न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २९
णे प्रत्यासन्नं कारणं ज्ञानादिभिन्नमसमवायिकारणमिति सामान्य-
लक्षणं पर्य्यवसन्नम्।आभ्यां समवायिकारणासमवायिकारणाभ्यां
परं भिन्नं कारणं तृतीयं निमित्तकारणमित्यर्थः ॥१६॥१७॥१८॥
भाषा-इस रीतिसे 'कार्य्यके साथ अथवा कारणके साथ समवायिकारणरूप
एकाधिकरणमें सम्बद्ध होकर जो ज्ञानादिकोंसे भिन्न कारण वही असमवायि कारण
है, यह सामान्यरूपसे असमवायिकारणका लक्षण नियत हुआ. समवायिकारण
असमवायिकारण दोनोंसे भिन्न जो कारण वह तीसरा निमित्त कारण है।१६।१७।१८
इदानीमन्यथासिद्धत्वमेव कियतां पदार्थानां तदाह, येनेत्यादिना-
भाषा-'येन' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कार्य्यके प्रति अन्यथासिद्ध पदार्थोंको
कहता है-
येन सह पूर्वभावः-
भाषा-जिस रूपसे कारणकी कार्य्यसे प्रथम विद्यमानता है.
यत्कार्य्यं प्रति कारणस्य पूर्ववर्त्तिता येन रूपेण गृह्यते तत्कार्य्यं
प्रति तद्रूपमन्यथासिद्धमितिभावः। यथा घटं प्रति दण्डत्वमिति ।
भाषा-अर्थात् जिस कार्य्य के प्रति कारणकी पूर्व विद्यमानता जिसरूपसे ग्रहण
होती है उस कार्य्यके प्रति कारणका वह रूप अन्यथा सिद्ध है.जैसे घट कार्य्यके प्रति
दण्डकी कारणता दण्डत्वेन रूपेण है याते दण्डत्व अन्यथा सिद्ध है.
द्वितीयमन्यथासिद्धमाह, कारणमिति-
भाषा--'कारणं' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दूसरी अन्यथासिद्धि दिखलाता है-
कारणमादाय वा यस्य ।
भाषा--अथवा कारणके ग्रहणपूर्वक जिसका ग्रहण हो वह अन्यथा सिद्ध है.
यस्य स्वातन्त्र्येणान्वयव्यतिरेकौ नस्तः किन्तु कारणमादायै-
वान्न्वयव्यतिरेकौ गृह्येते तदन्यथासिद्धम् । यथा दण्डरूपम् ।
अर्थात् जिसकी स्वतंत्ररूपसे कार्य्य के साथ नियतपूर्व्ववृत्तित्वरूपा व्याप्ति
न हो किन्तु मुख्य कारणके ग्रहणपूर्वक जिसका कार्य्यके साथ अन्वय व्यतिरेक
ग्रहण हो वह उस कार्य्यके प्रति अन्यथा सिद्ध है. ऐसा घटकार्य्यके प्रति दण्डका
रूप है.
तृतीयमाह, अन्यं प्रतीति-