न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
ऐसे स्थलमें मणिमंत्रादिसे अग्निकी दाहानुकूल शक्तिका विनाश होता है.
और उत्तेजक सूर्य्यकान्तमणिके समीप होनेसे किंवा चन्द्रकान्त मणिके दूर कर देनेसे
अग्निमें दाहानुकूल शक्तिकी उत्पत्ति होती है, ऐसी कल्पना होसकती है. ऐसेही
सादृश्यभी एक पृथक् पदार्थ है. वह सादृश्य, द्रव्यादि षट् भावपदार्थोंके अंतर्भूत
नहीं है, क्योंकि जैसे गोत्वजाति नित्य है वैसेही अश्वत्वजातिभी नित्य है. इसप्रती-
तिसे सादृश्यपदार्थ सामान्यमेंभी प्रतीत होता है. भाव यह है कि, द्रव्यादि षट्
भावपदार्थोंमेंसे किसीका कदापि केनचिद्रूपेण सामान्यमें भान नहीं होता और
सादृश्यका होता है. इस लिये पृथक् पदार्थ मानना चाहिये. ऐसेही सद्रूपसे अर्थात्
भावरूपसे प्रतीत होनेसे सादृश्यको अभावके अन्तर्भूत भी नहीं कह सकते एवं
शक्ति तथा सादृश्य उक्त द्रव्यादि सप्त पदार्थोंसे अतिरिक्त पदार्थ हैं.
मण्याद्यभावविशिष्टवन्ह्यादेर्दाहादिकं प्रति स्वातन्त्र्येण मण्य-
भावादेरेव वा हेतुत्वकल्पनेनैव सामञ्जस्येऽनन्तशक्तितत्प्राग-
भावध्वंसकल्पनानौचित्यात् । नचोत्तेजके सति प्रतिबन्धक-
सद्भावेऽपि कथं दाह इति वाच्यम्, उत्तेजकाभावविशिष्टमण्य-
भावस्य हेतुत्वात् । सादृश्यमपि न पदार्थान्तरम्, किन्तु तद्भि-
न्नत्वे सति तद्गतभूयोधर्मवत्त्वम् । यथा चन्द्रभिन्नत्वे सति चन्द्र-
गताह्लादकत्वादिमत्त्वं मुखे चन्द्रसादृश्यमिति ।
भाषा-चन्द्रकान्तमणि आदिके अभावविशिष्ट अग्निको, अथवा, स्वतंत्ररूपसे
मणिआदि के अभाव को दाहादि के प्रति कारण कल्पनेसे सम्यक् निर्वाह होय तो
मणिआदिके समवधानासमवधानसे अनेक वार शक्तिकी उत्पत्ति तथा उसके प्रागभाव
ध्वंसकी कल्पना करनी अनुचित है. शंका-उत्तेजक सूर्य्यकान्त मणिके सत्त्व
कालमें प्रतिबन्धक चन्द्रकान्तमणिके समीप होनेसेभी अग्निसे दाह कैसे होता है ?
समा०-केवल चन्द्रकान्तमणिही प्रतिबन्धक नहीं, किन्तु उत्तेजक सूर्य्यकान्तमणिके
अभावविशिष्ट चन्द्रकान्तमणि दाहके प्रति प्रतिबन्धक है और उत्तेजकाभाव
विशिष्टचन्द्रकान्तमणिके अभावको दाहके प्रति कारणता है. ऐसेही सादृश्य
भी उक्त पदार्थोंसे कोई पृथक् पदार्थ नहीं है; किन्तु "तद्भिन्नत्वे सति तद्गतभूयो
धर्मवत्त्व" ही सादृश्य है अर्थात् 'तत्' किसीएक वस्तुसे भिन्न पदार्थमें जो उस
वस्तुकी अनेक धर्मवन्ता, वही उस पदार्थमें सादृश्य है. जैसे चन्द्रसे भिन्न सुन्दर
मुखमें, चन्द्रगत (आह्लादकत्व) सुख विशेष जनकत्वादि धर्मंही चन्द्रनिरूपित
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९
सादृश्य है; वह सादृश्य घटक धर्म कहीं जातिरूप है जैसे–घट 'सदृशःपटः' और
कहीं उपाधिरूप है. जैसे–"यथा गोत्वं नित्यं तथाऽश्वत्वमपि" इत्यादि.
द्रव्याणि विभजेत, क्षित्यबिति–
भाषा–' क्षित्यप् ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकारद्रव्योंका विभाग लिखताहै–
क्षित्यप्तेजोमरुद्व्योमकालदिग्देहिनो मनः॥
द्रव्याणि–
एतानि नव द्रव्याणीत्यर्थः ।
भाषा–पृथिवी जल अग्नि वायु आकाश काल दिशा आत्मा और मन ये नव द्रव्य हैं.
ननु द्रव्यत्वजातौ किं मानम्, नहि तत्र प्रत्यक्षं प्रमाणं घृतज-
तुप्रभृतिषु द्रव्यत्वाग्रहादिति चेत् न ।
शंका–द्रव्यत्वजातिमें क्या प्रमाण है ? यदि “ द्रव्यं द्रव्यं ” इस
अनुगत प्रतीतिसे प्रत्यक्ष प्रमाणही कहो तो सम्यक् नहीं, क्योंकि अशास्त्री
लोग घृत लाक्षादि पदार्थोंमें द्रव्य व्यवहार नहीं करते; इस लिये प्रत्यक्ष
प्रमाणसे सकल द्रव्य साधारण द्रव्यत्व जातिकी सिद्धि नहीं होती.
कार्यसमवायिकारणतावच्छेदकतया संयोगस्य विभागस्य वा
समवायिकारणतावच्छेदकतया द्रव्यत्वजातिसिद्धेरिति । ननु
( .१ ) समवायेन कार्य्यत्वावच्छिन्नके प्रति तादात्म्येन द्रव्यको कारणता है. कारणता
अवश्य किञ्चिद्धर्म्मावच्छिन्ना होती है । वह धर्मलाघवसे जातिरूप है। अनुमानप्रमाण
उसका साधक है । तथाहि । समवायसम्बन्धावच्छिन्न कार्य्यत्वावच्छिन्न कार्य्यनिष्ठ कार्य्यता
निरूपिततादात्म्य सम्बन्धावच्छिन्ना द्रव्यनिष्ठा या समवायिकारणता, सा किञ्चिद्धर्म्मावच्छिन्ना
कारणतात्वात्, घटगतकार्य्यतानिरूपितदण्डगतकारणतावत् १। यद्वा समवाय सम्बन्धावच्छिन्न
संयोगत्वावच्छिन्नसंयोगनिष्ठ कार्य्यता निरूपिता तादात्म्य सम्बन्धावच्छिन्नाद्रव्यनिष्ठा या
समवायिकारणता २ । अथवा समवायसम्बन्धावच्छिन्नविभागत्वावच्छिन्नविभागनिष्ठकार्य्यता
निरूपिता तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्ना द्रव्यनिष्ठा या समवायिकारणता ३ । इत्यादि
इन पिछले द्वय अनुमानमें साध्य हेतु तथा उदाहरणका निवेश प्रथम अनुमानवत्
करलेना. प्रथम अनुमानोंमें कार्य्यत्वधर्मको कार्य्यतावच्छेदक माननेमें उपस्थितिकृत गौरव है.
इसलिये द्वितीय कहा. द्वितीयमेंभी नित्यसंयोगवादीके मतसे संयोगत्वावच्छिन्ना कार्य्यता
अप्रसिद्ध है, इसलिये तृतीय कहा. नित्यविभागका आश्रय कोई द्रव्य नहीं है, इसलिये
विभागत्वावच्छिन्ना कार्य्यता अप्रसिद्ध नहीं है.
१० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
दशमं द्रव्यं तमः कुतो नोक्तम् । तद्धि प्रत्यक्षेण गृह्यते, तस्य च
रूपवत्वात्कर्मवत्त्वाच्च द्रव्यत्वम्। तच्चगन्धशून्यत्वात् न पृथिवी,
नीलरूपवत्त्वाच्च न जलादिकम्। तत्प्रत्यक्षे चालोकनिरपेक्षं चक्षुः
कारणमिति चेत्,न, आवश्यकतेजोऽभावेनोपपत्तौ द्रव्यान्तरक-
ल्पनाया अन्याय्यत्वात् । रूपवत्ताप्रतीतिस्तु भ्रमरूपा, कर्म-
वत्त्वप्रतीतिरप्यालोकापसारणोपाधिकीभ्रांतिरेव । तमसोऽतिरिक्त
द्रव्यत्वेऽनन्तावयवादिकल्पना गौरवं च स्यात्। सुवर्णस्य यथा तेज
स्यान्तर्भावस्तथाऽग्रे वक्ष्यते ॥
भाषा-कार्यकी समवायि कारणताकी अवच्छेदक होनेसे संयोगकी
अथवा विभागकी समवायि कारणताकी अवच्छेदक होनेसे द्रव्यत्व
जातिकी सिद्धि होती है. मीमांसक शंका-दशम द्रव्य अन्धकार क्यों नहीं
कहा ? उसका नेत्रोंसे ग्रहणभी होसकता है. और नील रूपवाला होनेसे, तथा
गमनादि क्रियावाला होनेसे उसमें द्रव्यरूपता सिद्ध है. गन्धशून्य होनेसे वह
पृथिवीरूप नहीं है नीलरूपवाला होनेसे जलादि स्वरूपभी नहीं है. और उसके
प्रत्यक्षमें प्रकाशकी सहायतासे विनाही नेत्र इंद्रियको कारणता है ॥ एवं दशम द्रव्य
अन्धकारभी माननीय है. समाधान-उष्ण स्पर्श तथा भास्वर रूपवाला होनेसे अव-
श्य माननीय जो तेजःपदार्थ, उसके अभावमेंही यदि अन्धकार व्यव-
हार होसके तो और अधिक पृथक्द्रव्यकी कल्पना करनी अनुचित है और उसमें
रूपवत्ता प्रतीति तो भ्रमरूपहै. एवं कर्मवत्त्व प्रतीतिभी प्रकाशापसरण
रूप उपाधिबलसे भ्रमरूपा है. अन्धकारको पृथक् द्रव्य माननेसे, उसके अनेक
अवयव, तथा तिनके उत्पत्ति विनाश कल्पना करनेमें गौरवभी होता है. इसलिये
अन्धकार पृथक् द्रव्य नहीं है और सुवर्ण जैसे तेजः पदार्थ के अन्तर्भूत है,
वैसे तेजो निरूपण अवसरमें कहेंगे ॥ ३ ॥
गुणान् विभजते, अथ गुणा इति-
' अथगुण ' इत्यादि ग्रंथसे मूलकार गुणोंका विभाग दिखलाता हैं-
-अथ गुणा रूपं रसो गन्धस्ततः परम् ॥ ३ ॥
स्पर्शः संख्या परिमितिः पृथक्त्वं च ततः परम् ॥
संयोगश्च विभागश्च परत्वं चापरत्वकम् ॥ ४ ॥
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११
बुद्धिः सुखं दुःखमिच्छा द्वेषो यत्नो गुरुत्वकम् ॥
द्रवत्वं स्नेहसंस्कारावदृष्टं शब्द एव च ॥ ५ ॥
भाषा-रूपं. रसं गन्धं स्पर्शं संख्यां परिमाणं पृथक्त्व संयोगं विभागं परत्वं अपरत्वं
बुद्धि सुखं दुःखं इच्छा द्वेषं प्रयत्न गुरुत्वं द्रव्वत्वं स्नेहं संस्कार ( अदृष्ट ) धर्म्म
अधर्म्म और शब्दं ये चतुर्विंशति गुण हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥
एतेगुणा श्रतुर्विंशतिसंख्याकाः कणादेन कण्ठतश्च शब्देन च
दर्शिताः तत्र गुणत्वादिकजातिसिद्धिरेग्रे वक्ष्यते ॥ ४ ॥ ५ ॥
भाषा-शेषपद कारिकामें केवल पादपूर्तिके लिये हैं.ये चौबीस गुण कणाद मुनिने
अपने सूत्रोंमें कंठसे पढ़े तथा 'च' शब्दसे दिखलाये हैं, अर्थात् "प्रयत्नाश्च
गुणाः" ऐसे सूत्रके अन्तमें लिखा है.इससे यह सिद्ध हुआ कि १७ गुण कंठसे पढ़े हैं
और ७ 'च' शब्दसे दिखलाए हैं. उन गुणोंमें गुणत्वादि जातिकी सिद्धि
गुणनिरूपणावसरमें दिखलाई जायगी ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥
कर्माणि विभजते, उत्क्षेपणमिति-
भाषा-' उत्क्षेपणं ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कर्म्मोंका विभाग दिखलाताहै-
उत्क्षेपणं ततोऽपक्षेपणमाकुञ्चनं तथा ॥
प्रसारणंच गमनं कर्म्माण्येतानि पञ्च च ॥ ६ ॥
भाषा-वस्तुका ऊपरको क्षेपण करना तैसे नीचेको क्षेपण करना.पटादि विस्तृत
पदार्थोंको संकोचना, तैसे संकुचित पदार्थोंको विस्तृत करना एवं परिच्छिन्न पदार्थकी
गमन क्रियाको मिलाकर यह पांचप्रकारका कर्म है ॥ ६ ॥
कर्म्मत्वजातिस्तु प्रत्यक्षसिद्धा । एवमुत्क्षेपणत्वादिकमपि ॥६॥
भाषा-चलनाकार अनुगत प्रत्यय ज्ञान होनेसे कर्म्मत्व जाति प्रत्यक्ष सिद्ध है.
ऐसे कर्म्मत्वजातिकी व्याप्य उत्क्षेपणत्व आदि जातियांभी प्रत्यक्ष सिद्ध हैं ॥ ६ ॥
नन्वत्र भ्रमणादिकमपि पञ्चकर्म्माधिकतया कुतो नोक्त-
मत आह । भ्रमणमित्यादि ।
शंका-यहां भ्रमणादि पांचकर्म्म औरभी क्यों नहीं कथन किये ? समाधान-
इसी शंकाके उत्तरमें 'भ्रमणं' इत्यादि ग्रन्थको मूलकार स्वयं लिखताहै-
१२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भ्रमणं रेचनं स्पंदनोर्ध्वज्वलनमेव च ।
तिर्यग्गमनमप्यत्र गमनादेव लभ्यते ॥ ७ ॥
भाषा-गोलाकार चलना, तिड़कना, थोड़ा२चलना, दीपशिखादिका ऊपरको ज्वलना,
सर्पादिका टेढ़ा चलना ये सब गमनके अंतर्भूत होनेसे प्रकृतमें गमन कथन मात्रहीसे
लाभ होसकते हैं ॥ ७ ॥
सामान्यं निरूपयति सामान्यमिति ॥
भाषा-‘सामान्यं’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार सामान्यका निरूपण करताहै-
सामान्यं द्विविधं प्रोक्तं परं चापरमेव च ॥
द्रव्यादित्रिकवृत्तिस्तु सत्तापरतयोच्यते ॥ ८ ॥
भाषा-पर और अपर भेदसे सामान्य दो प्रकारका है । द्रव्यादि तीन में
रहनेवाली सत्ताका नाम पर सामान्य है ॥ ८ ॥
तल्लक्षणं तु नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वम्, अनेकसमवेतत्वं
संयोगादीनामप्यस्त्यत उक्तं नित्यत्वे सतीति । नित्यत्वे सति
समवेतत्वं गगनपरिमाणादीनामप्यस्त्यत उक्तमनेकेति ।
नित्यत्वे सत्यनेकवृत्तित्वमत्यन्ताभावेऽप्यस्त्यतो वृत्तित्वसा-
मान्यं विहाय समवेतत्वमित्युक्तम् । एक व्यक्तिवृत्तिस्तु न
जातिः । तथाचोक्तम् । व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं संकरोऽथानव-
स्थितिः । रूपहानिरसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः ॥ १॥ इति ॥
तत्रैकव्यक्तिकत्वादाकाशत्वं न जातिः । तुल्यव्यक्तिकत्वाद्घ
टत्वं कलशत्वं न जातिद्वयम् । सङ्कीर्णत्वाद्भूतत्वं मूर्तत्वं च न
जातिः अनवस्थाभयात् सामान्यत्वं न जातिः ॥
१ परस्परात्यन्ताभावके समानाधिकरणमें रहनेवाले धर्मद्वयका एकत्र समावेश
संकर है, जैसे भूतत्वाभाववाले मनमें मूर्तत्व है और मूर्तत्वाभाववाले आकाशमें भूतत्व है
इन दोनोंका एकत्र समावेश पृथ्वी आदि चतुष्टयमें है, अर्थात् पृथ्वीआदि चतुष्टयमें भूतत्व
मूर्तत्व दोनों धर्म रहते हैं । इसलिये ये दोनों जातिरूप नहीं हैं.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १३
भाषा-नित्य और अनेक व्यक्तियोंमें समवायसम्बन्धसे रहनेवाला यह उस
सामान्यका लक्षण है. अनेक व्यक्तियोंमें समवाय सम्बन्धसे रहनेवाले
संयोगादि गुणभी हैं. सामान्यके लक्षणकी उनमें अतिव्याप्ति होगी, उसके
वारणार्थ लक्षणमें “नित्यत्वे सति” यह विशेषण कहा. संयोगादि गुण अनेक व्यक्ति-
