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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 350 में से

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पृष्ठ 57

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३३
इन पूर्वोक्त अन्यथासिद्ध पदार्थोंमें पञ्चम अन्यथा सिद्ध अवश्य माननीय है ।
और पूर्वले चारोंकी पञ्चममें चरितार्थताभी होसक्तीहै. उसकी रीति यह है
कि-कारणरूपसे अवश्य सम्बद्ध और घटादि कार्यके नियमसे प्रथम रहनेवाले
दण्डादिकोंसे ही यदि कार्यका सम्भव हो तो दण्डत्वादि सभी सर्वथा अन्यथा-
सिद्ध हैं.
न च वैपरीत्ये किं विनिगमकमिति वाच्यम्।दण्डत्वस्य कारणत्वे
दण्डघटितपरंपरायाः सम्बन्धत्वकल्पने गौरवात् । एवमन्येषाम-
प्यनेनैव चरितार्थत्वं सम्भवतीति ॥ २२ ॥
शंका-घटकार्यके प्रति 'दण्डत्व' को कारण तथा 'दण्ड' को अन्यथा-
सिद्ध मानें तो दण्डमें कारणताका नियामक कौन है? समाधान-दण्डत्वको कारण
माननेसे 'स्वाश्रयजन्य भ्रमीवत्ता' सम्बन्धसे कारणता माननी होगी और दण्डको
केवल 'स्वजन्य भ्रमीवत्ता' सम्बन्धसे कारणता है; इससे प्रथम सम्बन्धमें दण्ड
घटित परम्परा रूप सम्बन्ध कल्पनामें गौरव है. ऐसेही दण्डरूप, आकाश, कुलाल
के पिताकाभी पञ्चम अन्यथासिद्धमेंही संग्रह हो सकता है ॥ २२ ॥
समवायिकारणत्वं द्रव्यस्यैवेति विज्ञेयम् ॥
गुणकर्ममात्रवृत्तिज्ञेयमथाप्यसमवायिहेतुत्वम्॥२३॥
भाषा-समवायिकारण होना केवल द्रव्यहीका समान धर्म है. एवं असमवायि
कारण होना केवल गुण कर्महीका समान धर्म है ॥ २३ ॥
गुणकर्मेति।असमवायिकारणत्वं गुणकर्मभिन्नानां वैधर्म्यं न तु
गुणकर्मणोः साधर्म्यमित्यत्र तात्पर्यम् । अथवाऽसमवायिकारण
वृत्तिसत्ताभिन्नजातिमत्त्वं तदर्थः। तेन ज्ञानादीनामसमवायिकार
णत्वाविरहेऽपि न क्षतिः ॥ २३ ॥
भाषा-यहां गुणकर्मके समान धर्मके कथनका तात्पर्य नहीं किन्तु असमवायि
कारणता गुण कर्मसे भिन्न पदार्थोंका विपरीत धर्म है. इस कथनमें तात्पर्य है! अन्यथा
आत्मविशेष गुणोंमें इस लक्षणकी अव्याप्ति होगी; अथवा असमवायिकारणतावालेमें
वर्तनेवाली जो सत्ताभिन्न 'गुणत्व कर्मत्व' रूपा जातिः तादृश जातिमत्त्वही गुणकर्म
का समान धर्म है, ऐसा जातिघटित लक्षण करनेसे आत्मविशेष गुण ज्ञानादिकोंमें
असमवायिकारणताके न होनेसे भी अव्याप्ति नहीं है ॥ २३ ॥
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