पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ पाकदर्पणम्
तदर्यन्ननिर्माणविधिर्गुणाश्च
स्थाल्यां पक्वेऽथ पयसि पूर्ववत् सुद्वेदवित् ।
तत्रैव भिन्नमुद्गांस्तु निक्षिपेन्निष्पचेत्पुनः ॥ ८१ ॥
गतेषु तेषु मुद्गेषु किञ्चित् पाकं प्रयत्नतः ।
समालोक्य पुनस्तत्र निक्षेपेत्क्षालितण्डुलान् ॥ ८२ ॥
कुक्कुटस्यामिषं पिष्ट्वा पूर्ववद्भर्ज्य निक्षिपेत् ।
मुद्गतण्डुलमांसानां समपाकं यदा भवेत् ॥ ८३ ॥
तथा पचति पाकज्ञः प्रदद्यादन्नमुत्तमम् ।
इदं रुचिकरं सम्यक्कायपावकवर्धनम् ॥ ८४ ॥
समीरणहरं सम्यग् वारिदोषहरं परम् ।
तहरीत्युच्यते सद्भिरिदमन्नं शुभावहम् ॥ ८५ ॥
**तहरी बनाने की विधि तथा गुण—**पाकशास्त्र को जाननेवाला पाचक पूर्व-
वत् पके उत्क्राणोदक को भोजन-निर्माण पात्र में रक्खे और उसी में मूँग के दाल
को छोड़ दे तथा पकावे । मूँग के दाल के गल जाने पर प्रयत्न पूर्वक थोड़ा पका
हुआ जान कर उसमें जड़हन के चावल को छोड़ दे और पुनः मुर्गी के मांस को
पीसकर तथा कड़ाही में भूनकर छोड़ दे । जब तक मूँग, चावल तथा मांस एक
साथ पाक न हो जाय तब तक पाकज्ञ पाचक पकावै और इस उत्तम अन्न को खाने
के लिये दे । यह मुद्ग-तण्डुल-मांसान्न रुचिवर्द्धक, अच्छी तरह जाठराग्निवर्द्धक,
वातनाशक तथा अच्छी तरह जल के दोष को दूर करने वाला है। इस लाभ-
कारक अन्न को सज्जनवृन्द तहरी कहते हैं ॥ ८१-८५ ॥
चित्रपाकीय भक्तभेदनिरूपणम्
कथ्यन्ते भक्तभेदाश्च चित्रपाकसमन्विताः ।
पुष्पैैरनेकैर्बहुभिः सुगन्धैर्वासितेषु च ॥ ८६ ॥
विशालेषु च रम्येषु पूगपादेषु मानवित् ।
सुजातं राजशाल्यन्नं सुपक्वं सुमनोहरम् ॥ ८७ ॥
निक्षिपेतत्तथा योग्यं सुशील भक्तमुत्तमम् ।
सर्वत्र सैन्धवं न्यस्येत् मृगनाभिसकर्पूरम् ॥ ८८ ॥
कुंकुमं हिमतयोञ्च्च केतकीकुसुमं न्यसेत् ।
मातुलुङ्गदलं न्यस्य कुम्भीकुस्तुम्बरी तथा ॥ ८९ ॥
आर्द्रकस्य पलाण्डोश्च शकलान् समुन्निक्षिपेत् ।
जीरकस्य च मेथ्याश्च चूर्णं सर्वत्र निक्षिपेत् ॥ ९० ॥
नलविरचितम् १५
एभिश्चाकलयेद्भक्तं पूगपदेषु संस्थितम् ।
केषाञ्चित् निक्षेपेन्मांसमोदनानां नवं घृतम् ॥ ९१ ॥
**चित्रपाक सम्बन्धी भक्तभेद का निरूपण—**चित्रपाक से युक्त भात के प्रकार
को कहते हैं । प्रमाण को जानने वाला पाचक अनेक बहुत प्रकार के सुगन्धित
पुष्पों से सुगन्धित विशाल एवं मनोहर पूग पद में निर्मित अच्छी तरह परिपक्व
मनोहर, शीतल एवं उत्तम राजशालि का भात यथा योग्य स्थान पर रक्खे ।
सर्वत्र सेन्धा नमक रक्खे । कस्तूरी, कपूर, केशर, शीतल जल तथा केवड़ा का
फूल रक्खे । नींबू के टुकड़ों तथा कुम्भी, कुस्तुम्बरी को रख कर अदरक तथा
पलाण्डु (प्याज) के टुकड़ों को रक्खे । सभी स्थानों पर जीरा तथा मेथी के चूर्ण
को रक्खे । इन पूर्वोक्त द्रव्यों से पूगपद में स्थित भात को आकलन (सुसज्जित)
करे । कुछ पशु-पक्षियों का मांसौदन तथा नया घृत रक्खे ॥ ८६-९१ ॥
लावुकमांसौदननिर्माणविधिः
लावुकस्यामिषं दग्धं दग्धं मेदस्य मेदस्रम् ।
तण्डुलाकारवत्कृत्वा सम्यगाभर्ज्य सर्पिषा ॥ ९२ ॥
निक्षिपेच्छकलैः सार्द्धं पर्पटादिसमुद्भवैः ।
किञ्चिदाज्यं पुनस्तत्र नवनीतसमुद्भवम् ॥ ९३ ॥
मेलयित्वा तु तैस्साकं कुर्यात्पोटलिका पुनः ।
अन्तरालाट्टालके सम्यक् पचेतां पाकवित्तथा ॥ ९४ ॥
इदं चित्रतरं भक्तमेवं कृत्वा प्रदापयेत् ।
अमिषस्योदनश्चायं लावुकस्याति दुर्लभः ॥ ९५ ॥
**लावुक (लावापक्षी) मांसौदन बनाने की विधि—**लावा पक्षी का पका हुआ
मांस तथा पका हुआ घो ले ले । मांस को चावल के आकार का टुकड़ा-टुकड़ा
बनाकर घी में अच्छी तरह भून ले और पर्पट आदि से निर्मित टुकड़ों के साथ
छोड़ दे । पुनः उसमें मक्खन का निकाला हुआ थोड़ा घी मिलाकर उन पूर्वोक्त
द्रव्योंके साथ पोटलिका बनाये और पाक निर्माण को जाननेवाला पाचक अन्तराल
(मध्य में) अच्छी तरह पूर्वोक्त प्रकार से पकावे । इस प्रकार इस चित्र-विचित्र
भात को बना कर खाने के लिये दे । यह लावापक्षी के मांस का मांसौदन अत्यन्त
दुर्लभ है ॥ ९२-९५ ॥
लावुकमांसौदनस्य गुणाः
वृष्यं रोगहरं पथ्यमिन्द्रियाणां बलप्रदम् ।
श्लेष्मजित् श्रमजिद् बल्यमायुर्वृद्धिकरम्परम् ॥ ९६ ॥