न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३७
इस अनुमानसे संयोगसम्बन्धका तो प्रकृतमें बाध है इसलिये समवायही की
सिद्धि होती है; क्योंकि संयोग दो द्रव्यपदार्थों हीका होताहै. शंका-अयुत
सिद्ध पदार्थोंका स्वरूप सम्बन्ध कहनेवाले मीमांसकके मतमें इस अनुमानसे
सिद्ध साधन हुआ और समवायसाधनके लिये प्रवृत्त नैयायिकको अर्थान्तर हुआ,
अर्थात् समवायसाधनार्थ प्रवृत्त नैयायिकको स्वरूपकी सिद्धि हुई तो अर्थान्तर हुआ.
समाधान-अनेक स्वरूप सम्बन्ध कल्पना करनेमें गौरव है, इससे लाघवसे प्रकृता
नुमानद्वारा एक समवाय की सिद्धि माननीही उचित है. शंका-यदि समवाय
एक है तो स्पर्शसमवाय तथा रूपसमवायको एक होनेसे वायुमें रूपवत्ता बुद्धिको
प्रमात्व होना चाहिये. समाधान-वायुमें रूपसमवायके होनेसेभी प्रतियोगित्व
सम्बन्धसे रूपके वहां न होनेसे वायुमें रूपवत्ता प्रतीति नहीं होती.
न चैवमभावस्यापि वैशिष्ट्यं सम्बन्धान्तरं सिद्ध्येदिति वाच्यम्,
तस्य नित्यत्वे भूतले घटानयनानन्तरमपि घटाभावबुद्धिप्रसंगात्,
घटाभावस्य तत्र सत्त्वात्, तस्यच नित्यत्वात्। अन्यथा देशान्तरे
ऽपि तत्प्रतीतिर्न स्यात्, वैशिष्ट्यस्य च तत्र सत्त्वात्, ममतुमते घटे
पाकरक्ततादशायां श्यामरूपस्य नष्टत्वात् न तद्वत्ता बुद्धिः। वै-
शिष्ट्यस्यानित्यत्वे त्वनन्तवैशिष्ट्यकल्पने तवैव गौरवम् ।
इत्थंच तत्तत्कालीनतत्तद्भूतलादिकं तत्तदभावानां सम्बन्धः॥११॥
शंका-इसरीतिसे अभावका भी भूतलादिकोंमें 'वैशिष्ट्य' संज्ञक सम्बन्धा-
न्तर अतिरिक्त पदार्थ सिद्ध होगा. समा०-अतिरिक्त मानना यदि आपको
अंगीकार होय तो हम पूछते हैं कि-क्या वह वैशिष्ट्य नित्य है अथवा अनित्य
है ? यदि नित्य कहो तो भूतलमें घट लानेके पश्चात्भी घटाभाव बुद्धि होनी
१ अर्थात् “ घटाभाववद्भूतलं ” इत्यादि ज्ञानकालीन घटाभावविषयक बुद्धि
विशिष्ट तत्तद्भूतलादिक तत्तदभावोंका स्वरूपसम्बन्ध है. भाव यह कि-तत्तत्क्षणा-
त्मक कालभी अभावके स्वरूपमें विशेषणरूपेण भान होताहै ऐसा हमको अभिमत है. एवं
यद्यपि घटात्यन्ताभाव स्वरूपेण भूतलादिकोंमें नित्य है इसलिये घट विद्यमान दशामेंभी
“ घटाभाववद्भूतलं ” इत्याकारक बुद्धि हुई चाहिये ॥ तथापि “घटाभाववद्भूतलं” इत्यादि
ज्ञानकालिक तत्तत्क्षणरूप विशेषणके अभाव होनेसे घटसत्त्वकालमें घटाभावावगाहनी
प्रतीति नहीं होसकती क्योंकि उस कालमें तत्तद्क्षणरूप विशेषणके न होनेसे विशेषणाभाव
प्रयुक्त विशिष्टाभाव कह सकते हैं.
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