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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 350 में से

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पृष्ठ 42

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१८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
चाहिये, क्योंकि घटाभाव नित्य है, याते घटवाले भूतलभेंभी घटाभाव सिद्ध है
( अन्यथा ) घटाभावको अनित्य मानो तो घटशून्यदेशमेंभी घटाभावकी
प्रतीति नहीं हुई चाहिये; क्योंकि घटाभाव सर्वत्र एक जैसा है, सो वह
घटके लानेसे नाश हो चुका है और अभाव का ‘वैशिष्ट्य’ संज्ञक सम्बन्ध तो घट
के लानेसेभी भूतलेमें विद्यमान है. शंका- समवायको एक माननेवाले तुम
सिद्धान्तीके मतमेंभी अग्निसंयोगसे रक्त हुए घटमें प्रथम होनेवाले श्यामरूप-
का समवाय तो है, वहां श्यामरूपवत्ता बुद्धि होनी चाहिये? समाधान- मेरे मतमें
तो घटकी पाकरक्तता दशामें श्यामरूपका नाश हुआ है, उसके समवायके होनेसेभी
प्रतियोगित्वसम्बन्धसे उसके न होनेसे ‘तद्वत्ता बुद्धि’ नहीं होती; क्योंकि प्रत्यक्षमें
विषयकोभी विषयत्वेन कारणता है और तुम यदि ‘वैशिष्ट्य’ को अनित्य मानो
तो अनन्त वैशिष्ट्य कल्पनामें तुमको गौरवभी होगा. शंका- वैशिष्ट्यको न
मानकर यदि घटाभावकाभूतलादिमें स्वरूपसम्बन्धभी माने तो तौभी पूर्ववत् घटवाले
भूतलभेंभी घटाभावबुद्धि होनी चाहिये? **समाधान-**हमारे मतमें केवल स्वरूप
मात्रही सम्बन्ध नहीं है; किन्तु, घटाभावज्ञानकालमें जिस जिस भूतलमं घटाभाव
बुद्धि है वह वह भूतलादिकही उस उस अभावका स्वरूपसम्बन्ध विशेष है, इस
रीतिसे पूर्वोक्त अतिप्रसंगभी नहीं है ॥ ११ ॥
अभावं विभजते, अभावस्त्विति-
भाषा-‘अभावस्तु’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार अभावका विभाग दिखलाता है-
अभावस्तु द्विधा संसर्गान्योऽन्याभावभेदतः ॥
भाषा-संसर्गाभाव तथाअन्योन्याभाव भेदसे अभाव दो प्रकारका है.
अभावत्वं द्रव्यादिषट्कान्योऽन्याभाववत्त्वम् । संसर्गेति । संस-
र्गाभावान्योन्‍याभावभेदादित्यर्थः । अन्योन्याभावस्यैकविधत्त्वा-
त्तद्विभागाभावात् ।
भाषा-द्रव्यादि षट्कसे भिन्नका नाम अभाव है. यह सामान्यरूपसे अभावका
लक्षण है. वह अभाव संसर्गाभाव और अन्योन्याभाव भेदसे दो प्रकारका है. अन्यो-
न्याभावको एक तरहका होनेसे उसका विभाग नहीं है.
१ यह अभावका लक्षण अन्योऽन्याभावघटित है और वक्ष्यमाण अन्योन्याभावका लक्षण
सामान्यरूपसे अभावघटित है, एवं यह लक्षण परस्पराश्रयरूप दोषसे दूषित हुआ, इस लिये
समवाय सामानाधिकरण्यान्यतर सम्बन्धविच्छिन्न प्रतियोगिताक सत्ताभावरूप ही अभावका
निर्वचन मानना उचित है.