योंमें समवायसम्बन्धसे रहते तो हैं परन्तु नित्य नहीं हैं, याते दोष नहीं. नित्य
तथा समवायसम्बन्धसे रहनेवाले आकाशके परिमाणादिभी हैं उनसे लक्षणकी
अतिव्याप्ति वारणार्थ ‘अनेक’ पद कहा. आकाशके परिमाणादि गुण नित्य
होकर समवायसम्बन्धसे रहते तो हैं, परन्तु अनेक व्यक्तियोंमें नहीं रहते किन्तु
केवल एक आकाशमात्रमें रहते हैं, याते दोष नहीं. नित्य होकर अनेक व्यक्तियोंमें
वर्तनेवाला अत्यन्ताभावभी है उससे लक्षणकी अतिव्याप्ति वारणार्थ साधारणरूपसे
वर्तनेको न कहकर समवायसम्बन्धसे वर्तना कहा. अत्यन्ताभाव अपने
अधिकरणोंमें स्वरूपसम्बन्धसे रहता है, समवाय से नहीं रहता; याते दोष नहीं
एकव्यक्तिमें वर्तनेवाला धर्म जातिरूप नहीं कहा जाता; इसी वार्ताको प्राचीनाचार्यों-
नेभी कहाहै ॥ व्यक्तिका अभेद तुल्यत्व, संकर, अनवस्था रूपहानि और
असम्बन्ध ये जातिके बाधकोंका संग्रह है ॥ १ ॥ उनमें आकाशादि एक व्यक्ति
में रहनेवाला होनेसे आकाशत्वादि धर्म जातिरूप नहीं है ॥ १ ॥ दोनोंका
सदृश स्वरूप होनेसे घटत्व और कलशत्व दोनों धर्म जातिरूप नहीं हैं, किन्तु शरीर
कृत लाघवसे घटत्वधर्मही जातिरूप है ॥ २ ॥ दोनोंका संकीर्ण होनेसे
भूतत्व और मूर्तत्व ये दोनों धर्म जातिरूप नहीं हैं ॥ ३ ॥ अनवस्थाके भयसे
सामान्यमें सामान्यत्व धर्म जातिरूप नहीं है ॥ ४ ॥
विशेषस्य व्यावृत्तस्वभावस्य रूपहानिः स्यादतो विशेषत्वं न
जातिः । समवायसम्बन्धाभावात् समवायो न जातिः । परत्वम-
धिकदेशवृत्तित्वम्। अपरत्वमल्पदेशवृत्तित्वम्। सकलजात्यपेक्ष-
याऽधिकदेशवृत्तित्वात् सत्तायाः परत्वम्। एतद्बोधनायैव द्रव्यादि
त्रिकवृत्तिरित्युक्तम्। तदपेक्षया चान्यासां जातीनामपरत्वम्॥८॥
१ भाव यह कि यदि विशेषपदार्थमें विशेषत्वरूप जाति मान ली जाय तो उसीसे उसको
व्यावर्तकत्व कहना होगा; क्योंकि सामान्याश्रयको सामान्यरूपसे भेदसाधकताका नियम है
परन्तु विशेषपदार्थको सामान्यरूपसे भेद साधकता बन नहीं सकती क्योंकि उनके स्वतः
व्यावर्त कत्वात्मक रूपकी हानि होती है.
२ समवायको या अभावको जातिवाला माननेसे प्रतियोगिताऽनुयोगिताऽन्यतरसम्बन्धसे
समवायाभावही बाधक है अर्थात् समवायमें प्रतियोगिताऽनुयोगिताऽन्यतर सम्बन्धसे समवाय
नहीं रहता. इति.
१४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-न्यायसिद्धान्तमें घटपटादि यावत् पदार्थ अपने २ घटत्व पटत्वादि
धम्मोंसे परस्पर पृथक् बनेरहते हैं, परन्तु विशेष पदार्थ उनसे उलटाहै; अर्थात्
नित्य द्रव्योंको पृथक् करता हुआ आप स्वयं पृथक् बना रहता है. यही इसका
स्वरूप है. अब इससे उलटा यदि इसमें विशेषत्व धर्म मानलिया जाय तो इसके
'स्वतओ व्यावृत्तत्व' रूप वास्तव स्वरूपकी हानि होगी, याते विशेषत्व धर्म्म जातिरूप
नहीं है ॥ ५ ॥ जाति अपने अधिकरणोंमें समवायसम्बन्धसे रहतीहै, यह पूर्व
कहचुके हैं. एवं इसमें समवायसम्बन्धके अभावसे समवायमें समवायत्व धर्म्म
जातिरूप नहीं है ॥६॥ अधिक देशमें रहनेवालीका नाम परसत्ता है; और न्यून
देशमें रहनेवालीका नाम अपरसत्ता है. घटत्त्वादि यावत् जातियोंकी अपेक्षा
अधिक देशमें रहनेवाली होनेसे सत्ता पर है इसी वार्त्ताके बोधनार्थ मूलमें
“द्रव्यादित्रिकवृत्तिस्तु” अर्थात् द्रव्यादि तीनमें रहनेवाली कहा. सत्ताकी अपेक्षासे
घटत्वादि यावत् जातियां अपर हैं ॥ ८ ॥
परभिन्ना तु या जातिः सैवापरतयोच्यते ।
द्रव्यत्वादिकजातिस्तु परा,परतयोच्यते ॥ ९ ॥
व्यापकत्वात्परापि स्याद्व्याप्यत्वादपरापि च ॥
भाषा-परसत्तासे भिन्न जातिको अपरजाति कहतेहैं और द्रव्यत्वादिक
जातियां तो पर भी हैं तथा अपरभी हैं ॥ ९ ॥ जात्यन्तरकी अपेक्षा
व्यापक होनेसे वही जाति पर कही जाती है. तथा व्याप्य होनेसे उसीमें अपर
व्यवहार होताहै.
व्यापकत्वादिति। पृथिवीत्वाद्यपेक्षया व्यापकत्वादधिकदेशवृत्ति-
त्वाद्द्रव्यत्वादेः परत्वम् । सत्ताऽपेक्षया व्याप्यत्वादल्पदेशवृत्ति-
त्वाच्च द्रव्यत्वस्याऽपरत्वम् । तथाच धर्मद्वयसमावेशादुभयमवि-
रुद्धम् ।
भाषा-पृथिवीत्वादि जातियोंकी अपेक्षासे व्यापकरूपसे अधिक देशमें वर्तनेवाली
होनेसे द्रव्यत्व आदि जातियोंको परत्व है. तैसे सत्ताकी अपेक्षा व्याप्यरूपसे अल्प
देशमें रहनेवाली होनेसे द्रव्यत्वादि जातियोंको अपरत्व है. इस रीतिसे एक
व्यक्तिमें धर्म्मद्वयका समावेश परस्पर विरुद्ध नहीं है.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १५
विशेषं निरूपयति, अन्त्य इति-
भाषा-'अन्त्यः इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार विशेषका निरूपण करता है-
अन्त्यो नित्यद्रव्यवृत्तिर्विशेषः परिकीर्त्तितः ॥१०॥
भाषा-नित्य द्रव्योंके अवसानमें वर्त्तनेवालेका नाम विशेष कथन किया है॥१०॥
अन्तेऽवसाने वर्तते इत्यन्त्यो यदपेक्षया विशेषो नास्तीत्यर्थः ।
एकमात्रवृत्तिरिति फलितोऽर्थः । घटादीनां द्वयणुकपर्यन्तानां
तत्तदवयवभेदात् परस्परं भेदः परमाणूनां परस्परं भेदको विशेष
एव। स तु स्वत एव व्यावृत्तस्तेन तत्र विशेषान्तरापेक्षा नास्ती
ति भावः ।
भाषा-अन्तमें अर्थात् अवसानमें जो वर्त्ते उसका नाम 'अन्त्य' है, अर्थात् जिसकी
अपेक्षा दूसरा कोई विशेष नहीं है. फलितार्थ यह कि-विशेष पदार्थ प्रत्येक नित्य
द्रव्यकी एक व्यक्तिमात्रमें रहता है. घटादि स्थूलकार्योंसे लेकर द्वयणुकादि
सूक्ष्म कार्योंपर्य्यन्त अपने २ कपालपरमाणु आदि अवयवोंके भेदसे परस्पर भेद है,
परन्तु परमाणुओं का परस्पर भेदक विशेष पदार्थही है; वह आप स्वतः व्यावृत्तस्व-
रूप है, इससे उसमें विशेषान्तर कल्पना करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ १० ॥
समवायं दर्शयति, घटादीनामिति-
भाषा-'घटादीनां' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार समवाय को दिखलाताहै-
घटादीनां कपालादौ द्रव्येषु गुणकर्मणोः ॥
तेषु जातेश्च सम्बन्धः समवायः प्रकीर्तितः ॥ ११ ॥
भाषा-घटादि कार्योंका अपने कारण कपालादिकोंके साथ, तथा गुणकर्मोंका
द्रव्योंके साथ, एवं जातिका द्रव्यगुण कर्म तीनोंके साथ जो सम्बन्ध, उसका नाम
समवाय कहाहै ॥ ११ ॥
१ यहां ईश्वरकी नित्यज्ञानवत्त्वेन तथा आकाशकी शब्दसमवायिकारणत्वेन
व्यावृत्तिको मानते हुए विशेष पदार्थके माननेवालेभी कईएक पण्डित लोग ईश्वरमें तथा
आकाशमें विशेषपदार्थकी वृत्तिता नहीं मानते हैं, और नवीन लोग तो यह कहते हैं कि-
विशेषके अतिरिक्त पदार्थ माननेमें कोई प्रमाण नहीं है. जैसे-विशेष पदार्थ स्ववृत्ति धर्मसे
विना स्वयं व्यावृत्त हैं, वैसेही नित्य द्रव्योंकोभी मान सकते हैं. एवं विशेष पदार्थके
अतिरिक्त माननेका कुछ उपयोग नहीं.
