न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-'अन्यं प्रति' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार तीसरी अन्यथासिद्धि दिखलाताहै--
अन्यं प्रति पूर्वभावे ज्ञाते यत्पूर्वभावविज्ञानम् ॥ १९ ॥
भाषा-दूसरेके प्रति पूर्वविद्यमानता जानकर जिसकी प्रकृत कार्यके प्रति पूर्व-
विद्यमानता प्रतीत हो ॥ १९ ॥
अन्यं प्रति पूर्ववर्तित्वं गृहीत्वैव यस्य यत्कार्यं प्रति पूर्ववर्तित्वं
गृह्यते तस्य तत्कार्यं प्रत्यन्यथासिद्धत्वम् । यथा घटादिकं
प्रत्याकाशस्य ।
भाषा--अर्थात् कार्यान्तरके प्रति पूर्वविद्यमानता ग्रहणपूर्वक जिसकी जिस
कार्यके प्रति पूर्वविद्यमानता ग्रहण हो वह उस कार्यके प्रति अन्यथा सिद्ध है. ऐसा
घटादि कार्यके प्रति आकाश है.
आकाशस्य हि घटादिकं प्रत्याकाशत्वेनैव कारणत्वं स्यात्,
आकाशत्वंच शब्दसमवायिकारणत्वम्। अतः शब्दं प्रति जनकत्वं
गृहीत्वैव घटादिकं प्रति जनकत्वं ग्राह्यमतस्तदन्यथासिद्धम् ।
शब्दाश्रयत्वेन कारणत्वे काऽन्यथासिद्धिरितिचेत्, पञ्चमीति
गृहाण । अथाकाशस्य शब्दं प्रति जनकत्वे किमवच्छेदकमिति-
चेत्, कवत्वादिकं विशेषपदार्थो वेति ॥ १९ ॥
भाषा-घटादिकार्यके प्रति आकाशको आकाशत्वेन रूपेण कारणता है. वह
आकाशशब्दका समवायिकारणस्वरूप है. इस रीतिसे आकाशमें शब्दके प्रति
कारणता ग्रहणपूर्वक घटादिकार्यके प्रति कारणता ग्रहण होती है; इससे आकाश
अन्यथा सिद्ध है. शंका-आकाशको शब्दका समवायिकारण न कहें, किन्तु
शब्दका आश्रयमात्र मानके घटादिकार्यके प्रति कारण माने तो कौन अन्यथा सिद्धि
होगी? समाधान-इसरीतिसे पञ्चमी मानने योग्य है. शंका-आकाशमें शब्दकी
जनकताका अवच्छेदक कौन है? समाधान-ककार वकारादि वर्णहैं. शंका-कका-
रादिवर्ण तो नाना तथा अनित्य हैं. उनको अवच्छेदक माननेमें गौरव होगा-
समाधान-अथवा विशेष पदार्थको आकाशमें शब्दकी जनकताका अवच्छेदक
मानना चाहिये ॥ १९ ॥
चतुर्थमन्यथासिद्धमाह , जनकं प्रतीति-
भाषा-'जनकं प्रति' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार चौथी अन्यथा सिद्धि दिखलाताहै-