न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
१६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
अवयवावयविनोर्जातिव्यक्त्योर्गुणगुणिनोः क्रियाक्रियावतो-
र्नित्यद्रव्यविशेषयोश्च यः सम्बन्धः स समवायः । समवायत्वं
नित्यसम्बन्धत्वम् ।
भाषा-अवयव अवयवी का जाति व्यक्ति का गुण गुणी का क्रिया
क्रियावालेका, नित्य द्रव्य विशेष का जो सम्बन्ध, उसका नाम समवाय है.
समवाय नाम नित्य होनेवाले सम्बन्ध विशेषका है.
तत्र प्रमाणं तु गुणक्रियादिविशिष्टबुद्धिर्विशेषणविशेष्यसम्बन्ध
विषया विशिष्टबुद्धित्वात् दण्डीपुरुष इतिविशिष्टबुद्धिवदित्यनु
मानेन संयोगादि बाधात् समवायसिद्धिः। नच स्वरूपसम्बन्धेन
सिद्धसाधनम् । अर्थान्तरं वा अनन्तस्वरूपाणां सम्बधत्वकल्पने
गौरवाल्लाघवादेकसमवायसिद्धेः । नच समवायस्यैकत्वे वायौ रूप
वत्ता बुद्धिप्रसङ्गः तत्र रूपसमवायसत्त्वेऽपि रूपाभावात् ।
भाषा-उसकी सिद्धिमें अनुमान प्रमाण है. जैसे ' दण्डी पुरुषः ' यह विशिष्ट
बुद्धिः दण्डरूप विशेषण तथा पुरुषरूप विशेष्य, दोनोंको ग्रहण करती हुई, उन
दोनोंके संयोगरूप सम्बन्धकोभी विषय करती है. वैसेहि, गुण क्रियादि विशिष्ट
बुद्धिभी विशिष्ट बुद्धि होनेसे गुणक्रियादि विशेषण तथा गुणक्रियादिमान्
विशेष्य इन दोनोंको विषय करतीं हुई इन दोनोंके सम्बन्धकोभी विषय करती है.
१ शंका-यद्यपि लाघवसे एक समवाय सिद्ध होनेसे प्राचीनोंके मतमें दोष नहीं
तथापि समवाय नाना माननेवाले नवीनोंके मतमें उक्तानुमानसे समवायसिद्धि नहीं होती।
किन्तु समवाय नाना कल्पनाकी अपेक्षा स्वयं उपस्थित स्वरूप नाना माननेही उचित हैं.
(समा०) नव्यमतमें समवायेन पटकार्यके प्रति तादात्म्येन तन्तुओंको हेतुता है. पटमें
रहनेवाली कार्य्यताका अवच्छेदक सम्बन्ध समवाय है. शंका-समवायके स्थानमें स्वरूप
सम्बन्ध मानके भी कार्य कारण भावकी कल्पना होसकती है (समा०) एवं जिसमें
समवायेन कार्य्यकी उत्पत्ति होती है वह समवायि कारण है.) यह समवायिकारणकी व्यवस्था
न रहेगी. शंका-जिसमें सम्बद्ध होकर कार्य्य उत्पन्न होय वह समवायि कारण ऐसा
कहनेसेभी निर्वाह होसकता है. (समा०) ऐसे कहनेसे कपालोंमें सम्बद्ध जो घटका
ध्वंस उसके प्रतिभी कपालोंको समवायि कारणता माननी होगी यह उचित नहीं
इससे यह सिद्ध हुआ कि भावकार्य्यमें रहनेवाला जो कार्य्यतारूप धर्म, उसका अवच्छे-
दक सम्बन्ध समवाय है. एवं कार्य्यतावच्छेदक सम्बन्धविधया नव्यमतमेंभी समवाय
की सिद्धि हुई.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३७
इस अनुमानसे संयोगसम्बन्धका तो प्रकृतमें बाध है इसलिये समवायही की
सिद्धि होती है; क्योंकि संयोग दो द्रव्यपदार्थों हीका होताहै. शंका-अयुत
सिद्ध पदार्थोंका स्वरूप सम्बन्ध कहनेवाले मीमांसकके मतमें इस अनुमानसे
सिद्ध साधन हुआ और समवायसाधनके लिये प्रवृत्त नैयायिकको अर्थान्तर हुआ,
अर्थात् समवायसाधनार्थ प्रवृत्त नैयायिकको स्वरूपकी सिद्धि हुई तो अर्थान्तर हुआ.
समाधान-अनेक स्वरूप सम्बन्ध कल्पना करनेमें गौरव है, इससे लाघवसे प्रकृता
नुमानद्वारा एक समवाय की सिद्धि माननीही उचित है. शंका-यदि समवाय
एक है तो स्पर्शसमवाय तथा रूपसमवायको एक होनेसे वायुमें रूपवत्ता बुद्धिको
प्रमात्व होना चाहिये. समाधान-वायुमें रूपसमवायके होनेसेभी प्रतियोगित्व
सम्बन्धसे रूपके वहां न होनेसे वायुमें रूपवत्ता प्रतीति नहीं होती.
न चैवमभावस्यापि वैशिष्ट्यं सम्बन्धान्तरं सिद्ध्येदिति वाच्यम्,
तस्य नित्यत्वे भूतले घटानयनानन्तरमपि घटाभावबुद्धिप्रसंगात्,
घटाभावस्य तत्र सत्त्वात्, तस्यच नित्यत्वात्। अन्यथा देशान्तरे
ऽपि तत्प्रतीतिर्न स्यात्, वैशिष्ट्यस्य च तत्र सत्त्वात्, ममतुमते घटे
पाकरक्ततादशायां श्यामरूपस्य नष्टत्वात् न तद्वत्ता बुद्धिः। वै-
शिष्ट्यस्यानित्यत्वे त्वनन्तवैशिष्ट्यकल्पने तवैव गौरवम् ।
इत्थंच तत्तत्कालीनतत्तद्भूतलादिकं तत्तदभावानां सम्बन्धः॥११॥
शंका-इसरीतिसे अभावका भी भूतलादिकोंमें 'वैशिष्ट्य' संज्ञक सम्बन्धा-
न्तर अतिरिक्त पदार्थ सिद्ध होगा. समा०-अतिरिक्त मानना यदि आपको
अंगीकार होय तो हम पूछते हैं कि-क्या वह वैशिष्ट्य नित्य है अथवा अनित्य
है ? यदि नित्य कहो तो भूतलमें घट लानेके पश्चात्भी घटाभाव बुद्धि होनी
१ अर्थात् “ घटाभाववद्भूतलं ” इत्यादि ज्ञानकालीन घटाभावविषयक बुद्धि
विशिष्ट तत्तद्भूतलादिक तत्तदभावोंका स्वरूपसम्बन्ध है. भाव यह कि-तत्तत्क्षणा-
त्मक कालभी अभावके स्वरूपमें विशेषणरूपेण भान होताहै ऐसा हमको अभिमत है. एवं
यद्यपि घटात्यन्ताभाव स्वरूपेण भूतलादिकोंमें नित्य है इसलिये घट विद्यमान दशामेंभी
“ घटाभाववद्भूतलं ” इत्याकारक बुद्धि हुई चाहिये ॥ तथापि “घटाभाववद्भूतलं” इत्यादि
ज्ञानकालिक तत्तत्क्षणरूप विशेषणके अभाव होनेसे घटसत्त्वकालमें घटाभावावगाहनी
प्रतीति नहीं होसकती क्योंकि उस कालमें तत्तद्क्षणरूप विशेषणके न होनेसे विशेषणाभाव
प्रयुक्त विशिष्टाभाव कह सकते हैं.
