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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 350 में से

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पृष्ठ 46

२२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
विभाजकोपाधिमत्त्वमिति फलितोऽर्थः । तेन प्रत्येकं घटादावा-
काशादौ च नाव्याप्तिः ।
भाषा-द्रव्य गुण कर्म्म सामान्य विशेष इन पञ्चोंका समानधर्म्म अनेकत्व तथा
समवायित्व है. यद्यपि अनेकता अभावमेंभी है उसमें इस लक्षणकी अतिव्याप्ति होगी
तथापि अनेकत्वविशिष्ट भावत्व पञ्चोंका समान धर्म्म है; इसकाभी अनेकभाव
पदार्थोंमें वर्तनेवाली जो पदार्थकी विभाजक द्रव्यत्व गुणत्वादि उपाधि तादृश
उपाधिमत्त्वं ऐसा अर्थ करना. एवं प्रत्येक घटादिव्यक्तिमें वा आकाशाँदि लक्षोंमें
लक्षणकी अव्याप्ति नहीं है. अन्यथा अनेकत्वविशिष्टभावत्व प्रत्येक घटमें तथा
आकाशादिमें नहीं है. अव्याप्ति अवश्य होगी.
समवायित्वं समवायसम्बन्धेन सम्बन्धित्वम्, नतु समवायवत्त्वं
सामान्यादावभावात्। तथाच समवेतवृत्तिपदार्थविभाजकोपाधि-
मत्त्वमिति फलितोऽर्थः । तेन नित्यद्रव्येषु नाव्याप्तिः ।
भाषा-समवायिशब्दका अर्थ समवायसम्बन्धसे सम्बन्धवाला है; किन्तु अनु-
योगितासम्बन्धसे समवायवाला इतनामात्र नहीं है; क्योंकि सामान्य तथा विशे-
षमें समवायसम्बन्धसे कोई पदार्थ नहीं रहता, इसकाभी समवेतपदार्थमें वर्तने-
वाली जो पदार्थकी विभाजक.द्रव्यत्वगुणत्वादि उपाधि तादृश 'उपाधिमत्त्वं' ऐसा
अर्थ करना. एवं ऐसा जातिघटित विवरण करनेसे भूतलादि चतुष्टयके परमाणु
तथा आकाशादि पञ्च इन नित्य द्रव्योंमें अव्याप्ति नहीं है. यहां "समवेतसमवेत-
वृत्तिपदार्थविभाजकोपाधिमत्त्वं" द्रव्यादि चारोंका समान धर्म्मभी जानना चाहिये.
सत्तावन्तस्त्रयस्त्वाद्याः-
भाषा-आद्यके तीन पदार्थोंका सत्तावत्त्व समान धर्म्म है.
-गुणादिर्निर्गुणक्रियः ॥ १४ ॥
भाषा-एवंगुणादि षट्‌का निर्गुणत्व निष्क्रियत्वरूप समान धर्म्म है ॥ १४ ॥
सत्तावन्तइति। द्रव्यगुणकर्मणां सत्तावत्त्वमित्यर्थः ।
भाषा-द्रव्य, गुण और कर्म्म, इन तीनोंका सत्तावत्त्व समान धर्म्म है.
गुणादिरिति।यद्यपि गुणक्रियाशून्यत्वमाद्यक्षणे घटादावतिव्याप्तम्,
१ सह उत्पन्नोंका कार्यकारण भाव संसारमें अदृष्ट चर है. एवं परस्पर कार्य्य
कारणभावके अनुरोधसे घटादि कार्य्यद्रव्योंसे क्षणमात्र पीछे गुणक्रियादिकी उत्पत्ति
मानी है.