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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 350 में से

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पृष्ठ 59

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३५
परिमाणवत्त्वम्, तच्च तेषामेव, गगनादिपरिमाणस्य कुतोऽप्यपकृ-
ष्टत्वाभावात् । पूर्ववत्कर्मवत्त्वं कर्मसमानाधिकरणद्रव्यत्व-
व्याप्यजातिमत्त्वं वेगवत्त्वं, वेगवद्वृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं
च बोध्यम् ॥ २४ ॥ २५ ॥
भाषा-पृथिवी,जल,अग्नि,वायु,मन इन पाँचोंका परत्वापरत्त्ववाले होना,मूर्त्त होना,
क्रिया वाले होना,तथा वेगवाले होना समान धर्म है.शंका-जहां जिन उत्पन्न विनष्टा
दिकार्योंमें परत्वापरत्त्व बुद्धि नहीं उत्पन्न हुई; वहां घटादि कार्योंमें परत्वापरत्त्वके
भी न उत्पन्न होनेसे अव्याप्ति होगी. समाधान-वहांभी परत्वादि समानाधिकरणमें
वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य पृथिवीत्व जलत्व तेजस्त्व वायुत्व मनस्त्व रूपा
जाति तादृश जातिमत्त्वकी विवक्षासे दोष नहीं है. मूर्त्तत्व नाम परिच्छिन्न अर्थात्
छोटे परिमाण वालेका है. वह परिच्छिन्न परिमाण पूर्वोक्त पाँचोंहीका है । आका-
शादिके परिमाणमें किसीकी अपेक्षासेभी छोटापना नहीं है । शेष लक्षणभी
पूर्ववत् जातिघटित करनेसे दोष नहीं है. अर्थात् ( कर्मवत्त्वं ) कर्मके समानाधि
करणमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य 'पृथिवीत्व' आदि जाति, तादृश जाति-
मत्त्व पृथिवी आदि पांचोंमें सिद्धहै.ऐसेही वेगवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य
'पृथिवित्व' आदि जाति, तादृश जातिमत्ता पृथिवी आदि पाँचोंमें सिद्ध है २४॥२५॥
कालखात्मदिशां सर्वगतत्वं परमं महत् ॥
भाषा-काल आकाश आत्मा दिशा इन चारोंका सर्व व्यापकता तथा परममहत्
परिमाणवत्ता समान धर्म है.
कालेति।कालाकाशात्मदिशां सर्वगतत्वं सर्वमूर्त्तसंयोगित्वं परम-
महत्त्वं च, परममहत्त्वत्वं जातिविशेषः अपकर्षानाश्रय-
परिमाणत्वं वा ।
भाषा-जिसका यावत् मूर्त्तपदार्थके साथ संयोग हो वह व्यापक होता है ऐसेही
' परममहत्त्वत्व ' जातिविशेष युक्त परममहत् परिमाण होताहै. अथवा मूर्त्तोंमें न
वर्तनेवाला जो परिमाण तादृश परिमाणवत्ता पूर्वोक्त चारोंका समान धर्म है.
क्षित्यादिपञ्चभूतानि चत्वारि स्पर्शवन्ति हि ॥ २६ ॥
भाषा-पृथिवी जल अग्नि वायु आकाश, इन पाँचोंका भूतत्वरूप समान धर्म है.
पृथिवी आदि चारोंका समवायेन स्पर्शवत्ता समान धर्म है ॥ २६ ॥