२
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१८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
चाहिये, क्योंकि घटाभाव नित्य है, याते घटवाले भूतलभेंभी घटाभाव सिद्ध है
( अन्यथा ) घटाभावको अनित्य मानो तो घटशून्यदेशमेंभी घटाभावकी
प्रतीति नहीं हुई चाहिये; क्योंकि घटाभाव सर्वत्र एक जैसा है, सो वह
घटके लानेसे नाश हो चुका है और अभाव का ‘वैशिष्ट्य’ संज्ञक सम्बन्ध तो घट
के लानेसेभी भूतलेमें विद्यमान है. शंका- समवायको एक माननेवाले तुम
सिद्धान्तीके मतमेंभी अग्निसंयोगसे रक्त हुए घटमें प्रथम होनेवाले श्यामरूप-
का समवाय तो है, वहां श्यामरूपवत्ता बुद्धि होनी चाहिये? समाधान- मेरे मतमें
तो घटकी पाकरक्तता दशामें श्यामरूपका नाश हुआ है, उसके समवायके होनेसेभी
प्रतियोगित्वसम्बन्धसे उसके न होनेसे ‘तद्वत्ता बुद्धि’ नहीं होती; क्योंकि प्रत्यक्षमें
विषयकोभी विषयत्वेन कारणता है और तुम यदि ‘वैशिष्ट्य’ को अनित्य मानो
तो अनन्त वैशिष्ट्य कल्पनामें तुमको गौरवभी होगा. शंका- वैशिष्ट्यको न
मानकर यदि घटाभावकाभूतलादिमें स्वरूपसम्बन्धभी माने तो तौभी पूर्ववत् घटवाले
भूतलभेंभी घटाभावबुद्धि होनी चाहिये? **समाधान-**हमारे मतमें केवल स्वरूप
मात्रही सम्बन्ध नहीं है; किन्तु, घटाभावज्ञानकालमें जिस जिस भूतलमं घटाभाव
बुद्धि है वह वह भूतलादिकही उस उस अभावका स्वरूपसम्बन्ध विशेष है, इस
रीतिसे पूर्वोक्त अतिप्रसंगभी नहीं है ॥ ११ ॥
अभावं विभजते, अभावस्त्विति-
भाषा-‘अभावस्तु’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार अभावका विभाग दिखलाता है-
अभावस्तु द्विधा संसर्गान्योऽन्याभावभेदतः ॥
भाषा-संसर्गाभाव तथाअन्योन्याभाव भेदसे अभाव दो प्रकारका है.
अभावत्वं द्रव्यादिषट्कान्योऽन्याभाववत्त्वम् । संसर्गेति । संस-
र्गाभावान्योन्याभावभेदादित्यर्थः । अन्योन्याभावस्यैकविधत्त्वा-
त्तद्विभागाभावात् ।
भाषा-द्रव्यादि षट्कसे भिन्नका नाम अभाव है. यह सामान्यरूपसे अभावका
लक्षण है. वह अभाव संसर्गाभाव और अन्योन्याभाव भेदसे दो प्रकारका है. अन्यो-
न्याभावको एक तरहका होनेसे उसका विभाग नहीं है.
१ यह अभावका लक्षण अन्योऽन्याभावघटित है और वक्ष्यमाण अन्योन्याभावका लक्षण
सामान्यरूपसे अभावघटित है, एवं यह लक्षण परस्पराश्रयरूप दोषसे दूषित हुआ, इस लिये
समवाय सामानाधिकरण्यान्यतर सम्बन्धविच्छिन्न प्रतियोगिताक सत्ताभावरूप ही अभावका
निर्वचन मानना उचित है.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १९
संसर्गाभावं विभजते, प्रागभाव इति-
भाषा-'प्रागभाव' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार संसर्गाभावके विभागको दिखलाताहै-
प्रागभावस्तथा ध्वंसोऽप्यत्यन्ताभाव एव च ॥ १२॥
एवं त्रैविध्यमापन्नः संसर्गाभाव इष्यते ॥
भाषा-प्रागभाव तैसे ध्वंस और अत्यन्ताभाव ॥ १२ ॥ एवं तीन भेदोंको प्राप्त
हुआ एकही संसर्गाभाव है.
संसर्गाभावत्वं अन्योन्याभावभिन्नाभावत्वम् । अन्योऽन्याभावत्वं
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावत्वम्। विनाश्यभा-
वत्वं प्रागभावत्वम् । जन्याभावत्वं ध्वंसत्वम् । नित्यसंसर्गाभा-
वत्वं अत्यन्ताभावत्वम् । यत्र तु भूतलादौ घटादिकमपसारितं
पुनरानीतं च तत्र घटकालस्य सम्बन्धाघटकतयाऽत्यन्ताभावस्य
नित्यत्वेऽपि घटकाले न घटात्यन्ताभावबुद्धिः । तत्रोत्पादविना-
शशाली चतुर्थोऽयमभाव इति केचित् ।
भाषा-अन्योन्याभावसे भिन्न अभावका नाम 'संसर्गाभाव' है और जिसकी तादा-
त्म्यसम्बन्धावच्छिन्ना प्रतियोगिता होय उसका नाम 'अन्योन्याभाव' है; विनाश
होनेवाले अभावका नाम 'प्रागभाव' है. एवं उत्पन्न होनेवाले अभावका नाम
ध्वंस है. अधिकरणपदार्थमें वस्तुके सदा सम्बन्धाभावका नाम 'अत्यन्ता-
भाव' है. जहां किसी एक भूतलदेशसे घटादि निकाल दिये और कालान्तरमें
फिर वहींदी स्थापन किये; वहां विशेषणरूप वर्तमान घटकालको अभावके स्वरूप-
सम्बन्धमें अविष्ट होनेसे अत्यन्ताभावके नित्य होनेसेभी घटकालमें घटात्यन्ता-
भावबुद्धि नहीं होती. कई एक आचार्य ऐसे स्थलमें उत्पत्तिविनाशवाला चौथा
अभाव मानते हैं.
अत्र ध्वंसप्रागभावयोरधिकरणे नात्यन्ताभाव इति प्राचीनमतम्।
श्यामघटे रक्तो नास्तीति, रक्तघटे श्यामो नास्तीति धीश्च प्राग-
भावं ध्वंसं चावगाहते, नतु तदत्यन्ताभावम् । नव्यास्तु तत्र
१ द्वितीय नाम इसका शास्त्रमें सामयिकाभाव है. समयविशेषमें होनेवालेका नाम
'सामयिकाभाव' है.
२० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
विरोधे मानाभावाद्ध्वंसादिकालावच्छेदेनाऽप्यत्यन्ताभावो वर्तत
इतिप्राहुः। नन्वस्त्वभावानामधिकरणात्मकत्वं लाघवादिति चेत्,
न,अनन्ताधिकरणात्मकत्वकल्पनामपेक्ष्यातिरिक्तकल्पनायाएव
लघीयस्त्वात् । एवं चाधाराधेयभावोऽप्युपपद्यते । एवं च तत्त-
च्छब्दगन्धरसाद्यभावानां प्रत्यक्षत्वमुपपद्यते, अन्यथा तत्तदधि-
करणानां तत्तदिन्द्रियाग्राह्यत्वादप्रत्यक्षत्वं स्यात् । एतेन ज्ञान-
विशेषकालविशेषाद्यात्मकत्वमत्यन्ताभावस्येति प्रत्युक्तम्, अ-
प्रत्यक्षत्वापत्तेः ।
भाषा-यहां प्राचीनाचार्योंका यह सिद्धांत है कि-ध्वंस तथा प्रागभावके
अधिकरणमें अत्यन्ताभाव नहीं रहता है. 'श्यामघटमें रक्तरूप नहीं है तथा रक्तघट-
में श्यामरूप नहीं है,' इत्यादि प्रतीतिसें रक्तरूपके प्रागभावका तथा श्यामरूपके
ध्वंसका अवगाहन होता है; किन्तु, उनके अत्यन्ताभावका अवगाहन नहीं होता,
क्योंकि प्रागभावका तथा ध्वंसका अत्यन्ताभावके साथ विरोध है और नवीन तो
यह कहते हैं कि-उनके परस्पर विरोधमें कोई प्रमाण नहीं. जिस कालमें ध्वंस
तथा प्रागभाव रहते हैं उसी कालमें अत्यन्ताभावभी उसी अधिकरणमें रहताहै
प्रभाकर शंका-लाघवसे अभावोंको तत्तदधिकरणस्वरूपही मानना उचित है.
समा०-अनेक अधिकरणस्वरूप कल्पनाकी अपेक्षा अभावोंकी अतिरिक्त कल्प-
नाही लघुभूता है. एवं अभावोंको अधिकरणोंसे अतिरिक्त माननेसे उनका आ-
धाराधेयभावभी बनसक्ता है. ऐसे माननेसे 'तत् तत्' शब्द गन्धरसादियों के
अभावका प्रत्यक्षभी बनसकता है. (अन्यथा) अभावोंको अधिकरण स्वरूप माने
तो अभावोंका साक्षात्कार नहीं होगा; क्योंकि शब्द गन्ध रसादिके अभावके अ-
धिकरण भूतलजलादि श्रोत्रघ्राणादि इन्द्रियोंसे ग्राह्य नहीं हैं. अभावोंको अधिक-
रणस्वरूप माने तो उनका ग्रहणभी नहीं होगा. इस वक्ष्यमाण कथनसे अत्यन्ताभाव-
को ज्ञानविशेषस्वरूप, अथवा कालविशेषस्वरूप माननेवालोंका सिद्धान्तभी खण्डित
किया, क्योंकि ऐसे माननेसे अत्यन्ताभावका प्रत्यक्ष नहीं होगा.
