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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 350 में से

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पृष्ठ 40

१६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
अवयवावयविनोर्जातिव्यक्त्योर्गुणगुणिनोः क्रियाक्रियावतो-
र्नित्यद्रव्यविशेषयोश्च यः सम्बन्धः स समवायः । समवायत्वं
नित्यसम्बन्धत्वम् ।
भाषा-अवयव अवयवी का जाति व्यक्ति का गुण गुणी का क्रिया
क्रियावालेका, नित्य द्रव्य विशेष का जो सम्बन्ध, उसका नाम समवाय है.
समवाय नाम नित्य होनेवाले सम्बन्ध विशेषका है.
तत्र प्रमाणं तु गुणक्रियादिविशिष्टबुद्धिर्विशेषणविशेष्यसम्बन्ध
विषया विशिष्टबुद्धित्वात् दण्डीपुरुष इतिविशिष्टबुद्धिवदित्यनु
मानेन संयोगादि बाधात् समवायसिद्धिः। नच स्वरूपसम्बन्धेन
सिद्धसाधनम् । अर्थान्तरं वा अनन्तस्वरूपाणां सम्बधत्वकल्पने
गौरवाल्लाघवादेकसमवायसिद्धेः । नच समवायस्यैकत्वे वायौ रूप
वत्ता बुद्धिप्रसङ्गः तत्र रूपसमवायसत्त्वेऽपि रूपाभावात् ।
भाषा-उसकी सिद्धिमें अनुमान प्रमाण है. जैसे ' दण्डी पुरुषः ' यह विशिष्ट
बुद्धिः दण्डरूप विशेषण तथा पुरुषरूप विशेष्य, दोनोंको ग्रहण करती हुई, उन
दोनोंके संयोगरूप सम्बन्धकोभी विषय करती है. वैसेहि, गुण क्रियादि विशिष्ट
बुद्धिभी विशिष्ट बुद्धि होनेसे गुणक्रियादि विशेषण तथा गुणक्रियादिमान्
विशेष्य इन दोनोंको विषय करतीं हुई इन दोनोंके सम्बन्धकोभी विषय करती है.
१ शंका-यद्यपि लाघवसे एक समवाय सिद्ध होनेसे प्राचीनोंके मतमें दोष नहीं
तथापि समवाय नाना माननेवाले नवीनोंके मतमें उक्तानुमानसे समवायसिद्धि नहीं होती।
किन्तु समवाय नाना कल्पनाकी अपेक्षा स्वयं उपस्थित स्वरूप नाना माननेही उचित हैं.
(समा०) नव्यमतमें समवायेन पटकार्यके प्रति तादात्म्येन तन्तुओंको हेतुता है. पटमें
रहनेवाली कार्य्यताका अवच्छेदक सम्बन्ध समवाय है. शंका-समवायके स्थानमें स्वरूप
सम्बन्ध मानके भी कार्य कारण भावकी कल्पना होसकती है (समा०) एवं जिसमें
समवायेन कार्य्यकी उत्पत्ति होती है वह समवायि कारण है.) यह समवायिकारणकी व्यवस्था
न रहेगी. शंका-जिसमें सम्बद्ध होकर कार्य्य उत्पन्न होय वह समवायि कारण ऐसा
कहनेसेभी निर्वाह होसकता है. (समा०) ऐसे कहनेसे कपालोंमें सम्बद्ध जो घटका
ध्वंस उसके प्रतिभी कपालोंको समवायि कारणता माननी होगी यह उचित नहीं
इससे यह सिद्ध हुआ कि भावकार्य्यमें रहनेवाला जो कार्य्यतारूप धर्म, उसका अवच्छे-
दक सम्बन्ध समवाय है. एवं कार्य्यतावच्छेदक सम्बन्धविधया नव्यमतमेंभी समवाय
की सिद्धि हुई.