सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 45

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २१
इदानीं पदार्थानां साधर्म्यं वैधर्म्यं च वक्तुं प्रक्रमते, सप्तानामित्यादि-
भाषा-अब 'सप्तानां' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार पदार्थोंके समानधर्म्म तथा विरुद्ध
धर्म्मोंको कहता है-
सप्तानामपि साधर्म्यं ज्ञेयत्वादिकमुच्यते ॥ १३ ॥
भाषा-द्रव्यादि सात पदार्थोंका समानधर्म्म ज्ञेयत्वादिक कहाहै ॥ १३ ॥
समानो धर्मो येषां ते सधर्माणस्तेषां भावः साधर्म्यम्, समानो
धर्म इति फलितोऽर्थः । एवं विरुद्धो धर्मो येषां ते विधर्माण-
स्तेषां भावो वैधर्म्यम्, विरुद्धो धर्म इति फलितोऽर्थः । ज्ञेयत्वं
ज्ञानविषयता, साच सर्वत्रैवास्ति, ईश्वरादिज्ञानविषयतायाः
केवलान्वयित्वात्। एवमभिधेयत्वप्रमेयत्वादिकं बोध्यम् ॥२॥१३॥
भाषा--जितने पदार्थ परस्पर एक धर्म्मवालेहैं,उनमेंरहनेवाले धर्म्मका नाम समान
धर्म्म है. एवं जितने पदार्थ परस्पर विपरीतधर्म्मवाले हैं उनमें रहनेवाले धर्म्मका
नाम विरुद्ध धर्म्म है. 'ज्ञेयत्व' शब्दसे ज्ञानकी विषयताका ग्रहण है. वह
ज्ञानकी विषयता सर्वत्र विद्यमान है, क्योंकि ईश्वर और योगीकी ज्ञानीय विषयता-
को केवलान्वयि मानाहै. एवं 'अभिधा' नाम संकेतका है. उस संकेतीय विषय-
ताका नाम 'अभिधेयत्व' है. एवं 'प्रमा' नाम पदार्थज्ञानका है. उसकी विषयता
का नाम प्रमेयत्व है. यहां आदि शब्दसे अस्तित्त्व कालसम्बन्धित्व आदि धर्म्मोंका
ग्रहण है. द्रव्यादिषट्का समानधर्म्मभावत्व प्रसिद्ध है; इससे उसको छोड़कर
पञ्चोंका कहता है ॥
द्रव्यादयः पञ्चभावा अनेके समवायिनः ॥
भाषा-द्रव्यादि पञ्च पदार्थ भावरूप हैं, अनेक हैं तथा समवायी हैं ॥
द्रव्येति । द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषाणां साधर्म्यमनेकत्वं
समवायित्वं च । यद्यप्यनेकत्वमभावेऽप्यस्ति, तथाऽप्यनेकत्वे
सति भावत्वं पञ्चानां साधर्म्यम् । तथाचानेकभाववृत्तिपदार्थ-
१ विषयमें रहनेवाले ज्ञानादिनिरूपित धर्म्मविशेषका नाम विषयता है.
२ यावत् पदार्थोंमें रहनेवाले धर्म्मोंको न्यायसिद्धान्तमें केवलान्वयी माना है.