१ शंका-अभावाधिकरणका भावको तथा अभावप्रतियोगिताक अभावको जैसे आपने
अधिकरणस्वरूप मानकेभी आधाराधेय भावकी उपपत्ति करी है वैसेही प्रत्येक स्थलमें
अभावको अधिकरणस्वरूप मानकर आधाराधेय भावभी मानलिया जाय तो हानि क्या है?
समा०-इस रीतिसे इस दोषके वारण कियेभी 'तत्तत्' शब्द गन्धरसादिके अप्रत्यक्ष होनेका
दोष बना है इसी तात्पर्यसे मुक्तावलीकारने "एवंच "इत्यादि ग्रन्थसे द्वितीय दोष लिखाहै.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २१
इदानीं पदार्थानां साधर्म्यं वैधर्म्यं च वक्तुं प्रक्रमते, सप्तानामित्यादि-
भाषा-अब 'सप्तानां' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार पदार्थोंके समानधर्म्म तथा विरुद्ध
धर्म्मोंको कहता है-
सप्तानामपि साधर्म्यं ज्ञेयत्वादिकमुच्यते ॥ १३ ॥
भाषा-द्रव्यादि सात पदार्थोंका समानधर्म्म ज्ञेयत्वादिक कहाहै ॥ १३ ॥
समानो धर्मो येषां ते सधर्माणस्तेषां भावः साधर्म्यम्, समानो
धर्म इति फलितोऽर्थः । एवं विरुद्धो धर्मो येषां ते विधर्माण-
स्तेषां भावो वैधर्म्यम्, विरुद्धो धर्म इति फलितोऽर्थः । ज्ञेयत्वं
ज्ञानविषयता, साच सर्वत्रैवास्ति, ईश्वरादिज्ञानविषयतायाः
केवलान्वयित्वात्। एवमभिधेयत्वप्रमेयत्वादिकं बोध्यम् ॥२॥१३॥
भाषा--जितने पदार्थ परस्पर एक धर्म्मवालेहैं,उनमेंरहनेवाले धर्म्मका नाम समान
धर्म्म है. एवं जितने पदार्थ परस्पर विपरीतधर्म्मवाले हैं उनमें रहनेवाले धर्म्मका
नाम विरुद्ध धर्म्म है. 'ज्ञेयत्व' शब्दसे ज्ञानकी विषयताका ग्रहण है. वह
ज्ञानकी विषयता सर्वत्र विद्यमान है, क्योंकि ईश्वर और योगीकी ज्ञानीय विषयता-
को केवलान्वयि मानाहै. एवं 'अभिधा' नाम संकेतका है. उस संकेतीय विषय-
ताका नाम 'अभिधेयत्व' है. एवं 'प्रमा' नाम पदार्थज्ञानका है. उसकी विषयता
का नाम प्रमेयत्व है. यहां आदि शब्दसे अस्तित्त्व कालसम्बन्धित्व आदि धर्म्मोंका
ग्रहण है. द्रव्यादिषट्का समानधर्म्मभावत्व प्रसिद्ध है; इससे उसको छोड़कर
पञ्चोंका कहता है ॥
द्रव्यादयः पञ्चभावा अनेके समवायिनः ॥
भाषा-द्रव्यादि पञ्च पदार्थ भावरूप हैं, अनेक हैं तथा समवायी हैं ॥
द्रव्येति । द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषाणां साधर्म्यमनेकत्वं
समवायित्वं च । यद्यप्यनेकत्वमभावेऽप्यस्ति, तथाऽप्यनेकत्वे
सति भावत्वं पञ्चानां साधर्म्यम् । तथाचानेकभाववृत्तिपदार्थ-
१ विषयमें रहनेवाले ज्ञानादिनिरूपित धर्म्मविशेषका नाम विषयता है.
२ यावत् पदार्थोंमें रहनेवाले धर्म्मोंको न्यायसिद्धान्तमें केवलान्वयी माना है.
२२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
विभाजकोपाधिमत्त्वमिति फलितोऽर्थः । तेन प्रत्येकं घटादावा-
काशादौ च नाव्याप्तिः ।
भाषा-द्रव्य गुण कर्म्म सामान्य विशेष इन पञ्चोंका समानधर्म्म अनेकत्व तथा
समवायित्व है. यद्यपि अनेकता अभावमेंभी है उसमें इस लक्षणकी अतिव्याप्ति होगी
तथापि अनेकत्वविशिष्ट भावत्व पञ्चोंका समान धर्म्म है; इसकाभी अनेकभाव
पदार्थोंमें वर्तनेवाली जो पदार्थकी विभाजक द्रव्यत्व गुणत्वादि उपाधि तादृश
उपाधिमत्त्वं ऐसा अर्थ करना. एवं प्रत्येक घटादिव्यक्तिमें वा आकाशाँदि लक्षोंमें
लक्षणकी अव्याप्ति नहीं है. अन्यथा अनेकत्वविशिष्टभावत्व प्रत्येक घटमें तथा
आकाशादिमें नहीं है. अव्याप्ति अवश्य होगी.
समवायित्वं समवायसम्बन्धेन सम्बन्धित्वम्, नतु समवायवत्त्वं
सामान्यादावभावात्। तथाच समवेतवृत्तिपदार्थविभाजकोपाधि-
मत्त्वमिति फलितोऽर्थः । तेन नित्यद्रव्येषु नाव्याप्तिः ।
भाषा-समवायिशब्दका अर्थ समवायसम्बन्धसे सम्बन्धवाला है; किन्तु अनु-
योगितासम्बन्धसे समवायवाला इतनामात्र नहीं है; क्योंकि सामान्य तथा विशे-
षमें समवायसम्बन्धसे कोई पदार्थ नहीं रहता, इसकाभी समवेतपदार्थमें वर्तने-
वाली जो पदार्थकी विभाजक.द्रव्यत्वगुणत्वादि उपाधि तादृश 'उपाधिमत्त्वं' ऐसा
अर्थ करना. एवं ऐसा जातिघटित विवरण करनेसे भूतलादि चतुष्टयके परमाणु
तथा आकाशादि पञ्च इन नित्य द्रव्योंमें अव्याप्ति नहीं है. यहां "समवेतसमवेत-
वृत्तिपदार्थविभाजकोपाधिमत्त्वं" द्रव्यादि चारोंका समान धर्म्मभी जानना चाहिये.
सत्तावन्तस्त्रयस्त्वाद्याः-
भाषा-आद्यके तीन पदार्थोंका सत्तावत्त्व समान धर्म्म है.
-गुणादिर्निर्गुणक्रियः ॥ १४ ॥
भाषा-एवंगुणादि षट्का निर्गुणत्व निष्क्रियत्वरूप समान धर्म्म है ॥ १४ ॥
सत्तावन्तइति। द्रव्यगुणकर्मणां सत्तावत्त्वमित्यर्थः ।
भाषा-द्रव्य, गुण और कर्म्म, इन तीनोंका सत्तावत्त्व समान धर्म्म है.
गुणादिरिति।यद्यपि गुणक्रियाशून्यत्वमाद्यक्षणे घटादावतिव्याप्तम्,
१ सह उत्पन्नोंका कार्यकारण भाव संसारमें अदृष्ट चर है. एवं परस्पर कार्य्य
कारणभावके अनुरोधसे घटादि कार्य्यद्रव्योंसे क्षणमात्र पीछे गुणक्रियादिकी उत्पत्ति
मानी है.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २३
क्रियाशून्यत्वं च गगनादावतिव्याप्तम् । तथापि गुणवदवृत्तिधर्म-
वत्त्वं कर्मवदवृत्तिपदार्थविभाजकोपाधिमत्त्वं तदर्थः । नहि घट-
त्वादिकं द्रव्यत्वं वा गुणवदवृत्ति कर्मवदवृत्ति वा। किन्तु गुणत्वा-
दिकं तथा, आकाशत्वादिकं तु न पदार्थविभाजकोपाधिः ।
भाषा—यद्यपि गुणशून्यता तथा क्रियाशून्यता प्रथमक्षणमें घटादि कार्योंमेंभी है
वहां गुणादि लक्षणकी अति व्याप्ति होगी. एवं क्रियाशून्यता गगनादिमेंभी है.
