । ९७ ॥
कथ्यते ताम्रचूडस्य पिशितस्यौदनः पुनः ।
सैन्धवादीनि वस्तूनि केषाञ्चिन्निक्षिपेद् बुधः ॥ ९८ ॥
पादायुधस्य पलं छित्त्वा दग्ध्वा च पूर्ववत् ।
निक्षिपेत्तिलपिण्याकलेह्येन सह सूदवित् ॥ ९९ ॥
भर्जितं तिलतैलेन रामठं तत्र निक्षिपेत् ।
मेलयित्वा तु कुर्वीत पोटलीः पूर्ववत् पचेत् ॥ १०० ॥
अनैनैव प्रकारेण साधयित्वान्नमुत्तमम् ।
राज्ञे दद्यादिदं विद्वान् कुक्कुटामिषसम्भवम् ॥ १०१ ॥
कुक्कुट (मुर्गा) मांस तैलौदन बनाने की विधि — उदर के लिये हितकर
लावा मांस का बना हुआ मांसौदन कहा गया। अब मुर्गे का मांसतैलौदन
निर्माण कहते हैं। बुद्धिमान् पाचक पुनः सेन्धा नमक आदि वस्तु समूहों को एकत्र
कर छोड़ दे । पूर्वोक्त प्रकार से मांस को तण्डुलाकार काट कर तथा घी में भून
कर पाक शास्त्रवेत्ता पाचक तिल के गीले खली के साथ छोड़ दे । पुनः उसमें घी
में भूनी हुई हींग छोड़ दे। पूर्वोक्त सभी चीजों को मिलाकर पूर्व की तरह पोटली
बनावे और पकावे । इसी प्रकार मुर्गे के मांस से निर्मित उत्तम कुक्कुटतैलमांसौ-
दन को विद्वान् पाचक राजा के लिये खाने को दे ॥ ९७-१०१ ॥
कुक्कुटमांसतैलौदनस्य गुणाः
एतत्कीर्तिकरं नित्यं शरीरस्य हितप्रदम् ।
मरुद्दोषहरं शश्वत् वृष्यं लघुबलप्रदम् ॥ १०२ ॥
कुक्कुट मांसतैलौदन के गुण — यह कुक्कुटमांसतैलौदन यशकारक तथा
शरीर के लिये हितकर है। यह वातविकार को दूर करने वाला निरन्तर वीर्य-
वर्द्धक, हल्का तथा बलकारक है ॥ १०२ ॥
सूक्ष्ममांसौदननिर्माणविधिर्गुणाश्च
अन्नञ्च दर्शितं रम्यं कुक्कुटामिषसम्भवम् ।
सूक्ष्ममांसौदनं रम्यं कथ्यते क्रमशस्ततः ॥ १०३ ॥
नलविरचितम् १७
भक्तानां निक्षिपेत्तेषां सैन्धवादीन् सुबुद्धिमान् ।
सूक्ष्ममांसं न्यसेत् पक्वं पुनः तण्डुलभक्तिकी ॥ १०४ ॥
कैटर्यपत्रसंभूतलेह्यं तत्र समाविशेत् ।
तिलपिष्टेन रचितं षट् चूर्णं तत्र निक्षिपेत् ॥ १०५ ॥
हिंगुञ्च भर्जितं दद्यात् तैलं च तिलसम्भवम् ॥ १०६॥
सममेभिर्मेलयित्वा भक्तं तत् पूर्ववत् पचेत् ।
कृत्वान्नमेतदेवञ्च प्रदद्यात् प्राणकारणम् ॥ १०७ ॥
रुच्यं श्लेष्महरं रम्यं सुराणामपि दुर्लभम् ॥ १०८ ॥
सूक्ष्म मांसौदन बनाने की विधि तथा गुण — मुर्गा के मांस से निर्मित स्वादिष्ट
भात को मैंने बनाया। अब स्वादिष्टसूक्ष्ममांसौदन को क्रमशः कह रहा हूँ। बुद्धि-
मान् पाचक उन अन्नों में सेन्धा नमक आदि छोड़ दे। इसके बाद पका हुआ
सूक्ष्म मांस का टुकड़ा छोड़े। पुनः चावल का भात तथा कैटर्य पत्र का बना
हुआ लेह्य पदार्थ उसमें छोड़ दे। पुनः उसमें तिल की पिट्ठी से बना हुआ षट्-
चूर्ण छोड़ दे। इसके बाद भूनी हुई हींग तथा तिल का तेल मिलादे। इस प्रकार
इन सबों के साथ मिलाकर उस अन्न को पूर्ववत् पकाये। इस जीवन प्रदान करने
वाले सूक्ष्म मांसौदन को राजा के लिये दे। यह सूक्ष्म मांसौदन रुचिकारक,
वातनाशक, मनोरम तथा देवताओं के लिये भी दुर्लभ है ॥ १०३-१०८ ॥
प्रश्नोत्तररूपेणान्नस्य विषाक्तत्वनिराकरणम्
युक्तं भक्तं त्वयाप्युक्तं विषवद्भाति बाहुक ॥
अस्माभिर्भुज्यते भक्तं कथं च विषदूषितम् ॥ १०९ ॥
अमृतद्रव्यसंयुक्तं भुक्तमन्नं मया प्रभो ! ।
न कापि विषसंयुक्तमन्नं वै कथितं मया ॥ ११० ॥
प्रमादेन यदुक्तञ्च सत्यं तद्ब्रूत पार्थिव ! ।
बाहुकस्य वचः श्रुत्वा राजैनमिदमब्रवीत् ॥ १११ ॥
प्रश्नोत्तर के रूप में अन्न विषाक्तता का निराकरण — विविध संमिश्रित अन्न
निर्माण विधि एवं गुण को सुनकर राजा ऋतुपर्ण ने पूछा कि हे बाहुक ! आपने
कहा है कि युक्तिपूर्वक बनाया हुआ भी अन्न विषसदृश हो जाता है। तब हमलोग
विष दूषित अन्न को कैसे भोजन करते हैं। इस बात को सुनकर बाहुक नल ने
कहा कि हे राजन् ! अमृत द्रव्य से युक्त उचित अन्न को मैंने कहीं भी विषयुक्त अन्न
नहीं कहा है। यदि मैंने प्रमादवश सचमुच कहा है तो आप कहें। इसप्रकार बाहुक
की बात सुनकर राजा ऋतुपर्ण ने पूर्वोक्त आख्यान को बताया ॥ १०९-१११ ॥