१६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
अवयवावयविनोर्जातिव्यक्त्योर्गुणगुणिनोः क्रियाक्रियावतो-
र्नित्यद्रव्यविशेषयोश्च यः सम्बन्धः स समवायः । समवायत्वं
नित्यसम्बन्धत्वम् ।
भाषा-अवयव अवयवी का जाति व्यक्ति का गुण गुणी का क्रिया
क्रियावालेका, नित्य द्रव्य विशेष का जो सम्बन्ध, उसका नाम समवाय है.
समवाय नाम नित्य होनेवाले सम्बन्ध विशेषका है.
तत्र प्रमाणं तु गुणक्रियादिविशिष्टबुद्धिर्विशेषणविशेष्यसम्बन्ध
विषया विशिष्टबुद्धित्वात् दण्डीपुरुष इतिविशिष्टबुद्धिवदित्यनु
मानेन संयोगादि बाधात् समवायसिद्धिः। नच स्वरूपसम्बन्धेन
सिद्धसाधनम् । अर्थान्तरं वा अनन्तस्वरूपाणां सम्बधत्वकल्पने
गौरवाल्लाघवादेकसमवायसिद्धेः । नच समवायस्यैकत्वे वायौ रूप
वत्ता बुद्धिप्रसङ्गः तत्र रूपसमवायसत्त्वेऽपि रूपाभावात् ।
भाषा-उसकी सिद्धिमें अनुमान प्रमाण है. जैसे ' दण्डी पुरुषः ' यह विशिष्ट
बुद्धिः दण्डरूप विशेषण तथा पुरुषरूप विशेष्य, दोनोंको ग्रहण करती हुई, उन
दोनोंके संयोगरूप सम्बन्धकोभी विषय करती है. वैसेहि, गुण क्रियादि विशिष्ट
बुद्धिभी विशिष्ट बुद्धि होनेसे गुणक्रियादि विशेषण तथा गुणक्रियादिमान्
विशेष्य इन दोनोंको विषय करतीं हुई इन दोनोंके सम्बन्धकोभी विषय करती है.
१ शंका-यद्यपि लाघवसे एक समवाय सिद्ध होनेसे प्राचीनोंके मतमें दोष नहीं
तथापि समवाय नाना माननेवाले नवीनोंके मतमें उक्तानुमानसे समवायसिद्धि नहीं होती।
किन्तु समवाय नाना कल्पनाकी अपेक्षा स्वयं उपस्थित स्वरूप नाना माननेही उचित हैं.
(समा०) नव्यमतमें समवायेन पटकार्यके प्रति तादात्म्येन तन्तुओंको हेतुता है. पटमें
रहनेवाली कार्य्यताका अवच्छेदक सम्बन्ध समवाय है. शंका-समवायके स्थानमें स्वरूप
सम्बन्ध मानके भी कार्य कारण भावकी कल्पना होसकती है (समा०) एवं जिसमें
समवायेन कार्य्यकी उत्पत्ति होती है वह समवायि कारण है.) यह समवायिकारणकी व्यवस्था
न रहेगी. शंका-जिसमें सम्बद्ध होकर कार्य्य उत्पन्न होय वह समवायि कारण ऐसा
कहनेसेभी निर्वाह होसकता है. (समा०) ऐसे कहनेसे कपालोंमें सम्बद्ध जो घटका
ध्वंस उसके प्रतिभी कपालोंको समवायि कारणता माननी होगी यह उचित नहीं
इससे यह सिद्ध हुआ कि भावकार्य्यमें रहनेवाला जो कार्य्यतारूप धर्म, उसका अवच्छे-
दक सम्बन्ध समवाय है. एवं कार्य्यतावच्छेदक सम्बन्धविधया नव्यमतमेंभी समवाय
की सिद्धि हुई.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३७
इस अनुमानसे संयोगसम्बन्धका तो प्रकृतमें बाध है इसलिये समवायही की
सिद्धि होती है; क्योंकि संयोग दो द्रव्यपदार्थों हीका होताहै. शंका-अयुत
सिद्ध पदार्थोंका स्वरूप सम्बन्ध कहनेवाले मीमांसकके मतमें इस अनुमानसे
सिद्ध साधन हुआ और समवायसाधनके लिये प्रवृत्त नैयायिकको अर्थान्तर हुआ,
अर्थात् समवायसाधनार्थ प्रवृत्त नैयायिकको स्वरूपकी सिद्धि हुई तो अर्थान्तर हुआ.
समाधान-अनेक स्वरूप सम्बन्ध कल्पना करनेमें गौरव है, इससे लाघवसे प्रकृता
नुमानद्वारा एक समवाय की सिद्धि माननीही उचित है. शंका-यदि समवाय
एक है तो स्पर्शसमवाय तथा रूपसमवायको एक होनेसे वायुमें रूपवत्ता बुद्धिको
प्रमात्व होना चाहिये. समाधान-वायुमें रूपसमवायके होनेसेभी प्रतियोगित्व
सम्बन्धसे रूपके वहां न होनेसे वायुमें रूपवत्ता प्रतीति नहीं होती.
न चैवमभावस्यापि वैशिष्ट्यं सम्बन्धान्तरं सिद्ध्येदिति वाच्यम्,
तस्य नित्यत्वे भूतले घटानयनानन्तरमपि घटाभावबुद्धिप्रसंगात्,
घटाभावस्य तत्र सत्त्वात्, तस्यच नित्यत्वात्। अन्यथा देशान्तरे
ऽपि तत्प्रतीतिर्न स्यात्, वैशिष्ट्यस्य च तत्र सत्त्वात्, ममतुमते घटे
पाकरक्ततादशायां श्यामरूपस्य नष्टत्वात् न तद्वत्ता बुद्धिः। वै-
शिष्ट्यस्यानित्यत्वे त्वनन्तवैशिष्ट्यकल्पने तवैव गौरवम् ।
इत्थंच तत्तत्कालीनतत्तद्भूतलादिकं तत्तदभावानां सम्बन्धः॥११॥
शंका-इसरीतिसे अभावका भी भूतलादिकोंमें 'वैशिष्ट्य' संज्ञक सम्बन्धा-
न्तर अतिरिक्त पदार्थ सिद्ध होगा. समा०-अतिरिक्त मानना यदि आपको
अंगीकार होय तो हम पूछते हैं कि-क्या वह वैशिष्ट्य नित्य है अथवा अनित्य
है ? यदि नित्य कहो तो भूतलमें घट लानेके पश्चात्भी घटाभाव बुद्धि होनी
१ अर्थात् “ घटाभाववद्भूतलं ” इत्यादि ज्ञानकालीन घटाभावविषयक बुद्धि
विशिष्ट तत्तद्भूतलादिक तत्तदभावोंका स्वरूपसम्बन्ध है. भाव यह कि-तत्तत्क्षणा-
त्मक कालभी अभावके स्वरूपमें विशेषणरूपेण भान होताहै ऐसा हमको अभिमत है. एवं
यद्यपि घटात्यन्ताभाव स्वरूपेण भूतलादिकोंमें नित्य है इसलिये घट विद्यमान दशामेंभी
“ घटाभाववद्भूतलं ” इत्याकारक बुद्धि हुई चाहिये ॥ तथापि “घटाभाववद्भूतलं” इत्यादि
ज्ञानकालिक तत्तत्क्षणरूप विशेषणके अभाव होनेसे घटसत्त्वकालमें घटाभावावगाहनी
प्रतीति नहीं होसकती क्योंकि उस कालमें तत्तद्क्षणरूप विशेषणके न होनेसे विशेषणाभाव
प्रयुक्त विशिष्टाभाव कह सकते हैं.