वहांभी उक्त लक्षणकी अतिव्याप्ति होगी तथापि उक्त लक्षणका 'गुणवत् जो द्रव्य उसमें
न वर्तनेवाले जो गुणत्वादि धर्म तादृशधर्म्मवत्त्व' ऐसा विवरण करना उचित है.
किंवा 'क्रियावाला जो द्रव्य उसमें न वर्तनेवाली जो पदार्थकी विभाजकगुणत्वादि
उपाधि तादृश उपाधिमत्त्व' ऐसा विवरण करना उचित है. एवं घटादिमें दोष नहीं
है. क्योंकि घटत्वादि धर्म किंवा द्रव्यत्वरूप धर्म गुणवालेमें वा क्रियावालेमें न
वर्तनेवाला नहीं है, किन्तु वर्तनेवालाही है. गुणक्रियावालेमें न वर्तनेवाले धर्म
गुणत्व कर्म्मत्वादि हैं तादृश धर्मवत्ता गुणकर्म्मादिमें सिद्ध है. आकाशत्वादि धर्म
तो पदार्थविभाजक उपाधि नहीं हैं किन्तु द्रव्यविभाजक उपाधि हैं. एवं उनमेंभी
दोष नहीं है.
यद्वा गुणवद्वृत्तित्व सति कर्मवद्वृत्तित्वे सति वा सत्ताव्याप्य-
जातिशून्यभावत्वं विवक्षितम् । गुणकर्मणोरव्याप्तिवारणाय
गुणवद्वृत्ति कर्मवद्वृत्तीति वा । पुनस्तत्रैवाव्याप्तिवारणाय
सत्ताव्याप्येति । व्याप्तिश्च भेदगर्भा निवेशितेत्यतो न दोषः ।
द्रव्यगुणान्यतरत्वमादाय तत्रैवाव्याप्तिवारणाय जातीति ।
अभावेऽतिव्याप्तिवारणाय भावत्वमिति । गुणवद्वृत्तिः सत्ताव्या-
प्यजातिर्द्रव्यत्वं तच्छून्यत्वं पञ्चानामस्त्येव ।
भाषा—अथवा गुणवालेमें वर्तनेवाली तथा कर्मवालेमें वर्तनेवाली जो सत्ताकी
व्याप्य 'द्रव्यत्व' रूपा जातिः तादृशजातिशून्यभावत्व' गुणादि पञ्चोंका समान
धर्म है. यहां गुणमें तथा कर्म्ममें अव्याप्तिवारणार्थ गुणवालेमें तथा कर्म्मवालेमें
वर्तनेवाली ऐसा कहा. केवल सत्ताके ग्रहण करनेसे पुनः गुणकर्म्ममें होनेवाली
अव्याप्तिके वारणार्थ 'सत्ताव्याप्यजाति' ऐसा कहा. यहां व्याप्यव्यापकभावकी व्याप्ति
भेदगर्भिता विवक्षणीय है. (अन्यथा) समानाधिकरणरूप व्याप्ति माने तो 'स्व' में स्व-
२४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
व्याप्यत्वकेभी होनेसे सत्ताकी व्याप्यजाति सत्ताभी होगी. उस सत्तासे शून्यगुण
कर्मादि नहीं हैं. उनमें उक्त लक्षणकी अव्याप्ति होगी, उस अव्याप्तिके वारणार्थ
भेदगर्भित व्याप्तिका निवेश करना उचित है “स्वसमानाधिकरणत्वे सति स्वसमा-
नाधिकरणभेदप्रतियोगित्वम्” यह उसका स्वरूप है. यहां दोनों ‘स्व’ पदसे
व्यापकसत्ताका ग्रहण है. ऐसे द्रव्यत्वरूप व्याप्य सत्तामें द्रव्यातर्भावेन व्यापक
सत्ताके साथ समानाधिकरणत्वभी है. और गुणान्तर्भावेन सत्तासमानाधिकरणमें जो
भेद, तादृश भेदप्रतियोगित्वभी है. ऐसी व्याप्ति माननेसे पूर्वोक्त अव्याप्तिरूप
दोष नहीं. सत्ताका व्याप्य द्रव्यगुणादि अन्यतरत्वस्वरूप अखण्डोपाधिरूप धर्म्मभी
है उससे शून्य गुणादि नहीं हैं. लक्षणकी अव्याप्ति होगी उसके वारणार्थ ‘जाति’
पद कहा. अभावमें अतिव्याप्तिवारणार्थ भावत्वका निवेश किया. गुणवालेमें वर्तने-
वाली सत्ताकी व्याप्य जाति (द्रव्यत्व) रूपा है. उससे शून्यत्व गुणादि पांचोंको हैं.
सामान्यपरिहीनास्तु सर्वे जात्यादयो मताः ॥
भाषा-सामान्यादि सर्व पदार्थोंका सामान्यशून्यत्व समानधर्म्म है.
सामान्येति । सामान्यानाधिकरणत्वं सामान्यादीनामित्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् सामान्यादि चारों पदार्थ सामान्यके अधिकरण नहीं हैं.
पारिमाण्डल्यभिन्नानां कारणत्वमुदाहृतम् ॥ १५ ॥
भाषा-पारिमाण्डल्यसे भिन्न पदार्थोंका कारणतारूप समान धर्म है ॥ १५ ॥
पारिमाण्डल्येति । पारिमाण्डल्यमणुपरिमाणं कारणत्वं तद्भि-
न्नानामित्यर्थः । अणुपरिमाणं तु न कस्यापि कारणम् । तद्धि
स्वाश्रयारब्धद्रव्यपरिमाणारम्भकं भवेत्।तच्च न सम्भवति, परि-
माणस्य स्वसमानजातीयोत्कृष्टपरिमाणजनकत्वनियमात्,मह-
दारब्धस्य महत्तरत्ववदणुजन्यस्याणुतरत्वप्रसंगात् । एवं परम-
१ परमाणु तथा द्व्यणुकके परिमाणका नाम अणुपरिमाण है,
२ “तद्धि अणुपरिमाणं हीत्यर्थः । यदि कारणं स्यात्तदा स्वाश्रयारब्धद्रव्यपरिमा-
णारम्भकं भवेत्” अर्थात् परमाणुका परिमाण द्व्यणुकके परिमाणका वा द्व्यणुकका परिमाण
त्र्यणुकके परिमाणका असमवायिकारणत्वेन आरम्भक मानना होगा.
३ शंका-अणुपरिमाणसे जन्य परिमाणको अधिकअणु होनेसेभी दोष क्या है ?
समाधान-त्र्यणुकका चाक्षुष ज्ञान नहीं होगा. शंका-तौ फिर द्व्यणुक त्र्यणुकके परिमाणका
जनक कौन मानना चाहिये? समाधान-उसका जनक परमाणुगत संख्या है. इसी वार्त्ताका
यथावत् स्पष्टीकरण गुणनिरूपणावसरमें होगा.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २६
महत्परिमाणमतीन्द्रियं सामान्यं विशेषाश्च बोध्याः। इदमपि योगि-
प्रत्यक्षे विषयस्य न कारणत्वम् ।
भाषा-पारिमाण्डल्य नाम अणुपरिमाणका है. उससे भिन्नपदार्थोंका कारणतारूप
समान धर्म्म है.अणुपरिमाणको तो किसी कार्य्यके प्रतिभी कारणता नहीं है; क्योंकि
यदि उसमें कारणता मानेभी तो वह ( स्व ) अपने आश्रय जो परमाणु तथा
द्व्यणुक उनसे उत्पन्न होनेवाले द्व्यणुकत्र्यणुकरूपद्रव्यके परिमाणकाही जनक मान-
ना होगा, सो बनता नहीं; क्योंकि परिमाणका लोकमें यह स्वभाव देखनेमें आता
है कि वह ( स्व ) अपने सजातिसे ( उत्कृष्ट ) अधिक परिमाणकाही जनक होता है.
जैसे कपालद्वयके महत्परिमाणसे घटका अधिक महत्परिमाण उत्पन्न होता है,
वैसेही परमाणु तथा द्व्यणुकमें रहनेवाले अणुपरिमाणकोभी द्वयणुक तथा त्र्यणुकके
परिमाणके प्रति कारणता माने तो पूर्वोक्त न्यायसे द्वयणुक तथा त्र्यणुकका परिमाण
औरभी अधिक अणु होगा. ऐसेही कालादिके परम महत्परिमाणको तथा परमाणु
आदिके परमाणुत्वादि अतीन्द्रिय सामान्यको तथा विशेष पदार्थकोभी किसीके प्रति
कारणता नहीं है. यहभी जानने योग्य है. परन्तु यह “पारिमण्डल्यभिन्नानां”
इत्यादि ग्रन्थ उन नवीन आचार्योंके अभिप्रायसे है कि जो आचार्य्य योगीके प्रत्यक्षमें
विषयको कारणता नहीं मानते.
