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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 350 में से

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पृष्ठ 44

२० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
विरोधे मानाभावाद्ध्वंसादिकालावच्छेदेनाऽप्यत्यन्ताभावो वर्तत
इतिप्राहुः। नन्वस्त्वभावानामधिकरणात्मकत्वं लाघवादिति चेत्,
न,अनन्ताधिकरणात्मकत्वकल्पनामपेक्ष्यातिरिक्तकल्पनायाएव
लघीयस्त्वात् । एवं चाधाराधेयभावोऽप्युपपद्यते । एवं च तत्त-
च्छब्दगन्धरसाद्यभावानां प्रत्यक्षत्वमुपपद्यते, अन्यथा तत्तदधि-
करणानां तत्तदिन्द्रियाग्राह्यत्वादप्रत्यक्षत्वं स्यात् । एतेन ज्ञान-
विशेषकालविशेषाद्यात्मकत्वमत्यन्ताभावस्येति प्रत्युक्तम्, अ-
प्रत्यक्षत्वापत्तेः ।
भाषा-यहां प्राचीनाचार्योंका यह सिद्धांत है कि-ध्वंस तथा प्रागभावके
अधिकरणमें अत्यन्ताभाव नहीं रहता है. 'श्यामघटमें रक्तरूप नहीं है तथा रक्तघट-
में श्यामरूप नहीं है,' इत्यादि प्रतीतिसें रक्तरूपके प्रागभावका तथा श्यामरूपके
ध्वंसका अवगाहन होता है; किन्तु, उनके अत्यन्ताभावका अवगाहन नहीं होता,
क्योंकि प्रागभावका तथा ध्वंसका अत्यन्ताभावके साथ विरोध है और नवीन तो
यह कहते हैं कि-उनके परस्पर विरोधमें कोई प्रमाण नहीं. जिस कालमें ध्वंस
तथा प्रागभाव रहते हैं उसी कालमें अत्यन्ताभावभी उसी अधिकरणमें रहताहै
प्रभाकर शंका-लाघवसे अभावोंको तत्तदधिकरणस्वरूपही मानना उचित है.
समा०-अनेक अधिकरणस्वरूप कल्पनाकी अपेक्षा अभावोंकी अतिरिक्त कल्प-
नाही लघुभूता है. एवं अभावोंको अधिकरणोंसे अतिरिक्त माननेसे उनका आ-
धाराधेयभावभी बनसक्ता है. ऐसे माननेसे 'तत् तत्' शब्द गन्धरसादियों के
अभावका प्रत्यक्षभी बनसकता है. (अन्यथा) अभावोंको अधिकरण स्वरूप माने
तो अभावोंका साक्षात्कार नहीं होगा; क्योंकि शब्द गन्ध रसादिके अभावके अ-
धिकरण भूतलजलादि श्रोत्रघ्राणादि इन्द्रियोंसे ग्राह्य नहीं हैं. अभावोंको अधिक-
रणस्वरूप माने तो उनका ग्रहणभी नहीं होगा. इस वक्ष्यमाण कथनसे अत्यन्ताभाव-
को ज्ञानविशेषस्वरूप, अथवा कालविशेषस्वरूप माननेवालोंका सिद्धान्तभी खण्डित
किया, क्योंकि ऐसे माननेसे अत्यन्ताभावका प्रत्यक्ष नहीं होगा.
१ शंका-अभावाधिकरणका भावको तथा अभावप्रतियोगिताक अभावको जैसे आपने
अधिकरणस्वरूप मानकेभी आधाराधेय भावकी उपपत्ति करी है वैसेही प्रत्येक स्थलमें
अभावको अधिकरणस्वरूप मानकर आधाराधेय भावभी मानलिया जाय तो हानि क्या है?
समा०-इस रीतिसे इस दोषके वारण कियेभी 'तत्तत्' शब्द गन्धरसादिके अप्रत्यक्ष होनेका
दोष बना है इसी तात्पर्यसे मुक्तावलीकारने "एवंच "इत्यादि ग्रन्थसे द्वितीय दोष लिखाहै.