२
Here is the transcription of the page into clean Markdown in original Unicode Devanagari, maintaining line-by-line markers.
१८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
चाहिये, क्योंकि घटाभाव नित्य है, याते घटवाले भूतलभेंभी घटाभाव सिद्ध है
( अन्यथा ) घटाभावको अनित्य मानो तो घटशून्यदेशमेंभी घटाभावकी
प्रतीति नहीं हुई चाहिये; क्योंकि घटाभाव सर्वत्र एक जैसा है, सो वह
घटके लानेसे नाश हो चुका है और अभाव का ‘वैशिष्ट्य’ संज्ञक सम्बन्ध तो घट
के लानेसेभी भूतलेमें विद्यमान है. शंका- समवायको एक माननेवाले तुम
सिद्धान्तीके मतमेंभी अग्निसंयोगसे रक्त हुए घटमें प्रथम होनेवाले श्यामरूप-
का समवाय तो है, वहां श्यामरूपवत्ता बुद्धि होनी चाहिये? समाधान- मेरे मतमें
तो घटकी पाकरक्तता दशामें श्यामरूपका नाश हुआ है, उसके समवायके होनेसेभी
प्रतियोगित्वसम्बन्धसे उसके न होनेसे ‘तद्वत्ता बुद्धि’ नहीं होती; क्योंकि प्रत्यक्षमें
विषयकोभी विषयत्वेन कारणता है और तुम यदि ‘वैशिष्ट्य’ को अनित्य मानो
तो अनन्त वैशिष्ट्य कल्पनामें तुमको गौरवभी होगा. शंका- वैशिष्ट्यको न
मानकर यदि घटाभावकाभूतलादिमें स्वरूपसम्बन्धभी माने तो तौभी पूर्ववत् घटवाले
भूतलभेंभी घटाभावबुद्धि होनी चाहिये? **समाधान-**हमारे मतमें केवल स्वरूप
मात्रही सम्बन्ध नहीं है; किन्तु, घटाभावज्ञानकालमें जिस जिस भूतलमं घटाभाव
बुद्धि है वह वह भूतलादिकही उस उस अभावका स्वरूपसम्बन्ध विशेष है, इस
रीतिसे पूर्वोक्त अतिप्रसंगभी नहीं है ॥ ११ ॥
अभावं विभजते, अभावस्त्विति-
भाषा-‘अभावस्तु’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार अभावका विभाग दिखलाता है-
अभावस्तु द्विधा संसर्गान्योऽन्याभावभेदतः ॥
भाषा-संसर्गाभाव तथाअन्योन्याभाव भेदसे अभाव दो प्रकारका है.
अभावत्वं द्रव्यादिषट्कान्योऽन्याभाववत्त्वम् । संसर्गेति । संस-
र्गाभावान्योन्याभावभेदादित्यर्थः । अन्योन्याभावस्यैकविधत्त्वा-
त्तद्विभागाभावात् ।
भाषा-द्रव्यादि षट्कसे भिन्नका नाम अभाव है. यह सामान्यरूपसे अभावका
लक्षण है. वह अभाव संसर्गाभाव और अन्योन्याभाव भेदसे दो प्रकारका है. अन्यो-
न्याभावको एक तरहका होनेसे उसका विभाग नहीं है.
१ यह अभावका लक्षण अन्योऽन्याभावघटित है और वक्ष्यमाण अन्योन्याभावका लक्षण
सामान्यरूपसे अभावघटित है, एवं यह लक्षण परस्पराश्रयरूप दोषसे दूषित हुआ, इस लिये
समवाय सामानाधिकरण्यान्यतर सम्बन्धविच्छिन्न प्रतियोगिताक सत्ताभावरूप ही अभावका
निर्वचन मानना उचित है.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १९
संसर्गाभावं विभजते, प्रागभाव इति-
भाषा-'प्रागभाव' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार संसर्गाभावके विभागको दिखलाताहै-
प्रागभावस्तथा ध्वंसोऽप्यत्यन्ताभाव एव च ॥ १२॥
एवं त्रैविध्यमापन्नः संसर्गाभाव इष्यते ॥
भाषा-प्रागभाव तैसे ध्वंस और अत्यन्ताभाव ॥ १२ ॥ एवं तीन भेदोंको प्राप्त
हुआ एकही संसर्गाभाव है.
संसर्गाभावत्वं अन्योन्याभावभिन्नाभावत्वम् । अन्योऽन्याभावत्वं
तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावत्वम्। विनाश्यभा-
वत्वं प्रागभावत्वम् । जन्याभावत्वं ध्वंसत्वम् । नित्यसंसर्गाभा-
वत्वं अत्यन्ताभावत्वम् । यत्र तु भूतलादौ घटादिकमपसारितं
पुनरानीतं च तत्र घटकालस्य सम्बन्धाघटकतयाऽत्यन्ताभावस्य
नित्यत्वेऽपि घटकाले न घटात्यन्ताभावबुद्धिः । तत्रोत्पादविना-
शशाली चतुर्थोऽयमभाव इति केचित् ।
भाषा-अन्योन्याभावसे भिन्न अभावका नाम 'संसर्गाभाव' है और जिसकी तादा-
त्म्यसम्बन्धावच्छिन्ना प्रतियोगिता होय उसका नाम 'अन्योन्याभाव' है; विनाश
होनेवाले अभावका नाम 'प्रागभाव' है. एवं उत्पन्न होनेवाले अभावका नाम
ध्वंस है. अधिकरणपदार्थमें वस्तुके सदा सम्बन्धाभावका नाम 'अत्यन्ता-
भाव' है. जहां किसी एक भूतलदेशसे घटादि निकाल दिये और कालान्तरमें
फिर वहींदी स्थापन किये; वहां विशेषणरूप वर्तमान घटकालको अभावके स्वरूप-
सम्बन्धमें अविष्ट होनेसे अत्यन्ताभावके नित्य होनेसेभी घटकालमें घटात्यन्ता-
भावबुद्धि नहीं होती. कई एक आचार्य ऐसे स्थलमें उत्पत्तिविनाशवाला चौथा
अभाव मानते हैं.
अत्र ध्वंसप्रागभावयोरधिकरणे नात्यन्ताभाव इति प्राचीनमतम्।
श्यामघटे रक्तो नास्तीति, रक्तघटे श्यामो नास्तीति धीश्च प्राग-
भावं ध्वंसं चावगाहते, नतु तदत्यन्ताभावम् । नव्यास्तु तत्र
१ द्वितीय नाम इसका शास्त्रमें सामयिकाभाव है. समयविशेषमें होनेवालेका नाम
'सामयिकाभाव' है.
२० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
विरोधे मानाभावाद्ध्वंसादिकालावच्छेदेनाऽप्यत्यन्ताभावो वर्तत
इतिप्राहुः। नन्वस्त्वभावानामधिकरणात्मकत्वं लाघवादिति चेत्,
न,अनन्ताधिकरणात्मकत्वकल्पनामपेक्ष्यातिरिक्तकल्पनायाएव
लघीयस्त्वात् । एवं चाधाराधेयभावोऽप्युपपद्यते । एवं च तत्त-
च्छब्दगन्धरसाद्यभावानां प्रत्यक्षत्वमुपपद्यते, अन्यथा तत्तदधि-
करणानां तत्तदिन्द्रियाग्राह्यत्वादप्रत्यक्षत्वं स्यात् । एतेन ज्ञान-
विशेषकालविशेषाद्यात्मकत्वमत्यन्ताभावस्येति प्रत्युक्तम्, अ-
प्रत्यक्षत्वापत्तेः ।
भाषा-यहां प्राचीनाचार्योंका यह सिद्धांत है कि-ध्वंस तथा प्रागभावके
अधिकरणमें अत्यन्ताभाव नहीं रहता है. 'श्यामघटमें रक्तरूप नहीं है तथा रक्तघट-
में श्यामरूप नहीं है,' इत्यादि प्रतीतिसें रक्तरूपके प्रागभावका तथा श्यामरूपके
ध्वंसका अवगाहन होता है; किन्तु, उनके अत्यन्ताभावका अवगाहन नहीं होता,
क्योंकि प्रागभावका तथा ध्वंसका अत्यन्ताभावके साथ विरोध है और नवीन तो
यह कहते हैं कि-उनके परस्पर विरोधमें कोई प्रमाण नहीं. जिस कालमें ध्वंस
तथा प्रागभाव रहते हैं उसी कालमें अत्यन्ताभावभी उसी अधिकरणमें रहताहै
प्रभाकर शंका-लाघवसे अभावोंको तत्तदधिकरणस्वरूपही मानना उचित है.