ज्ञायमानं सामान्यं न प्रत्यासत्तिः । ज्ञायमानं लिङ्गं नानुमिति-
करणमित्यभिप्रायेण । मानसप्रत्यक्षे आत्ममहत्त्वस्य कारणत्वा-
न्महत्परिमाणं कालादेर्बोध्यम् । तस्यापि न कारणत्वमित्याचा-
र्याणामाशयः इत्यन्ये । तन्न, ज्ञानातिरिक्तं प्रत्येवाकारणताया
आचार्य्यैरुक्तत्वात् ।
१ वर्तमान कालिक जो ज्ञान तादृश ज्ञानविषयीभूत सामान्य 'ज्ञायमानसामान्य' है.
२ यहां नवीनोंका यह सिद्धान्त है कि पार्थिवादि परमाणुओंका भेदक विशेष पदार्थ
नहीं, किन्तु विशेषका ज्ञानभेदक है. ऐसे ज्ञायमानसामान्य सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति
नहीं, किन्तु सामान्यका ज्ञानमात्र सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति है. ऐसेही ज्ञायमान लिङ्गभी
अनुमितिका कारण नहीं, किन्तु लिङ्गका ज्ञानमात्र अनुमितिका करण है और प्राचीनोंने तो
परमाणु परिमाणकोभी योगीके प्रत्यक्षमें विषयत्वेन कारण माना है; तैसे “परमाणुः अणु-
परिमाणवान्” इस ज्ञानके पश्चात् “सर्वे परमाणवः अणुपरिमाणवन्तः” इत्याकारक अलौकिक
प्रत्यक्ष सामान्यलक्षणाप्रत्यासत्तिसे होता है. इसमें सम्बन्धरूपेण अणु परिमाणकोभी
कारण माना है. तैसे 'परमाणुः द्रव्यं अणुपरिमाणात् ' इस अनुमितिमें अणुपरिमाणको
करणत्वेन कारण स्पष्टही माना है; परन्तु यहां मूल ग्रन्थ नवीनोंके सिद्धान्तसे लिखा है.
२६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-तथा ज्ञायमानसामान्यको प्रत्यासत्ति नहीं मानते, तैसे ज्ञायमान लिङ्गको
अनुमितिकरण नहीं मानते हैं. “ज्ञानवानहम्, इच्छावानहम्” इत्याकारक आत्माके
मानसप्रत्यक्षमें आत्माके परम महत् परिमाणकोभी कारणता है. इससे कारणता
शून्य परममहत्परिमाण आकाशादिकोंका जानना चाहिये. कई एक नैयायिक
उदयनाचार्यके आशयको लेकर आत्माके महत्परिमाणकोभी कारणता नहीं
मानते. सो सम्यक् नहीं;क्योंकि ज्ञानसे अतिरिक्त कार्यके प्रति आत्ममहत्परिमाण-
की कारणताका निषेधही उदयनाचार्यका आशय है.
ननु कारणत्वं किमत आह, अन्यथेति-
शंका-कारणता क्या पदार्थ है ? समाधान-उसको मूलकार ‘ अन्यथा ’
इत्यादि ग्रन्थसे स्वयं कहता है ॥
अन्यथा सिद्धिशून्यस्य नियता पूर्ववर्तिता ॥
कारणत्वं भवेत्तस्य त्रैविध्यंपरिकीर्तितम् ॥ १६ ॥
समवायिकारणत्वं ज्ञेयमथाप्यसमवायिहेतुत्वम् ॥
एवं न्यायनयज्ञैस्तृतीयमुक्तं निमित्तहेतुत्वम् ॥१७॥
यत्समवेतं कार्यं भवति ज्ञेयं तु समवायिजनंक तत् ॥
तत्रासन्नं जनकं द्वितीयमाभ्यां परं तृतीयं स्यात् १८
भाषा-अन्यथा सिद्धिसे शून्यनियमसे कार्यके प्रथम रहनेवाला कारण होता है.
वह तीन प्रकारका है ॥ १६ ॥ प्रथमका नाम ‘समवायिकारण’ है. द्वितीयका
नाम ‘असमवायिकारण’ है. तृतीयका नाम न्यायवेत्ता पुरुषोंने ‘निमित्त कारण’ कहा
है ॥ १७ ॥ जिसमें समवायसम्बन्धसे कार्य उत्पन्न हो वह समवायिकारण है ॥
( तत्र ) समवायिकारणमें समवेत होकर जो कार्यका जनक हो वह ‘ असमवायि
कारण ’ है. इन दोनों कारणोंसे भिन्न जो कारण है वह ‘निमित्तकारण’ है ॥ १८ ॥
तस्य कारणत्वस्य।तत्र समवायिकारणे।आसन्नं प्रत्यासन्नं कारणं
द्वितीयमसमवायिकारणमित्यर्थः । अत्र यद्यपि तुरीतन्तुसंयो-
गांनां पटासमवायिकारणत्वं स्यात्, एवं वेगादीनामप्यभिघा-
१ भाव यह है कि-तुरीतन्तु संयोगभी अनुयोगित्वेन तन्तुसमवेत है और पटरूप
कार्य्यका जनकभी है. एवं उक्तलक्षणका लक्ष होनेसे तुरीतन्तुसंयोगभी पटका असमवायि
कारण होना चाहिये.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २७
ताद्यसमवायिकारणत्वं स्यात्, एवं ज्ञानादिकमिच्छाद्यसमवायि-
कारणं स्यात्, तथाऽपि पटासमवायिकारणलक्षणे तुरीतन्तुसंयो-
गभिन्नत्वं देयम्। तुरीतन्तुसंयोगस्तु तुरीपटसंयोगं प्रत्यसमवायि-
कारणं भवत्येव । एवं वेगादिकमपि वेगस्पन्दाद्यसमवायिकारणं
भवत्येवेति, तत्तत्कार्य्यासमवायिकारणलक्षणे तत्तद्भिन्नत्वं देयम् ।
भाषा-( अत्र ) यहां कारणलक्षणोंमेंसे असमवायि कारणके लक्षणानुसार यद्यपि
तुरीतन्तुओंके संयोगोंकोभी पटका असमवायि कारण होना चाहिये, ऐसेही वेग तथा
स्पर्शकोभी यथाक्रम अभिघाताख्य संयोगका तथा 'नोदनाख्य' संयोगका असम-
वायिकारण होना चाहिये, ( एवं ) ज्ञान इच्छाकोभी यथाक्रम इच्छा तथा प्रवृत्ति-
का असमवायिकारण होना चाहिये तथापि पटके असमवायिकारणके लक्षणमें
तुरीतन्तुसंयोगसे 'भिन्न' पदका निवेश करना उचित है अर्थात् तन्तुओंमें
समवेत हो और तुरीतन्तुसंयोगसे अन्य होकर पटका कारण हो, वही पटका
असमवायिकारण है और तुरीतन्तुसंयोगभी तुरीपटके संयोगके प्रति तो असम-
वायि कारण होसक्ता है, ऐसे वेगादिकभी वेगजन्य क्रियाके असमवायि कारण हो
सक्ते हैं, इसलिये तिस२विशेष कार्य्यके असमवायिकारणके लक्षणमें तिस२से भिन्न
पदका निवेश करना उचित है.
आत्मविशेषगुणानां तु कुत्राप्यसमवायिकारणत्वं नास्ति, तेन
१ शंका-तुरीतन्तुसंयोगकोभी पटके असमवायिकारणके लक्षणका लक्ष्यही माने
तो क्या दोष है? समाधान--नैयायिकोंने असमवायि कारणके नाशसे कार्य्यनाश
माना है, यदि तुरीतन्तुसंयोगभी पटका असमवायिकारण होगा तो उसके नाशसेभी पटका नाश
हुआ चाहिये और यह वार्त्ता देखनेमें तो नहीं आती याते उससे भिन्नत्वका निवेश
करना उचित है.
२ अर्थात् पटके असमवायिकारणके लक्षणमें 'तुरीतन्तुसंयोगभिन्नत्वे सति' का
निवेश करना चाहिये, ऐसे घटके असमवायिकारणके लक्षणमें 'चक्रकपालसंयोगभिन्नत्वे
सति' का निवेश करना चाहिये, तात्पर्य्य यह है कि-प्रत्येक कार्य्यके असमवायिकारणमें
निमित्तकारण तथा समवायिकारणका जो परस्पर संयोग उससे भिन्नत्वका निवेश.
