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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 350 में से

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पृष्ठ 56

३२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
से प्रथम विद्यमानमें कारणता माननेहीसे प्रत्यक्षमें महत्त्व परिमाणको कारण और
अनेक द्रव्यत्वको अन्यथासिद्ध माना है। यहां अणुपरिमाण वालेसे भिन्न द्रव्यका
नाम अनेक द्रव्यत्व है। प्रत्यक्षमें महत्त्व अवश्यक्लृप्त है उससे अनेक द्रव्यत्व अन्य-
था सिद्ध है. शंका-यदि कोई अनेक द्रव्यत्वको प्रत्यक्षमें कारण तथा महत्त्वको
अन्यथा सिद्ध माने तो तुम्हारे पास एक पक्षके कहनेवाली युक्ति कौन है ?
समाधान-महत्त्वत्वजातिको कारणतावच्छेदक माननेमें शरीरकृत लाघव है॥२०॥
एते पञ्चान्यथासिद्धाः-
भाषा-ये पञ्च अन्यथा सिद्ध हैं.
दण्डत्वादिकमादिमम् ।
घटादौदण्डरूपादिद्वितीयमपि दर्शितम् ॥ २१ ॥
तृतीयं तु भवेद्व्योम कुलालजनकोऽपरः ।
पञ्चमोरासभादिःस्यात्-
भाषा-घटादि कार्यके प्रति प्रथम अन्यथा सिद्ध दण्डत्वादिक धर्म हैं. द्वितीय
दण्डके रूपादि हैं ॥ २१ ॥ तृतीय आकाश है. चतुर्थ कुलालपिता है. पञ्चम
रासभादि हैं ॥
रासभादिरिति। यद्यपि यत्किञ्चिद्घटव्यक्तिं प्रति रासभस्य निय-
तपूर्ववर्तित्वमस्ति, तथापि घटजातीयं प्रति सिद्धकारणभावै-
र्दण्डादिभिरेव तद्व्यक्तेरपिसम्भवे रासभोऽन्यथासिद्ध इति भावः।
भाषा-यद्यपि किसी एक घटव्यक्तिके पूर्वविद्यमानता गर्दभकोभी होसक्ती है
तथापि यावत् घटव्यक्तिके प्रति प्रसिद्ध कारणरूप दण्डादिकोंसेही उस व्यक्तिकाभी
निर्वाह होसक्ता है इसलिये रासभ सर्वथा अन्यथासिद्ध है ॥
एतेष्वावश्यकस्त्वसौ ॥ २२ ॥
भाषा-इन सबमें यह पञ्चम अन्यथासिद्ध तो आवश्यक है ॥ २२ ॥
एतेष्विति। एतेषु पञ्चस्वन्यथासिद्धेषु पञ्चमोऽन्यथासिद्ध आव-
श्यकः तेनैव परेषां चरितार्थत्वात् । तथाहि। दण्डादिभिरवश्य-
कॢप्तनियतपूर्ववर्तिभिरेव कार्य्यसम्भवे दण्डत्वादिकमन्यथा-
सिद्धम् ।