समा०-अनेक अधिकरणस्वरूप कल्पनाकी अपेक्षा अभावोंकी अतिरिक्त कल्प-
नाही लघुभूता है. एवं अभावोंको अधिकरणोंसे अतिरिक्त माननेसे उनका आ-
धाराधेयभावभी बनसक्ता है. ऐसे माननेसे 'तत् तत्' शब्द गन्धरसादियों के
अभावका प्रत्यक्षभी बनसकता है. (अन्यथा) अभावोंको अधिकरण स्वरूप माने
तो अभावोंका साक्षात्कार नहीं होगा; क्योंकि शब्द गन्ध रसादिके अभावके अ-
धिकरण भूतलजलादि श्रोत्रघ्राणादि इन्द्रियोंसे ग्राह्य नहीं हैं. अभावोंको अधिक-
रणस्वरूप माने तो उनका ग्रहणभी नहीं होगा. इस वक्ष्यमाण कथनसे अत्यन्ताभाव-
को ज्ञानविशेषस्वरूप, अथवा कालविशेषस्वरूप माननेवालोंका सिद्धान्तभी खण्डित
किया, क्योंकि ऐसे माननेसे अत्यन्ताभावका प्रत्यक्ष नहीं होगा.
१ शंका-अभावाधिकरणका भावको तथा अभावप्रतियोगिताक अभावको जैसे आपने
अधिकरणस्वरूप मानकेभी आधाराधेय भावकी उपपत्ति करी है वैसेही प्रत्येक स्थलमें
अभावको अधिकरणस्वरूप मानकर आधाराधेय भावभी मानलिया जाय तो हानि क्या है?
समा०-इस रीतिसे इस दोषके वारण कियेभी 'तत्तत्' शब्द गन्धरसादिके अप्रत्यक्ष होनेका
दोष बना है इसी तात्पर्यसे मुक्तावलीकारने "एवंच "इत्यादि ग्रन्थसे द्वितीय दोष लिखाहै.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २१
इदानीं पदार्थानां साधर्म्यं वैधर्म्यं च वक्तुं प्रक्रमते, सप्तानामित्यादि-
भाषा-अब 'सप्तानां' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार पदार्थोंके समानधर्म्म तथा विरुद्ध
धर्म्मोंको कहता है-
सप्तानामपि साधर्म्यं ज्ञेयत्वादिकमुच्यते ॥ १३ ॥
भाषा-द्रव्यादि सात पदार्थोंका समानधर्म्म ज्ञेयत्वादिक कहाहै ॥ १३ ॥
समानो धर्मो येषां ते सधर्माणस्तेषां भावः साधर्म्यम्, समानो
धर्म इति फलितोऽर्थः । एवं विरुद्धो धर्मो येषां ते विधर्माण-
स्तेषां भावो वैधर्म्यम्, विरुद्धो धर्म इति फलितोऽर्थः । ज्ञेयत्वं
ज्ञानविषयता, साच सर्वत्रैवास्ति, ईश्वरादिज्ञानविषयतायाः
केवलान्वयित्वात्। एवमभिधेयत्वप्रमेयत्वादिकं बोध्यम् ॥२॥१३॥
भाषा--जितने पदार्थ परस्पर एक धर्म्मवालेहैं,उनमेंरहनेवाले धर्म्मका नाम समान
धर्म्म है. एवं जितने पदार्थ परस्पर विपरीतधर्म्मवाले हैं उनमें रहनेवाले धर्म्मका
नाम विरुद्ध धर्म्म है. 'ज्ञेयत्व' शब्दसे ज्ञानकी विषयताका ग्रहण है. वह
ज्ञानकी विषयता सर्वत्र विद्यमान है, क्योंकि ईश्वर और योगीकी ज्ञानीय विषयता-
को केवलान्वयि मानाहै. एवं 'अभिधा' नाम संकेतका है. उस संकेतीय विषय-
ताका नाम 'अभिधेयत्व' है. एवं 'प्रमा' नाम पदार्थज्ञानका है. उसकी विषयता
का नाम प्रमेयत्व है. यहां आदि शब्दसे अस्तित्त्व कालसम्बन्धित्व आदि धर्म्मोंका
ग्रहण है. द्रव्यादिषट्का समानधर्म्मभावत्व प्रसिद्ध है; इससे उसको छोड़कर
पञ्चोंका कहता है ॥
द्रव्यादयः पञ्चभावा अनेके समवायिनः ॥
भाषा-द्रव्यादि पञ्च पदार्थ भावरूप हैं, अनेक हैं तथा समवायी हैं ॥
द्रव्येति । द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषाणां साधर्म्यमनेकत्वं
समवायित्वं च । यद्यप्यनेकत्वमभावेऽप्यस्ति, तथाऽप्यनेकत्वे
सति भावत्वं पञ्चानां साधर्म्यम् । तथाचानेकभाववृत्तिपदार्थ-
१ विषयमें रहनेवाले ज्ञानादिनिरूपित धर्म्मविशेषका नाम विषयता है.
२ यावत् पदार्थोंमें रहनेवाले धर्म्मोंको न्यायसिद्धान्तमें केवलान्वयी माना है.
२२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
विभाजकोपाधिमत्त्वमिति फलितोऽर्थः । तेन प्रत्येकं घटादावा-
काशादौ च नाव्याप्तिः ।
भाषा-द्रव्य गुण कर्म्म सामान्य विशेष इन पञ्चोंका समानधर्म्म अनेकत्व तथा
समवायित्व है. यद्यपि अनेकता अभावमेंभी है उसमें इस लक्षणकी अतिव्याप्ति होगी
तथापि अनेकत्वविशिष्ट भावत्व पञ्चोंका समान धर्म्म है; इसकाभी अनेकभाव
पदार्थोंमें वर्तनेवाली जो पदार्थकी विभाजक द्रव्यत्व गुणत्वादि उपाधि तादृश
उपाधिमत्त्वं ऐसा अर्थ करना. एवं प्रत्येक घटादिव्यक्तिमें वा आकाशाँदि लक्षोंमें
लक्षणकी अव्याप्ति नहीं है. अन्यथा अनेकत्वविशिष्टभावत्व प्रत्येक घटमें तथा
आकाशादिमें नहीं है. अव्याप्ति अवश्य होगी.
समवायित्वं समवायसम्बन्धेन सम्बन्धित्वम्, नतु समवायवत्त्वं
सामान्यादावभावात्। तथाच समवेतवृत्तिपदार्थविभाजकोपाधि-
मत्त्वमिति फलितोऽर्थः । तेन नित्यद्रव्येषु नाव्याप्तिः ।
भाषा-समवायिशब्दका अर्थ समवायसम्बन्धसे सम्बन्धवाला है; किन्तु अनु-
योगितासम्बन्धसे समवायवाला इतनामात्र नहीं है; क्योंकि सामान्य तथा विशे-
षमें समवायसम्बन्धसे कोई पदार्थ नहीं रहता, इसकाभी समवेतपदार्थमें वर्तने-
वाली जो पदार्थकी विभाजक.द्रव्यत्वगुणत्वादि उपाधि तादृश 'उपाधिमत्त्वं' ऐसा
अर्थ करना. एवं ऐसा जातिघटित विवरण करनेसे भूतलादि चतुष्टयके परमाणु
तथा आकाशादि पञ्च इन नित्य द्रव्योंमें अव्याप्ति नहीं है. यहां "समवेतसमवेत-
वृत्तिपदार्थविभाजकोपाधिमत्त्वं" द्रव्यादि चारोंका समान धर्म्मभी जानना चाहिये.
सत्तावन्तस्त्रयस्त्वाद्याः-
भाषा-आद्यके तीन पदार्थोंका सत्तावत्त्व समान धर्म्म है.