करना उचित है.
३ यहां यह भाव है कि-आत्माके ज्ञानरूप विशेषगुणके प्रति आत्ममनःसंयोगको
असमवायिकारणता तो अवश्य माननीय है, एवं वही आत्ममनःसंयोग यदि अन्य
विशेष गुणोंकाभी असमवायि कारण बनसके तो आत्मविशेषगुणोंको परस्पर एक दूसरेके
प्रतिया किसी गुणान्तरके प्रति असमवायिकारणता माननी व्यर्थ है.
२८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
तद्भिन्नत्वं सामान्यलक्षणे देयमेव अत्र समवायिकारणे प्रत्यासन्नं
द्विविधम् । आद्यं यथा । घटादिकं प्रति कपालसंयोगादिकम् ।
तत्र कार्येण घटेन सह कारणस्य कपालसंयोगस्यैकस्मिन्
कपाले प्रत्यासत्तिरस्ति । द्वितीयं यथा।घटरूपं प्रति कपालरूप-
मसमवायिकारणम् । तत्र घटरूपं प्रति कारणं घटस्तेन सह
कपालरूपस्यैकस्मिन् कपाले प्रत्यासत्तिरस्ति । तथाच
क्वचित् समवायसम्बन्धेन, क्वचित्स्वसमवायिसमवायसम्बन्धेनेति
फलितोऽर्थः ।
भाषा—आत्माके ज्ञानादि विशेषगुणोंको तो किसी कार्यके प्रतिभी असमवायि
कारणता नहींहै; इसलिये 'आत्मविशेष गुणभिन्नत्वे सति' का निवेश तो यावत्
कार्य्यके असमवायि कारणके लक्षणमें करना उचित है. ( अत्र ) इस प्रकरणमें
समवायिकारणरूप अधिकरणमें कार्य्यके साथ असमवायि कारणका समानाधि-
करणरूप सम्बन्ध दो प्रकारका है. प्रथम कार्य्यके साथ एकाधिकरणमें सम्बन्ध
रूपहै; दूसरा कारणके साथ एकाधिकरणमें सम्बन्धरूप है. प्रथम जैसे घटा-
दि कार्य्यके प्रति कपालद्वय संयोगादि असमवायि कारण है, तहां घटरूप कार्य्य
के साथ कपालसंयोगरूप कारणका कपालस्वरूप एकाधिकरणमें एकार्थसम-
वेतत्वरूप सम्बन्ध है. दूसरा जैसे घटके रूपके प्रति कपालका रूप असमवायि-
कारण है. तहां घटके रूपके प्रति कारण घटही है उस घटके साथ कपालस्वरूप
एकाधिकरणमें कपालके रूपका 'एकार्थ समवेतत्व' रूप सम्बन्ध है. इसरीति
से कारणताके नियामक दो सम्बन्ध हैं; कहीं समवायसम्बन्ध है. जैसे घटके प्रति
कपालसंयोग समवायसम्बन्धसे असमवायिकारण है और कहीं स्वसमवायि
समवेतत्वसम्बन्ध है. जैसे घटके रूपके प्रति कपालका रूप स्वसमवायिसमवेतत्व
सम्बन्धसे कारण है. यहां ' स्व ' पदसे कपालके रूपका ग्रहण है, उसका सम-
वायि कपाल है; उस कपालमें समवेत घट है. एतादृश सम्बन्धसे कपालके रूपको
घट पर मान कर घटके रूपके प्रति असमवायिकारणता भी बन सकती है. यह
पूर्व कथनका फलितार्थ है.
इत्थंच कार्यैकार्थकारणैकार्थान्तरप्रत्यासत्त्या समवायिकार-
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २९
णे प्रत्यासन्नं कारणं ज्ञानादिभिन्नमसमवायिकारणमिति सामान्य-
लक्षणं पर्य्यवसन्नम्।आभ्यां समवायिकारणासमवायिकारणाभ्यां
परं भिन्नं कारणं तृतीयं निमित्तकारणमित्यर्थः ॥१६॥१७॥१८॥
भाषा-इस रीतिसे 'कार्य्यके साथ अथवा कारणके साथ समवायिकारणरूप
एकाधिकरणमें सम्बद्ध होकर जो ज्ञानादिकोंसे भिन्न कारण वही असमवायि कारण
है, यह सामान्यरूपसे असमवायिकारणका लक्षण नियत हुआ. समवायिकारण
असमवायिकारण दोनोंसे भिन्न जो कारण वह तीसरा निमित्त कारण है।१६।१७।१८
इदानीमन्यथासिद्धत्वमेव कियतां पदार्थानां तदाह, येनेत्यादिना-
भाषा-'येन' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कार्य्यके प्रति अन्यथासिद्ध पदार्थोंको
कहता है-
येन सह पूर्वभावः-
भाषा-जिस रूपसे कारणकी कार्य्यसे प्रथम विद्यमानता है.
यत्कार्य्यं प्रति कारणस्य पूर्ववर्त्तिता येन रूपेण गृह्यते तत्कार्य्यं
प्रति तद्रूपमन्यथासिद्धमितिभावः। यथा घटं प्रति दण्डत्वमिति ।
भाषा-अर्थात् जिस कार्य्य के प्रति कारणकी पूर्व विद्यमानता जिसरूपसे ग्रहण
होती है उस कार्य्यके प्रति कारणका वह रूप अन्यथा सिद्ध है.जैसे घट कार्य्यके प्रति
दण्डकी कारणता दण्डत्वेन रूपेण है याते दण्डत्व अन्यथा सिद्ध है.
द्वितीयमन्यथासिद्धमाह, कारणमिति-
भाषा--'कारणं' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दूसरी अन्यथासिद्धि दिखलाता है-
कारणमादाय वा यस्य ।
भाषा--अथवा कारणके ग्रहणपूर्वक जिसका ग्रहण हो वह अन्यथा सिद्ध है.
यस्य स्वातन्त्र्येणान्वयव्यतिरेकौ नस्तः किन्तु कारणमादायै-
वान्न्वयव्यतिरेकौ गृह्येते तदन्यथासिद्धम् । यथा दण्डरूपम् ।
अर्थात् जिसकी स्वतंत्ररूपसे कार्य्य के साथ नियतपूर्व्ववृत्तित्वरूपा व्याप्ति
न हो किन्तु मुख्य कारणके ग्रहणपूर्वक जिसका कार्य्यके साथ अन्वय व्यतिरेक
ग्रहण हो वह उस कार्य्यके प्रति अन्यथा सिद्ध है. ऐसा घटकार्य्यके प्रति दण्डका
रूप है.
तृतीयमाह, अन्यं प्रतीति-
३० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-'अन्यं प्रति' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार तीसरी अन्यथासिद्धि दिखलाताहै--
अन्यं प्रति पूर्वभावे ज्ञाते यत्पूर्वभावविज्ञानम् ॥ १९ ॥
भाषा-दूसरेके प्रति पूर्वविद्यमानता जानकर जिसकी प्रकृत कार्यके प्रति पूर्व-
विद्यमानता प्रतीत हो ॥ १९ ॥
अन्यं प्रति पूर्ववर्तित्वं गृहीत्वैव यस्य यत्कार्यं प्रति पूर्ववर्तित्वं
गृह्यते तस्य तत्कार्यं प्रत्यन्यथासिद्धत्वम् । यथा घटादिकं
प्रत्याकाशस्य ।
भाषा--अर्थात् कार्यान्तरके प्रति पूर्वविद्यमानता ग्रहणपूर्वक जिसकी जिस
कार्यके प्रति पूर्वविद्यमानता ग्रहण हो वह उस कार्यके प्रति अन्यथा सिद्ध है. ऐसा
घटादि कार्यके प्रति आकाश है.
