पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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पाकदर्पणम्
इति प्रश्नकृते जातमुत्तरं ज्येष्ठमानतः ।
ये ते तदाश्रिताः दोषा अस्रुतः पिच्छिलोऽशुचिः ॥ ४२ ॥
क्वथितश्शुष्कतो दग्धो विरूपो नर्तुजस्तथा ।
स्वरूपलक्षणं चैषां कथ्यते क्रमशो गुणम् ॥ ४३ ॥
अन्नगत दोषों को पूछने पर उत्तम प्रमाणों के द्वारा उत्तर दिये। प्रमादादि-
वश अन्न में रहनेवाले निम्नलिखित दोष हैं। आस्रुत (अन्नगत मांड न निकालने
से खट्टा हुआ अन्न), पिच्छिल, अशुचि, क्वथित, शुष्क, दग्ध, विरूप तथा विपरीत
ऋतुओं में उत्पन्न — ये अन्नगत आठ दोष होते हैं; । इन दोषों के स्वरूप, लक्षण
तथा गुणों को आगे कहेंगे ॥ ४२-४३ ॥
अन्नगतदोषविचारस्य प्रयोजननिरूपणम्
किं तस्य हासरूपस्य विचारस्य प्रयोजनम् ।
पयस्त्वात् त्यज्यते सद्भिर्द्रवत्वे तु विशारदैः ॥ ४४ ॥
इदं सदोषं निर्दोषमिदं चेति विवेकितुम् ।
विकारार्थं न दोषेण युक्तद्रव्यम्प्रयत्नतः ॥ ४५ ॥
किन्त्वदुष्टवशाद्कर्त्तु रेतदेव प्रयोजनम् ।
अन्नगतदोषविचार का प्रयोजन — अन्न सम्बन्धी इन तुच्छ विचारों का
क्या प्रयोजन है ? अच्छे पण्डित लोग द्रव में शक्ति होने पर भी छोड़ देते हैं।
यह विचार करने के लिए कि यह दोषयुक्त है या दोषरहित है। दोष से युक्त द्रव
विकारोत्पादक न हो जाय इसके लिए प्रयत्नपूर्वक दोषरहित बनाना ही दोष के
विचार का प्रयोजन है ॥ ४४-४५॥
अन्नस्य नास्ति वा दोषा न भवन्ति कदाचन ॥ ४६ ॥
ते तस्य सम्भवन्त्येव पाचकस्य प्रमादतः ।
क्रमेण वक्ष्ये दोषाणामष्टानां लक्षणं गुणम् ॥ ४७ ॥
अन्न में न दोष हैं और न होते हैं। उसमें वे दोष रसोइया के प्रमाद के
कारण हो सकते हैं। प्रमाद से होनेवाले उन अन्नगत आठों दोषों के लक्षण तथा
गुणों को आगे कहेंगे ॥ ४६-४७ ॥
अस्रुतान्नलक्षणं दोषाश्च
अश्रावितयवागुं यदन्नमस्रुतमुच्यते ।
तदन्नं येन भुक्तं चेत् तस्य व्याधिकरणं भवेत् ॥ ४८ ॥
अस्रुत अन्न का लक्षण तथा दोष — जो अन्न मांड न निकालने से अम्ल हो
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नलविरचितम्
जाता है उसे अस्रुतान्न कहते है । जो उस अन्न को खाता है उसके लिए वह अन्न
रोगकारक होता है ॥ ४८ ॥
पैच्छिलान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
अन्नमाश्रयते जीर्णमतिपाकेन पैच्छिलम् ।
तद्भक्तं भुज्यते येन तं त्यजेदौदरोऽनलः ॥ ४९ ॥
पेंच्छिल अन्न का गुण तथा दोष — अन्न अधिक पकाने से पैच्छिल दोषों से
युक्त हो जाता है, जो लोग उस भात को खाते है उनको जठराग्नि छोड़ देती है।
अर्थात् उसकी जठराग्नि मन्द हो जाती है और कड़े अन्न पचाने में असमर्थ भी
हो जाती है ॥ ४९ ॥
अशुच्यन्नस्य लक्षणं दोषाश्च
कृमिकेशादिसंयुक्तं यदन्नमशुचि स्मृतम् ।
तद्भक्षणादरुचीरसना स्रवते जलम् ॥ ५० ॥
अशुचि (अपवित्र) अन्न का लक्षण तथा दोष — जो कृमि तथा केश
आदि से मिश्रित अन्न होता है उसे अशुचि अन्न कहते हैं। उस अन्न को खाने से
अरुचि (अरोचक) होती है और रसना (जिह्वा) से जल स्राव (लार)
निकलता है ॥ ५० ॥
क्वथितान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
ईषत्तण्डुलमिश्रं यत् क्वथितं परिकीर्तितम् ।
आत्मादिदोषकृत्यर्थं कायस्थं यस्य तद्भवेत् ॥ ५१ ॥
क्वथितान्न का लक्षण तथा दोष — थोड़ा तण्डुल (चावल) से मिश्रित जो
पाक होता है उसे क्वथित अन्न कहते हैं। यह अन्न जिसके शरीर में जाता है
वह शरीर में स्थित होकर आत्मा आदि में विकार उत्पन्न करता है ॥ ५१ ॥
शुष्कान्नस्य लक्षणं दोषाश्च
यत्कालविरहादन्नं शुष्कं तत्परिकीर्तितम् ।
भक्षितं येन तस्यान्नं विधूमो भवति ध्रुवम् ॥ ५२ ॥
शुष्क अन्न का लक्षण तथा दोष — जो अन्न अधिक समय तक रह जाने से
शुष्क हो जाता है उसे शुष्कान्न कहते हैं । उस शुष्कान्न को जो खाता है उसको
अवश्य ही विधूम (अपचन) हो जाता है ॥ ५२ ॥