-गुणादिर्निर्गुणक्रियः ॥ १४ ॥
भाषा-एवंगुणादि षट्का निर्गुणत्व निष्क्रियत्वरूप समान धर्म्म है ॥ १४ ॥
सत्तावन्तइति। द्रव्यगुणकर्मणां सत्तावत्त्वमित्यर्थः ।
भाषा-द्रव्य, गुण और कर्म्म, इन तीनोंका सत्तावत्त्व समान धर्म्म है.
गुणादिरिति।यद्यपि गुणक्रियाशून्यत्वमाद्यक्षणे घटादावतिव्याप्तम्,
१ सह उत्पन्नोंका कार्यकारण भाव संसारमें अदृष्ट चर है. एवं परस्पर कार्य्य
कारणभावके अनुरोधसे घटादि कार्य्यद्रव्योंसे क्षणमात्र पीछे गुणक्रियादिकी उत्पत्ति
मानी है.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २३
क्रियाशून्यत्वं च गगनादावतिव्याप्तम् । तथापि गुणवदवृत्तिधर्म-
वत्त्वं कर्मवदवृत्तिपदार्थविभाजकोपाधिमत्त्वं तदर्थः । नहि घट-
त्वादिकं द्रव्यत्वं वा गुणवदवृत्ति कर्मवदवृत्ति वा। किन्तु गुणत्वा-
दिकं तथा, आकाशत्वादिकं तु न पदार्थविभाजकोपाधिः ।
भाषा—यद्यपि गुणशून्यता तथा क्रियाशून्यता प्रथमक्षणमें घटादि कार्योंमेंभी है
वहां गुणादि लक्षणकी अति व्याप्ति होगी. एवं क्रियाशून्यता गगनादिमेंभी है.
वहांभी उक्त लक्षणकी अतिव्याप्ति होगी तथापि उक्त लक्षणका 'गुणवत् जो द्रव्य उसमें
न वर्तनेवाले जो गुणत्वादि धर्म तादृशधर्म्मवत्त्व' ऐसा विवरण करना उचित है.
किंवा 'क्रियावाला जो द्रव्य उसमें न वर्तनेवाली जो पदार्थकी विभाजकगुणत्वादि
उपाधि तादृश उपाधिमत्त्व' ऐसा विवरण करना उचित है. एवं घटादिमें दोष नहीं
है. क्योंकि घटत्वादि धर्म किंवा द्रव्यत्वरूप धर्म गुणवालेमें वा क्रियावालेमें न
वर्तनेवाला नहीं है, किन्तु वर्तनेवालाही है. गुणक्रियावालेमें न वर्तनेवाले धर्म
गुणत्व कर्म्मत्वादि हैं तादृश धर्मवत्ता गुणकर्म्मादिमें सिद्ध है. आकाशत्वादि धर्म
तो पदार्थविभाजक उपाधि नहीं हैं किन्तु द्रव्यविभाजक उपाधि हैं. एवं उनमेंभी
दोष नहीं है.
यद्वा गुणवद्वृत्तित्व सति कर्मवद्वृत्तित्वे सति वा सत्ताव्याप्य-
जातिशून्यभावत्वं विवक्षितम् । गुणकर्मणोरव्याप्तिवारणाय
गुणवद्वृत्ति कर्मवद्वृत्तीति वा । पुनस्तत्रैवाव्याप्तिवारणाय
सत्ताव्याप्येति । व्याप्तिश्च भेदगर्भा निवेशितेत्यतो न दोषः ।
द्रव्यगुणान्यतरत्वमादाय तत्रैवाव्याप्तिवारणाय जातीति ।
अभावेऽतिव्याप्तिवारणाय भावत्वमिति । गुणवद्वृत्तिः सत्ताव्या-
प्यजातिर्द्रव्यत्वं तच्छून्यत्वं पञ्चानामस्त्येव ।
भाषा—अथवा गुणवालेमें वर्तनेवाली तथा कर्मवालेमें वर्तनेवाली जो सत्ताकी
व्याप्य 'द्रव्यत्व' रूपा जातिः तादृशजातिशून्यभावत्व' गुणादि पञ्चोंका समान
धर्म है. यहां गुणमें तथा कर्म्ममें अव्याप्तिवारणार्थ गुणवालेमें तथा कर्म्मवालेमें
वर्तनेवाली ऐसा कहा. केवल सत्ताके ग्रहण करनेसे पुनः गुणकर्म्ममें होनेवाली
अव्याप्तिके वारणार्थ 'सत्ताव्याप्यजाति' ऐसा कहा. यहां व्याप्यव्यापकभावकी व्याप्ति
भेदगर्भिता विवक्षणीय है. (अन्यथा) समानाधिकरणरूप व्याप्ति माने तो 'स्व' में स्व-
२४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
व्याप्यत्वकेभी होनेसे सत्ताकी व्याप्यजाति सत्ताभी होगी. उस सत्तासे शून्यगुण
कर्मादि नहीं हैं. उनमें उक्त लक्षणकी अव्याप्ति होगी, उस अव्याप्तिके वारणार्थ
भेदगर्भित व्याप्तिका निवेश करना उचित है “स्वसमानाधिकरणत्वे सति स्वसमा-
नाधिकरणभेदप्रतियोगित्वम्” यह उसका स्वरूप है. यहां दोनों ‘स्व’ पदसे
व्यापकसत्ताका ग्रहण है. ऐसे द्रव्यत्वरूप व्याप्य सत्तामें द्रव्यातर्भावेन व्यापक
सत्ताके साथ समानाधिकरणत्वभी है. और गुणान्तर्भावेन सत्तासमानाधिकरणमें जो
भेद, तादृश भेदप्रतियोगित्वभी है. ऐसी व्याप्ति माननेसे पूर्वोक्त अव्याप्तिरूप
दोष नहीं. सत्ताका व्याप्य द्रव्यगुणादि अन्यतरत्वस्वरूप अखण्डोपाधिरूप धर्म्मभी
है उससे शून्य गुणादि नहीं हैं. लक्षणकी अव्याप्ति होगी उसके वारणार्थ ‘जाति’
पद कहा. अभावमें अतिव्याप्तिवारणार्थ भावत्वका निवेश किया. गुणवालेमें वर्तने-
वाली सत्ताकी व्याप्य जाति (द्रव्यत्व) रूपा है. उससे शून्यत्व गुणादि पांचोंको हैं.
सामान्यपरिहीनास्तु सर्वे जात्यादयो मताः ॥
भाषा-सामान्यादि सर्व पदार्थोंका सामान्यशून्यत्व समानधर्म्म है.
सामान्येति । सामान्यानाधिकरणत्वं सामान्यादीनामित्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् सामान्यादि चारों पदार्थ सामान्यके अधिकरण नहीं हैं.
पारिमाण्डल्यभिन्नानां कारणत्वमुदाहृतम् ॥ १५ ॥
भाषा-पारिमाण्डल्यसे भिन्न पदार्थोंका कारणतारूप समान धर्म है ॥ १५ ॥
पारिमाण्डल्येति । पारिमाण्डल्यमणुपरिमाणं कारणत्वं तद्भि-
न्नानामित्यर्थः । अणुपरिमाणं तु न कस्यापि कारणम् । तद्धि
स्वाश्रयारब्धद्रव्यपरिमाणारम्भकं भवेत्।तच्च न सम्भवति, परि-
माणस्य स्वसमानजातीयोत्कृष्टपरिमाणजनकत्वनियमात्,मह-
दारब्धस्य महत्तरत्ववदणुजन्यस्याणुतरत्वप्रसंगात् । एवं परम-
१ परमाणु तथा द्व्यणुकके परिमाणका नाम अणुपरिमाण है,
२ “तद्धि अणुपरिमाणं हीत्यर्थः । यदि कारणं स्यात्तदा स्वाश्रयारब्धद्रव्यपरिमा-
णारम्भकं भवेत्” अर्थात् परमाणुका परिमाण द्व्यणुकके परिमाणका वा द्व्यणुकका परिमाण
त्र्यणुकके परिमाणका असमवायिकारणत्वेन आरम्भक मानना होगा.
३ शंका-अणुपरिमाणसे जन्य परिमाणको अधिकअणु होनेसेभी दोष क्या है ?