आकाशस्य हि घटादिकं प्रत्याकाशत्वेनैव कारणत्वं स्यात्,
आकाशत्वंच शब्दसमवायिकारणत्वम्। अतः शब्दं प्रति जनकत्वं
गृहीत्वैव घटादिकं प्रति जनकत्वं ग्राह्यमतस्तदन्यथासिद्धम् ।
शब्दाश्रयत्वेन कारणत्वे काऽन्यथासिद्धिरितिचेत्, पञ्चमीति
गृहाण । अथाकाशस्य शब्दं प्रति जनकत्वे किमवच्छेदकमिति-
चेत्, कवत्वादिकं विशेषपदार्थो वेति ॥ १९ ॥
भाषा-घटादिकार्यके प्रति आकाशको आकाशत्वेन रूपेण कारणता है. वह
आकाशशब्दका समवायिकारणस्वरूप है. इस रीतिसे आकाशमें शब्दके प्रति
कारणता ग्रहणपूर्वक घटादिकार्यके प्रति कारणता ग्रहण होती है; इससे आकाश
अन्यथा सिद्ध है. शंका-आकाशको शब्दका समवायिकारण न कहें, किन्तु
शब्दका आश्रयमात्र मानके घटादिकार्यके प्रति कारण माने तो कौन अन्यथा सिद्धि
होगी? समाधान-इसरीतिसे पञ्चमी मानने योग्य है. शंका-आकाशमें शब्दकी
जनकताका अवच्छेदक कौन है? समाधान-ककार वकारादि वर्णहैं. शंका-कका-
रादिवर्ण तो नाना तथा अनित्य हैं. उनको अवच्छेदक माननेमें गौरव होगा-
समाधान-अथवा विशेष पदार्थको आकाशमें शब्दकी जनकताका अवच्छेदक
मानना चाहिये ॥ १९ ॥
चतुर्थमन्यथासिद्धमाह , जनकं प्रतीति-
भाषा-'जनकं प्रति' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार चौथी अन्यथा सिद्धि दिखलाताहै-
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३१
जनकंप्रति पूर्ववर्तितामपरिज्ञाय न यस्य गृह्यते ॥
भाषा-जिसकी कार्यसे पूर्वविद्यमानता कार्यके जनकको न जानकर न ग्रहण हो
किंतु जान कर हो वह उस कार्यके प्रति अन्यथा सिद्धहै.
यत्कार्यजनकं प्रति पूर्ववर्तित्वं गृहीत्वैव यस्य यत्कार्ये प्रति पूर्व-
वर्तित्वं गृह्यते तस्य तत्कार्यं प्रत्यन्यथासिद्धत्वम्,यथाकुलालपि-
तुर्घटं प्रति।तस्य च कुलालपितृत्वेन घटं प्रति जनकत्व एवान्य-
थासिद्धिः । कुलालत्वेन जनकत्वे त्विष्टापत्तिः, कुलालमात्रस्य
घटं प्रति जनकत्वात् ।
भाषा-अर्थात् घटरूपकार्यका जनक जो कुलाल उसके प्रति पूर्वविद्यमानता
ग्रहणपूर्वक कुलालके पिताकी घटकार्यके प्रति पूर्वविद्यमानता ग्रहण होती है.इससे
घटकार्यके प्रति कुलालका पिता अन्यथासिद्ध है. कुलालका पिताभी यदि 'कुलाल
पितृत्वेन' कारण माने तो अन्यथासिद्ध है और यदि कुलालत्वेन रूपेण कुलाल-
का पिताभी घटका जनक है तो वह कारणही है; क्योंकि कुलालमात्र घटका
जनक होताहै.
पञ्चममन्यथासिद्धमाह, अतिरिक्तमिति-
भाषा-'अतिरिक्तं' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार पञ्चमी अन्यथासिद्धि दिखलाताहै-
अतिरिक्तमथापि यद्भवेन्नियतावश्यकपूर्वभाविनः २०
भाषा-नियमसे कार्यके अवश्य पूर्व विद्यमान पदार्थोंसे अतिरिक्त यावत् पदार्थ
अन्यथासिद्ध हैं ॥ २० ॥
नियतावश्यकपूर्वभाविनोऽवश्यकॢप्तनियतपूर्ववर्तिन एव कार्य्य-
सम्भवे तद्भिन्नमन्यथासिद्धमित्यर्थः।अत एव प्रत्यक्षे महत्त्वं का-
रणमनेकद्रव्यत्वमन्यथासिद्धम् । तत्र हि महत्त्वमवश्यं कॢप्तं
तेनानेकद्रव्यत्वमन्यथासिद्धम् । नच वैपरीत्ये किं विनिगमक-
मिति वाच्यम्, महत्त्वत्वजातेः कारणतावच्छेदकत्वे लाघवात् २०
भाषा-कार्यके नियमसे प्रथम रहनेवाले कारणसमुदायसे कार्यका सम्भव
हो तो उससे भिन्न यावत् पदार्थ अन्यथासिद्ध हैं. ( अत एव ) आवश्यकॢप्त नियम
३२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
से प्रथम विद्यमानमें कारणता माननेहीसे प्रत्यक्षमें महत्त्व परिमाणको कारण और
अनेक द्रव्यत्वको अन्यथासिद्ध माना है। यहां अणुपरिमाण वालेसे भिन्न द्रव्यका
नाम अनेक द्रव्यत्व है। प्रत्यक्षमें महत्त्व अवश्यक्लृप्त है उससे अनेक द्रव्यत्व अन्य-
था सिद्ध है. शंका-यदि कोई अनेक द्रव्यत्वको प्रत्यक्षमें कारण तथा महत्त्वको
अन्यथा सिद्ध माने तो तुम्हारे पास एक पक्षके कहनेवाली युक्ति कौन है ?
समाधान-महत्त्वत्वजातिको कारणतावच्छेदक माननेमें शरीरकृत लाघव है॥२०॥
एते पञ्चान्यथासिद्धाः-
भाषा-ये पञ्च अन्यथा सिद्ध हैं.
दण्डत्वादिकमादिमम् ।
घटादौदण्डरूपादिद्वितीयमपि दर्शितम् ॥ २१ ॥
तृतीयं तु भवेद्व्योम कुलालजनकोऽपरः ।
पञ्चमोरासभादिःस्यात्-
भाषा-घटादि कार्यके प्रति प्रथम अन्यथा सिद्ध दण्डत्वादिक धर्म हैं. द्वितीय
दण्डके रूपादि हैं ॥ २१ ॥ तृतीय आकाश है. चतुर्थ कुलालपिता है. पञ्चम
रासभादि हैं ॥
रासभादिरिति। यद्यपि यत्किञ्चिद्घटव्यक्तिं प्रति रासभस्य निय-
तपूर्ववर्तित्वमस्ति, तथापि घटजातीयं प्रति सिद्धकारणभावै-
र्दण्डादिभिरेव तद्व्यक्तेरपिसम्भवे रासभोऽन्यथासिद्ध इति भावः।
भाषा-यद्यपि किसी एक घटव्यक्तिके पूर्वविद्यमानता गर्दभकोभी होसक्ती है
तथापि यावत् घटव्यक्तिके प्रति प्रसिद्ध कारणरूप दण्डादिकोंसेही उस व्यक्तिकाभी
निर्वाह होसक्ता है इसलिये रासभ सर्वथा अन्यथासिद्ध है ॥
एतेष्वावश्यकस्त्वसौ ॥ २२ ॥
भाषा-इन सबमें यह पञ्चम अन्यथासिद्ध तो आवश्यक है ॥ २२ ॥
एतेष्विति। एतेषु पञ्चस्वन्यथासिद्धेषु पञ्चमोऽन्यथासिद्ध आव-
श्यकः तेनैव परेषां चरितार्थत्वात् । तथाहि। दण्डादिभिरवश्य-
कॢप्तनियतपूर्ववर्तिभिरेव कार्य्यसम्भवे दण्डत्वादिकमन्यथा-
सिद्धम् ।
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३३
इन पूर्वोक्त अन्यथासिद्ध पदार्थोंमें पञ्चम अन्यथा सिद्ध अवश्य माननीय है ।
और पूर्वले चारोंकी पञ्चममें चरितार्थताभी होसक्तीहै. उसकी रीति यह है
कि-कारणरूपसे अवश्य सम्बद्ध और घटादि कार्यके नियमसे प्रथम रहनेवाले
दण्डादिकोंसे ही यदि कार्यका सम्भव हो तो दण्डत्वादि सभी सर्वथा अन्यथा-
सिद्ध हैं.
