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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 350 में से

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पृष्ठ 51

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २७
ताद्यसमवायिकारणत्वं स्यात्, एवं ज्ञानादिकमिच्छाद्यसमवायि-
कारणं स्यात्, तथाऽपि पटासमवायिकारणलक्षणे तुरीतन्तुसंयो-
गभिन्नत्वं देयम्। तुरीतन्तुसंयोगस्तु तुरीपटसंयोगं प्रत्यसमवायि-
कारणं भवत्येव । एवं वेगादिकमपि वेगस्पन्दाद्यसमवायिकारणं
भवत्येवेति, तत्तत्कार्य्यासमवायिकारणलक्षणे तत्तद्भिन्नत्वं देयम् ।
भाषा-( अत्र ) यहां कारणलक्षणोंमेंसे असमवायि कारणके लक्षणानुसार यद्यपि
तुरीतन्तुओंके संयोगोंकोभी पटका असमवायि कारण होना चाहिये, ऐसेही वेग तथा
स्पर्शकोभी यथाक्रम अभिघाताख्य संयोगका तथा 'नोदनाख्य' संयोगका असम-
वायिकारण होना चाहिये, ( एवं ) ज्ञान इच्छाकोभी यथाक्रम इच्छा तथा प्रवृत्ति-
का असमवायिकारण होना चाहिये तथापि पटके असमवायिकारणके लक्षणमें
तुरीतन्तुसंयोगसे 'भिन्न' पदका निवेश करना उचित है अर्थात् तन्तुओंमें
समवेत हो और तुरीतन्तुसंयोगसे अन्य होकर पटका कारण हो, वही पटका
असमवायिकारण है और तुरीतन्तुसंयोगभी तुरीपटके संयोगके प्रति तो असम-
वायि कारण होसक्ता है, ऐसे वेगादिकभी वेगजन्य क्रियाके असमवायि कारण हो
सक्ते हैं, इसलिये तिस२विशेष कार्य्यके असमवायिकारणके लक्षणमें तिस२से भिन्न
पदका निवेश करना उचित है.
आत्मविशेषगुणानां तु कुत्राप्यसमवायिकारणत्वं नास्ति, तेन
१ शंका-तुरीतन्तुसंयोगकोभी पटके असमवायिकारणके लक्षणका लक्ष्यही माने
तो क्या दोष है? समाधान--नैयायिकोंने असमवायि कारणके नाशसे कार्य्यनाश
माना है, यदि तुरीतन्तुसंयोगभी पटका असमवायिकारण होगा तो उसके नाशसेभी पटका नाश
हुआ चाहिये और यह वार्त्ता देखनेमें तो नहीं आती याते उससे भिन्नत्वका निवेश
करना उचित है.
२ अर्थात् पटके असमवायिकारणके लक्षणमें 'तुरीतन्तुसंयोगभिन्नत्वे सति' का
निवेश करना चाहिये, ऐसे घटके असमवायिकारणके लक्षणमें 'चक्रकपालसंयोगभिन्नत्वे
सति' का निवेश करना चाहिये, तात्पर्य्य यह है कि-प्रत्येक कार्य्यके असमवायिकारणमें
निमित्तकारण तथा समवायिकारणका जो परस्पर संयोग उससे भिन्नत्वका निवेश.
करना उचित है.
३ यहां यह भाव है कि-आत्माके ज्ञानरूप विशेषगुणके प्रति आत्ममनःसंयोगको
असमवायिकारणता तो अवश्य माननीय है, एवं वही आत्ममनःसंयोग यदि अन्य
विशेष गुणोंकाभी असमवायि कारण बनसके तो आत्मविशेषगुणोंको परस्पर एक दूसरेके
प्रतिया किसी गुणान्तरके प्रति असमवायिकारणता माननी व्यर्थ है.