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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 350 में से

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पृष्ठ 48

२४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
व्याप्यत्वकेभी होनेसे सत्ताकी व्याप्यजाति सत्ताभी होगी. उस सत्तासे शून्यगुण
कर्मादि नहीं हैं. उनमें उक्त लक्षणकी अव्याप्ति होगी, उस अव्याप्तिके वारणार्थ
भेदगर्भित व्याप्तिका निवेश करना उचित है “स्वसमानाधिकरणत्वे सति स्वसमा-
नाधिकरणभेदप्रतियोगित्वम्” यह उसका स्वरूप है. यहां दोनों ‘स्व’ पदसे
व्यापकसत्ताका ग्रहण है. ऐसे द्रव्यत्वरूप व्याप्य सत्तामें द्रव्यातर्भावेन व्यापक
सत्ताके साथ समानाधिकरणत्वभी है. और गुणान्तर्भावेन सत्तासमानाधिकरणमें जो
भेद, तादृश भेदप्रतियोगित्वभी है. ऐसी व्याप्ति माननेसे पूर्वोक्त अव्याप्तिरूप
दोष नहीं. सत्ताका व्याप्य द्रव्यगुणादि अन्यतरत्वस्वरूप अखण्डोपाधिरूप धर्म्मभी
है उससे शून्य गुणादि नहीं हैं. लक्षणकी अव्याप्ति होगी उसके वारणार्थ ‘जाति’
पद कहा. अभावमें अतिव्याप्तिवारणार्थ भावत्वका निवेश किया. गुणवालेमें वर्तने-
वाली सत्ताकी व्याप्य जाति (द्रव्यत्व) रूपा है. उससे शून्यत्व गुणादि पांचोंको हैं.
सामान्यपरिहीनास्तु सर्वे जात्यादयो मताः ॥
भाषा-सामान्यादि सर्व पदार्थोंका सामान्यशून्यत्व समानधर्म्म है.
सामान्येति । सामान्यानाधिकरणत्वं सामान्यादीनामित्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् सामान्यादि चारों पदार्थ सामान्यके अधिकरण नहीं हैं.
पारिमाण्डल्यभिन्नानां कारणत्वमुदाहृतम् ॥ १५ ॥
भाषा-पारिमाण्डल्यसे भिन्न पदार्थोंका कारणतारूप समान धर्म है ॥ १५ ॥
पारिमाण्डल्येति । पारिमाण्डल्यमणुपरिमाणं कारणत्वं तद्भि-
न्नानामित्यर्थः । अणुपरिमाणं तु न कस्यापि कारणम् । तद्धि
स्वाश्रयारब्धद्रव्यपरिमाणारम्भकं भवेत्।तच्च न सम्भवति, परि-
माणस्य स्वसमानजातीयोत्कृष्टपरिमाणजनकत्वनियमात्,मह-
दारब्धस्य महत्तरत्ववदणुजन्यस्याणुतरत्वप्रसंगात् । एवं परम-
१ परमाणु तथा द्व्यणुकके परिमाणका नाम अणुपरिमाण है,
२ “तद्धि अणुपरिमाणं हीत्यर्थः । यदि कारणं स्यात्तदा स्वाश्रयारब्धद्रव्यपरिमा-
णारम्भकं भवेत्” अर्थात् परमाणुका परिमाण द्व्यणुकके परिमाणका वा द्व्यणुकका परिमाण
त्र्यणुकके परिमाणका असमवायिकारणत्वेन आरम्भक मानना होगा.
३ शंका-अणुपरिमाणसे जन्य परिमाणको अधिकअणु होनेसेभी दोष क्या है ?
समाधान-त्र्यणुकका चाक्षुष ज्ञान नहीं होगा. शंका-तौ फिर द्व्यणुक त्र्यणुकके परिमाणका
जनक कौन मानना चाहिये? समाधान-उसका जनक परमाणुगत संख्या है. इसी वार्त्ताका
यथावत् स्पष्टीकरण गुणनिरूपणावसरमें होगा.