न च वैपरीत्ये किं विनिगमकमिति वाच्यम्।दण्डत्वस्य कारणत्वे
दण्डघटितपरंपरायाः सम्बन्धत्वकल्पने गौरवात् । एवमन्येषाम-
प्यनेनैव चरितार्थत्वं सम्भवतीति ॥ २२ ॥
शंका-घटकार्यके प्रति 'दण्डत्व' को कारण तथा 'दण्ड' को अन्यथा-
सिद्ध मानें तो दण्डमें कारणताका नियामक कौन है? समाधान-दण्डत्वको कारण
माननेसे 'स्वाश्रयजन्य भ्रमीवत्ता' सम्बन्धसे कारणता माननी होगी और दण्डको
केवल 'स्वजन्य भ्रमीवत्ता' सम्बन्धसे कारणता है; इससे प्रथम सम्बन्धमें दण्ड
घटित परम्परा रूप सम्बन्ध कल्पनामें गौरव है. ऐसेही दण्डरूप, आकाश, कुलाल
के पिताकाभी पञ्चम अन्यथासिद्धमेंही संग्रह हो सकता है ॥ २२ ॥
समवायिकारणत्वं द्रव्यस्यैवेति विज्ञेयम् ॥
गुणकर्ममात्रवृत्तिज्ञेयमथाप्यसमवायिहेतुत्वम्॥२३॥
भाषा-समवायिकारण होना केवल द्रव्यहीका समान धर्म है. एवं असमवायि
कारण होना केवल गुण कर्महीका समान धर्म है ॥ २३ ॥
गुणकर्मेति।असमवायिकारणत्वं गुणकर्मभिन्नानां वैधर्म्यं न तु
गुणकर्मणोः साधर्म्यमित्यत्र तात्पर्यम् । अथवाऽसमवायिकारण
वृत्तिसत्ताभिन्नजातिमत्त्वं तदर्थः। तेन ज्ञानादीनामसमवायिकार
णत्वाविरहेऽपि न क्षतिः ॥ २३ ॥
भाषा-यहां गुणकर्मके समान धर्मके कथनका तात्पर्य नहीं किन्तु असमवायि
कारणता गुण कर्मसे भिन्न पदार्थोंका विपरीत धर्म है. इस कथनमें तात्पर्य है! अन्यथा
आत्मविशेष गुणोंमें इस लक्षणकी अव्याप्ति होगी; अथवा असमवायिकारणतावालेमें
वर्तनेवाली जो सत्ताभिन्न 'गुणत्व कर्मत्व' रूपा जातिः तादृश जातिमत्त्वही गुणकर्म
का समान धर्म है, ऐसा जातिघटित लक्षण करनेसे आत्मविशेष गुण ज्ञानादिकोंमें
असमवायिकारणताके न होनेसे भी अव्याप्ति नहीं है ॥ २३ ॥
३
३४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य आश्रितत्वमिहोच्यते ॥
भाषा-नित्य द्रव्योंसे अन्यपदार्थोंका आश्रितत्वरूप समान धर्म्म है.
अन्यत्रेति। नित्यद्रव्याणि परमाण्वाकाशादीनि विहायाश्रितत्वं
साधर्म्यमित्यर्थः । आश्रितत्वंतु समवायादिसम्बन्धेन वृत्तिमत्त्वम् ।
विशेषणतया नित्यानामपि कालादौ वृत्तेः । कालिकसम्बन्धान्य-
सम्बन्धेनाऽवृत्तित्वमिति परमार्थः, तेन समवायेनावृत्तावपि न क्षतिः।
भाषा-पृथिवी आदि चारके परमाणु तथा आकाशादि पञ्च नित्यद्रव्य हैं. उनसे
भिन्न यावत् पदार्थोंका आश्रितत्वरूप समान धर्म्म है. यहां 'आश्रितत्व' शब्दका
अर्थ कालिकसम्बन्धसे भिन्न वृत्तिनियामक संयोगसमवायादि सम्बन्धसे वर्तना है.
कालिक विशेषणतारूप सम्बन्धसे तो नित्य पदार्थभी कालादिकोंमें रहते हैं.
कालिक सम्बन्धसे अन्यसम्बन्धसे आसमन्तात् वर्तनेवालेका 'आश्रितत्व'
रूप समान धर्म कहना वास्तव अर्थ है. ऐसे कथनसे समवायसे भिन्न सम्बन्धसे
वर्तनेवाले पदार्थोंमें पूर्व लक्षणकी अव्याप्ति नहीं है.
इदानीं द्रव्यस्यैव विशिष्यसाधर्म्यं वक्तुमारभते,क्षित्यादीनामिति-
भाषा-'क्षित्यादीनां' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार विशेषरूपसे द्रव्यहीका समान
धर्म कहता है-
क्षित्यादीनां नवानां तु द्रव्यत्वं गुणयोगिता ॥२४॥
क्षितिर्जलं तथा तेजः पवनो मन एव च ॥
परापरत्वमूर्तत्वक्रियावेगाश्रया अमी ॥ २५ ॥
भाषा-पृथिवीसे आदि लेके नव द्रव्योंका द्रव्यत्वरूप किंवा गुणवत्वरूप
समान धर्म्म है ॥ २४ ॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु तथा मन इन पांचों
का परापरत्वरूप मूर्तत्वरूप तथा क्रियावेगाश्रयत्वरूप समान धर्म है ॥ २५ ॥
क्षितिर्जंलमिति । पृथिव्यप्तेजो वायुमनसां परत्वापरत्ववत्त्वं मूर्त-
त्वं क्रियावत्त्वं वेगवत्त्वं च साधर्म्यम् । न च यत्र घटादौ परत्वम-
परत्वं वा नोत्पन्नं तत्राव्याप्तिरिति वाच्यम् । परत्वादिसमानाधि-
करणद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात्।मूर्तत्वमपकृष्ट-
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३५
परिमाणवत्त्वम्, तच्च तेषामेव, गगनादिपरिमाणस्य कुतोऽप्यपकृ-
ष्टत्वाभावात् । पूर्ववत्कर्मवत्त्वं कर्मसमानाधिकरणद्रव्यत्व-
व्याप्यजातिमत्त्वं वेगवत्त्वं, वेगवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं
च बोध्यम् ॥ २४ ॥ २५ ॥
भाषा-पृथिवी,जल,अग्नि,वायु,मन इन पाँचोंका परत्वापरत्त्ववाले होना,मूर्त्त होना,
क्रिया वाले होना,तथा वेगवाले होना समान धर्म है.शंका-जहां जिन उत्पन्न विनष्टा
दिकार्योंमें परत्वापरत्त्व बुद्धि नहीं उत्पन्न हुई; वहां घटादि कार्योंमें परत्वापरत्त्वके
भी न उत्पन्न होनेसे अव्याप्ति होगी. समाधान-वहांभी परत्वादि समानाधिकरणमें
वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य पृथिवीत्व जलत्व तेजस्त्व वायुत्व मनस्त्व रूपा
जाति तादृश जातिमत्त्वकी विवक्षासे दोष नहीं है. मूर्त्तत्व नाम परिच्छिन्न अर्थात्
छोटे परिमाण वालेका है. वह परिच्छिन्न परिमाण पूर्वोक्त पाँचोंहीका है । आका-
शादिके परिमाणमें किसीकी अपेक्षासेभी छोटापना नहीं है । शेष लक्षणभी
पूर्ववत् जातिघटित करनेसे दोष नहीं है. अर्थात् ( कर्मवत्त्वं ) कर्मके समानाधि
करणमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्व' आदि जाति, तादृश जाति-
मत्त्व पृथिवी आदि पांचोंमें सिद्धहै.ऐसेही वेगवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य
'पृथिवित्व' आदि जाति, तादृश जातिमत्ता पृथिवी आदि पाँचोंमें सिद्ध है २४॥२५॥
कालखात्मदिशां सर्वगतत्वं परमं महत् ॥
भाषा-काल आकाश आत्मा दिशा इन चारोंका सर्व व्यापकता तथा परममहत्
परिमाणवत्ता समान धर्म है.
कालेति।कालाकाशात्मदिशां सर्वगतत्वं सर्वमूर्त्तसंयोगित्वं परम-
महत्त्वं च, परममहत्त्वत्वं जातिविशेषः अपकर्षानाश्रय-
परिमाणत्वं वा ।
भाषा-जिसका यावत् मूर्त्तपदार्थके साथ संयोग हो वह व्यापक होता है ऐसेही
' परममहत्त्वत्व ' जातिविशेष युक्त परममहत् परिमाण होताहै. अथवा मूर्त्तोंमें न
वर्तनेवाला जो परिमाण तादृश परिमाणवत्ता पूर्वोक्त चारोंका समान धर्म है.
क्षित्यादिपञ्चभूतानि चत्वारि स्पर्शवन्ति हि ॥ २६ ॥
भाषा-पृथिवी जल अग्नि वायु आकाश, इन पाँचोंका भूतत्वरूप समान धर्म है.
पृथिवी आदि चारोंका समवायेन स्पर्शवत्ता समान धर्म है ॥ २६ ॥