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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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पृष्ठ 50

२६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-तथा ज्ञायमानसामान्यको प्रत्यासत्ति नहीं मानते, तैसे ज्ञायमान लिङ्गको
अनुमितिकरण नहीं मानते हैं. “ज्ञानवानहम्, इच्छावानहम्” इत्याकारक आत्माके
मानसप्रत्यक्षमें आत्माके परम महत् परिमाणकोभी कारणता है. इससे कारणता
शून्य परममहत्परिमाण आकाशादिकोंका जानना चाहिये. कई एक नैयायिक
उदयनाचार्यके आशयको लेकर आत्माके महत्परिमाणकोभी कारणता नहीं
मानते. सो सम्यक् नहीं;क्योंकि ज्ञानसे अतिरिक्त कार्यके प्रति आत्ममहत्परिमाण-
की कारणताका निषेधही उदयनाचार्यका आशय है.
ननु कारणत्वं किमत आह, अन्यथेति-
शंका-कारणता क्या पदार्थ है ? समाधान-उसको मूलकार ‘ अन्यथा ’
इत्यादि ग्रन्थसे स्वयं कहता है ॥
अन्यथा सिद्धिशून्यस्य नियता पूर्ववर्तिता ॥
कारणत्वं भवेत्तस्य त्रैविध्यंपरिकीर्तितम् ॥ १६ ॥
समवायिकारणत्वं ज्ञेयमथाप्यसमवायिहेतुत्वम् ॥
एवं न्यायनयज्ञैस्तृतीयमुक्तं निमित्तहेतुत्वम् ॥१७॥
यत्समवेतं कार्यं भवति ज्ञेयं तु समवायिजनंक तत् ॥
तत्रासन्नं जनकं द्वितीयमाभ्यां परं तृतीयं स्यात् १८
भाषा-अन्यथा सिद्धिसे शून्यनियमसे कार्यके प्रथम रहनेवाला कारण होता है.
वह तीन प्रकारका है ॥ १६ ॥ प्रथमका नाम ‘समवायिकारण’ है. द्वितीयका
नाम ‘असमवायिकारण’ है. तृतीयका नाम न्यायवेत्ता पुरुषोंने ‘निमित्त कारण’ कहा
है ॥ १७ ॥ जिसमें समवायसम्बन्धसे कार्य उत्पन्न हो वह समवायिकारण है ॥
( तत्र ) समवायिकारणमें समवेत होकर जो कार्यका जनक हो वह ‘ असमवायि
कारण ’ है. इन दोनों कारणोंसे भिन्न जो कारण है वह ‘निमित्तकारण’ है ॥ १८ ॥
तस्य कारणत्वस्य।तत्र समवायिकारणे।आसन्नं प्रत्यासन्नं कारणं
द्वितीयमसमवायिकारणमित्यर्थः । अत्र यद्यपि तुरीतन्तुसंयो-
गांनां पटासमवायिकारणत्वं स्यात्, एवं वेगादीनामप्यभिघा-
१ भाव यह है कि-तुरीतन्तु संयोगभी अनुयोगित्वेन तन्तुसमवेत है और पटरूप
कार्य्यका जनकभी है. एवं उक्तलक्षणका लक्ष होनेसे तुरीतन्तुसंयोगभी पटका असमवायि
कारण होना चाहिये.