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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 350 में से

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पृष्ठ 47

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २३
क्रियाशून्यत्वं च गगनादावतिव्याप्तम् । तथापि गुणवदवृत्तिधर्म-
वत्त्वं कर्मवदवृत्तिपदार्थविभाजकोपाधिमत्त्वं तदर्थः । नहि घट-
त्वादिकं द्रव्यत्वं वा गुणवदवृत्ति कर्मवदवृत्ति वा। किन्तु गुणत्वा-
दिकं तथा, आकाशत्वादिकं तु न पदार्थविभाजकोपाधिः ।
भाषा—यद्यपि गुणशून्यता तथा क्रियाशून्यता प्रथमक्षणमें घटादि कार्योंमेंभी है
वहां गुणादि लक्षणकी अति व्याप्ति होगी. एवं क्रियाशून्यता गगनादिमेंभी है.
वहांभी उक्त लक्षणकी अतिव्याप्ति होगी तथापि उक्त लक्षणका 'गुणवत् जो द्रव्य उसमें
न वर्तनेवाले जो गुणत्वादि धर्म तादृशधर्म्मवत्त्व' ऐसा विवरण करना उचित है.
किंवा 'क्रियावाला जो द्रव्य उसमें न वर्तनेवाली जो पदार्थकी विभाजकगुणत्वादि
उपाधि तादृश उपाधिमत्त्व' ऐसा विवरण करना उचित है. एवं घटादिमें दोष नहीं
है. क्योंकि घटत्वादि धर्म किंवा द्रव्यत्वरूप धर्म गुणवालेमें वा क्रियावालेमें न
वर्तनेवाला नहीं है, किन्तु वर्तनेवालाही है. गुणक्रियावालेमें न वर्तनेवाले धर्म
गुणत्व कर्म्मत्वादि हैं तादृश धर्मवत्ता गुणकर्म्मादिमें सिद्ध है. आकाशत्वादि धर्म
तो पदार्थविभाजक उपाधि नहीं हैं किन्तु द्रव्यविभाजक उपाधि हैं. एवं उनमेंभी
दोष नहीं है.
यद्वा गुणवद्वृत्तित्व सति कर्मवद्वृत्तित्वे सति वा सत्ताव्याप्य-
जातिशून्यभावत्वं विवक्षितम् । गुणकर्मणोरव्याप्तिवारणाय
गुणवद्वृत्ति कर्मवद्वृत्तीति वा । पुनस्तत्रैवाव्याप्तिवारणाय
सत्ताव्याप्येति । व्याप्तिश्च भेदगर्भा निवेशितेत्यतो न दोषः ।
द्रव्यगुणान्यतरत्वमादाय तत्रैवाव्याप्तिवारणाय जातीति ।
अभावेऽतिव्याप्तिवारणाय भावत्वमिति । गुणवद्वृत्तिः सत्ताव्या-
प्यजातिर्द्रव्यत्वं तच्छून्यत्वं पञ्चानामस्त्येव ।
भाषा—अथवा गुणवालेमें वर्तनेवाली तथा कर्मवालेमें वर्तनेवाली जो सत्ताकी
व्याप्य 'द्रव्यत्व' रूपा जातिः तादृशजातिशून्यभावत्व' गुणादि पञ्चोंका समान
धर्म है. यहां गुणमें तथा कर्म्ममें अव्याप्तिवारणार्थ गुणवालेमें तथा कर्म्मवालेमें
वर्तनेवाली ऐसा कहा. केवल सत्ताके ग्रहण करनेसे पुनः गुणकर्म्ममें होनेवाली
अव्याप्तिके वारणार्थ 'सत्ताव्याप्यजाति' ऐसा कहा. यहां व्याप्यव्यापकभावकी व्याप्ति
भेदगर्भिता विवक्षणीय है. (अन्यथा) समानाधिकरणरूप व्याप्ति माने तो 'स्व' में स्व-