न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
तद्भिन्नत्वं सामान्यलक्षणे देयमेव अत्र समवायिकारणे प्रत्यासन्नं
द्विविधम् । आद्यं यथा । घटादिकं प्रति कपालसंयोगादिकम् ।
तत्र कार्येण घटेन सह कारणस्य कपालसंयोगस्यैकस्मिन्
कपाले प्रत्यासत्तिरस्ति । द्वितीयं यथा।घटरूपं प्रति कपालरूप-
मसमवायिकारणम् । तत्र घटरूपं प्रति कारणं घटस्तेन सह
कपालरूपस्यैकस्मिन् कपाले प्रत्यासत्तिरस्ति । तथाच
क्वचित् समवायसम्बन्धेन, क्वचित्स्वसमवायिसमवायसम्बन्धेनेति
फलितोऽर्थः ।
भाषा—आत्माके ज्ञानादि विशेषगुणोंको तो किसी कार्यके प्रतिभी असमवायि
कारणता नहींहै; इसलिये 'आत्मविशेष गुणभिन्नत्वे सति' का निवेश तो यावत्
कार्य्यके असमवायि कारणके लक्षणमें करना उचित है. ( अत्र ) इस प्रकरणमें
समवायिकारणरूप अधिकरणमें कार्य्यके साथ असमवायि कारणका समानाधि-
करणरूप सम्बन्ध दो प्रकारका है. प्रथम कार्य्यके साथ एकाधिकरणमें सम्बन्ध
रूपहै; दूसरा कारणके साथ एकाधिकरणमें सम्बन्धरूप है. प्रथम जैसे घटा-
दि कार्य्यके प्रति कपालद्वय संयोगादि असमवायि कारण है, तहां घटरूप कार्य्य
के साथ कपालसंयोगरूप कारणका कपालस्वरूप एकाधिकरणमें एकार्थसम-
वेतत्वरूप सम्बन्ध है. दूसरा जैसे घटके रूपके प्रति कपालका रूप असमवायि-
कारण है. तहां घटके रूपके प्रति कारण घटही है उस घटके साथ कपालस्वरूप
एकाधिकरणमें कपालके रूपका 'एकार्थ समवेतत्व' रूप सम्बन्ध है. इसरीति
से कारणताके नियामक दो सम्बन्ध हैं; कहीं समवायसम्बन्ध है. जैसे घटके प्रति
कपालसंयोग समवायसम्बन्धसे असमवायिकारण है और कहीं स्वसमवायि
समवेतत्वसम्बन्ध है. जैसे घटके रूपके प्रति कपालका रूप स्वसमवायिसमवेतत्व
सम्बन्धसे कारण है. यहां ' स्व ' पदसे कपालके रूपका ग्रहण है, उसका सम-
वायि कपाल है; उस कपालमें समवेत घट है. एतादृश सम्बन्धसे कपालके रूपको
घट पर मान कर घटके रूपके प्रति असमवायिकारणता भी बन सकती है. यह
पूर्व कथनका फलितार्थ है.
इत्थंच कार्यैकार्थकारणैकार्थान्तरप्रत्यासत्त्या समवायिकार-