न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 49, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २६
महत्परिमाणमतीन्द्रियं सामान्यं विशेषाश्च बोध्याः। इदमपि योगि-
प्रत्यक्षे विषयस्य न कारणत्वम् ।
भाषा-पारिमाण्डल्य नाम अणुपरिमाणका है. उससे भिन्नपदार्थोंका कारणतारूप
समान धर्म्म है.अणुपरिमाणको तो किसी कार्य्यके प्रतिभी कारणता नहीं है; क्योंकि
यदि उसमें कारणता मानेभी तो वह ( स्व ) अपने आश्रय जो परमाणु तथा
द्व्यणुक उनसे उत्पन्न होनेवाले द्व्यणुकत्र्यणुकरूपद्रव्यके परिमाणकाही जनक मान-
ना होगा, सो बनता नहीं; क्योंकि परिमाणका लोकमें यह स्वभाव देखनेमें आता
है कि वह ( स्व ) अपने सजातिसे ( उत्कृष्ट ) अधिक परिमाणकाही जनक होता है.
जैसे कपालद्वयके महत्परिमाणसे घटका अधिक महत्परिमाण उत्पन्न होता है,
वैसेही परमाणु तथा द्व्यणुकमें रहनेवाले अणुपरिमाणकोभी द्वयणुक तथा त्र्यणुकके
परिमाणके प्रति कारणता माने तो पूर्वोक्त न्यायसे द्वयणुक तथा त्र्यणुकका परिमाण
औरभी अधिक अणु होगा. ऐसेही कालादिके परम महत्परिमाणको तथा परमाणु
आदिके परमाणुत्वादि अतीन्द्रिय सामान्यको तथा विशेष पदार्थकोभी किसीके प्रति
कारणता नहीं है. यहभी जानने योग्य है. परन्तु यह “पारिमण्डल्यभिन्नानां”
इत्यादि ग्रन्थ उन नवीन आचार्योंके अभिप्रायसे है कि जो आचार्य्य योगीके प्रत्यक्षमें
विषयको कारणता नहीं मानते.
ज्ञायमानं सामान्यं न प्रत्यासत्तिः । ज्ञायमानं लिङ्गं नानुमिति-
करणमित्यभिप्रायेण । मानसप्रत्यक्षे आत्ममहत्त्वस्य कारणत्वा-
न्महत्परिमाणं कालादेर्बोध्यम् । तस्यापि न कारणत्वमित्याचा-
र्याणामाशयः इत्यन्ये । तन्न, ज्ञानातिरिक्तं प्रत्येवाकारणताया
आचार्य्यैरुक्तत्वात् ।
१ वर्तमान कालिक जो ज्ञान तादृश ज्ञानविषयीभूत सामान्य 'ज्ञायमानसामान्य' है.
२ यहां नवीनोंका यह सिद्धान्त है कि पार्थिवादि परमाणुओंका भेदक विशेष पदार्थ
नहीं, किन्तु विशेषका ज्ञानभेदक है. ऐसे ज्ञायमानसामान्य सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति
नहीं, किन्तु सामान्यका ज्ञानमात्र सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति है. ऐसेही ज्ञायमान लिङ्गभी
अनुमितिका कारण नहीं, किन्तु लिङ्गका ज्ञानमात्र अनुमितिका करण है और प्राचीनोंने तो
परमाणु परिमाणकोभी योगीके प्रत्यक्षमें विषयत्वेन कारण माना है; तैसे “परमाणुः अणु-
परिमाणवान्” इस ज्ञानके पश्चात् “सर्वे परमाणवः अणुपरिमाणवन्तः” इत्याकारक अलौकिक
प्रत्यक्ष सामान्यलक्षणाप्रत्यासत्तिसे होता है. इसमें सम्बन्धरूपेण अणु परिमाणकोभी
कारण माना है. तैसे 'परमाणुः द्रव्यं अणुपरिमाणात् ' इस अनुमितिमें अणुपरिमाणको
करणत्वेन कारण स्पष्टही माना है; परन्तु यहां मूल ग्रन्थ नवीनोंके सिद्धान्तसे लिखा है.