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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 350 में से

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पृष्ठ 58

३४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्य आश्रितत्वमिहोच्यते ॥
भाषा-नित्य द्रव्योंसे अन्यपदार्थोंका आश्रितत्वरूप समान धर्म्म है.
अन्यत्रेति। नित्यद्रव्याणि परमाण्वाकाशादीनि विहायाश्रितत्वं
साधर्म्यमित्यर्थः । आश्रितत्वंतु समवायादिसम्बन्धेन वृत्तिमत्त्वम् ।
विशेषणतया नित्यानामपि कालादौ वृत्तेः । कालिकसम्बन्धान्य-
सम्बन्धेनाऽवृत्तित्वमिति परमार्थः, तेन समवायेनावृत्तावपि न क्षतिः।
भाषा-पृथिवी आदि चारके परमाणु तथा आकाशादि पञ्च नित्यद्रव्य हैं. उनसे
भिन्न यावत् पदार्थोंका आश्रितत्वरूप समान धर्म्म है. यहां 'आश्रितत्व' शब्दका
अर्थ कालिकसम्बन्धसे भिन्न वृत्तिनियामक संयोगसमवायादि सम्बन्धसे वर्तना है.
कालिक विशेषणतारूप सम्बन्धसे तो नित्य पदार्थभी कालादिकोंमें रहते हैं.
कालिक सम्बन्धसे अन्यसम्बन्धसे आसमन्तात् वर्तनेवालेका 'आश्रितत्व'
रूप समान धर्म कहना वास्तव अर्थ है. ऐसे कथनसे समवायसे भिन्न सम्बन्धसे
वर्तनेवाले पदार्थोंमें पूर्व लक्षणकी अव्याप्ति नहीं है.
इदानीं द्रव्यस्यैव विशिष्यसाधर्म्यं वक्तुमारभते,क्षित्यादीनामिति-
भाषा-'क्षित्यादीनां' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार विशेषरूपसे द्रव्यहीका समान
धर्म कहता है-
क्षित्यादीनां नवानां तु द्रव्यत्वं गुणयोगिता ॥२४॥
क्षितिर्जलं तथा तेजः पवनो मन एव च ॥
परापरत्वमूर्तत्वक्रियावेगाश्रया अमी ॥ २५ ॥
भाषा-पृथिवीसे आदि लेके नव द्रव्योंका द्रव्यत्वरूप किंवा गुणवत्वरूप
समान धर्म्म है ॥ २४ ॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु तथा मन इन पांचों
का परापरत्वरूप मूर्तत्वरूप तथा क्रियावेगाश्रयत्वरूप समान धर्म है ॥ २५ ॥
क्षितिर्जंलमिति । पृथिव्यप्तेजो वायुमनसां परत्वापरत्ववत्त्वं मूर्त-
त्वं क्रियावत्त्वं वेगवत्त्वं च साधर्म्यम् । न च यत्र घटादौ परत्वम-
परत्वं वा नोत्पन्नं तत्राव्याप्तिरिति वाच्यम् । परत्वादिसमानाधि-
करणद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वस्य विवक्षितत्वात्।मूर्तत्वमपकृष्ट-