समाधान-त्र्यणुकका चाक्षुष ज्ञान नहीं होगा. शंका-तौ फिर द्व्यणुक त्र्यणुकके परिमाणका
जनक कौन मानना चाहिये? समाधान-उसका जनक परमाणुगत संख्या है. इसी वार्त्ताका
यथावत् स्पष्टीकरण गुणनिरूपणावसरमें होगा.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २६
महत्परिमाणमतीन्द्रियं सामान्यं विशेषाश्च बोध्याः। इदमपि योगि-
प्रत्यक्षे विषयस्य न कारणत्वम् ।
भाषा-पारिमाण्डल्य नाम अणुपरिमाणका है. उससे भिन्नपदार्थोंका कारणतारूप
समान धर्म्म है.अणुपरिमाणको तो किसी कार्य्यके प्रतिभी कारणता नहीं है; क्योंकि
यदि उसमें कारणता मानेभी तो वह ( स्व ) अपने आश्रय जो परमाणु तथा
द्व्यणुक उनसे उत्पन्न होनेवाले द्व्यणुकत्र्यणुकरूपद्रव्यके परिमाणकाही जनक मान-
ना होगा, सो बनता नहीं; क्योंकि परिमाणका लोकमें यह स्वभाव देखनेमें आता
है कि वह ( स्व ) अपने सजातिसे ( उत्कृष्ट ) अधिक परिमाणकाही जनक होता है.
जैसे कपालद्वयके महत्परिमाणसे घटका अधिक महत्परिमाण उत्पन्न होता है,
वैसेही परमाणु तथा द्व्यणुकमें रहनेवाले अणुपरिमाणकोभी द्वयणुक तथा त्र्यणुकके
परिमाणके प्रति कारणता माने तो पूर्वोक्त न्यायसे द्वयणुक तथा त्र्यणुकका परिमाण
औरभी अधिक अणु होगा. ऐसेही कालादिके परम महत्परिमाणको तथा परमाणु
आदिके परमाणुत्वादि अतीन्द्रिय सामान्यको तथा विशेष पदार्थकोभी किसीके प्रति
कारणता नहीं है. यहभी जानने योग्य है. परन्तु यह “पारिमण्डल्यभिन्नानां”
इत्यादि ग्रन्थ उन नवीन आचार्योंके अभिप्रायसे है कि जो आचार्य्य योगीके प्रत्यक्षमें
विषयको कारणता नहीं मानते.
ज्ञायमानं सामान्यं न प्रत्यासत्तिः । ज्ञायमानं लिङ्गं नानुमिति-
करणमित्यभिप्रायेण । मानसप्रत्यक्षे आत्ममहत्त्वस्य कारणत्वा-
न्महत्परिमाणं कालादेर्बोध्यम् । तस्यापि न कारणत्वमित्याचा-
र्याणामाशयः इत्यन्ये । तन्न, ज्ञानातिरिक्तं प्रत्येवाकारणताया
आचार्य्यैरुक्तत्वात् ।
१ वर्तमान कालिक जो ज्ञान तादृश ज्ञानविषयीभूत सामान्य 'ज्ञायमानसामान्य' है.
२ यहां नवीनोंका यह सिद्धान्त है कि पार्थिवादि परमाणुओंका भेदक विशेष पदार्थ
नहीं, किन्तु विशेषका ज्ञानभेदक है. ऐसे ज्ञायमानसामान्य सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति
नहीं, किन्तु सामान्यका ज्ञानमात्र सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति है. ऐसेही ज्ञायमान लिङ्गभी
अनुमितिका कारण नहीं, किन्तु लिङ्गका ज्ञानमात्र अनुमितिका करण है और प्राचीनोंने तो
परमाणु परिमाणकोभी योगीके प्रत्यक्षमें विषयत्वेन कारण माना है; तैसे “परमाणुः अणु-
परिमाणवान्” इस ज्ञानके पश्चात् “सर्वे परमाणवः अणुपरिमाणवन्तः” इत्याकारक अलौकिक
प्रत्यक्ष सामान्यलक्षणाप्रत्यासत्तिसे होता है. इसमें सम्बन्धरूपेण अणु परिमाणकोभी
कारण माना है. तैसे 'परमाणुः द्रव्यं अणुपरिमाणात् ' इस अनुमितिमें अणुपरिमाणको
करणत्वेन कारण स्पष्टही माना है; परन्तु यहां मूल ग्रन्थ नवीनोंके सिद्धान्तसे लिखा है.
२६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-तथा ज्ञायमानसामान्यको प्रत्यासत्ति नहीं मानते, तैसे ज्ञायमान लिङ्गको
अनुमितिकरण नहीं मानते हैं. “ज्ञानवानहम्, इच्छावानहम्” इत्याकारक आत्माके
मानसप्रत्यक्षमें आत्माके परम महत् परिमाणकोभी कारणता है. इससे कारणता
शून्य परममहत्परिमाण आकाशादिकोंका जानना चाहिये. कई एक नैयायिक
उदयनाचार्यके आशयको लेकर आत्माके महत्परिमाणकोभी कारणता नहीं
मानते. सो सम्यक् नहीं;क्योंकि ज्ञानसे अतिरिक्त कार्यके प्रति आत्ममहत्परिमाण-
की कारणताका निषेधही उदयनाचार्यका आशय है.
ननु कारणत्वं किमत आह, अन्यथेति-
शंका-कारणता क्या पदार्थ है ? समाधान-उसको मूलकार ‘ अन्यथा ’
इत्यादि ग्रन्थसे स्वयं कहता है ॥
अन्यथा सिद्धिशून्यस्य नियता पूर्ववर्तिता ॥
कारणत्वं भवेत्तस्य त्रैविध्यंपरिकीर्तितम् ॥ १६ ॥
समवायिकारणत्वं ज्ञेयमथाप्यसमवायिहेतुत्वम् ॥
एवं न्यायनयज्ञैस्तृतीयमुक्तं निमित्तहेतुत्वम् ॥१७॥
यत्समवेतं कार्यं भवति ज्ञेयं तु समवायिजनंक तत् ॥
तत्रासन्नं जनकं द्वितीयमाभ्यां परं तृतीयं स्यात् १८
भाषा-अन्यथा सिद्धिसे शून्यनियमसे कार्यके प्रथम रहनेवाला कारण होता है.
वह तीन प्रकारका है ॥ १६ ॥ प्रथमका नाम ‘समवायिकारण’ है. द्वितीयका
नाम ‘असमवायिकारण’ है. तृतीयका नाम न्यायवेत्ता पुरुषोंने ‘निमित्त कारण’ कहा
है ॥ १७ ॥ जिसमें समवायसम्बन्धसे कार्य उत्पन्न हो वह समवायिकारण है ॥
( तत्र ) समवायिकारणमें समवेत होकर जो कार्यका जनक हो वह ‘ असमवायि
कारण ’ है. इन दोनों कारणोंसे भिन्न जो कारण है वह ‘निमित्तकारण’ है ॥ १८ ॥
तस्य कारणत्वस्य।तत्र समवायिकारणे।आसन्नं प्रत्यासन्नं कारणं
द्वितीयमसमवायिकारणमित्यर्थः । अत्र यद्यपि तुरीतन्तुसंयो-
गांनां पटासमवायिकारणत्वं स्यात्, एवं वेगादीनामप्यभिघा-
१ भाव यह है कि-तुरीतन्तु संयोगभी अनुयोगित्वेन तन्तुसमवेत है और पटरूप
कार्य्यका जनकभी है. एवं उक्तलक्षणका लक्ष होनेसे तुरीतन्तुसंयोगभी पटका असमवायि
कारण होना चाहिये.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. २७
ताद्यसमवायिकारणत्वं स्यात्, एवं ज्ञानादिकमिच्छाद्यसमवायि-
कारणं स्यात्, तथाऽपि पटासमवायिकारणलक्षणे तुरीतन्तुसंयो-
गभिन्नत्वं देयम्। तुरीतन्तुसंयोगस्तु तुरीपटसंयोगं प्रत्यसमवायि-
कारणं भवत्येव । एवं वेगादिकमपि वेगस्पन्दाद्यसमवायिकारणं
भवत्येवेति, तत्तत्कार्य्यासमवायिकारणलक्षणे तत्तद्भिन्नत्वं देयम् ।
भाषा-( अत्र ) यहां कारणलक्षणोंमेंसे असमवायि कारणके लक्षणानुसार यद्यपि
तुरीतन्तुओंके संयोगोंकोभी पटका असमवायि कारण होना चाहिये, ऐसेही वेग तथा
स्पर्शकोभी यथाक्रम अभिघाताख्य संयोगका तथा 'नोदनाख्य' संयोगका असम-
वायिकारण होना चाहिये, ( एवं ) ज्ञान इच्छाकोभी यथाक्रम इच्छा तथा प्रवृत्ति-
का असमवायिकारण होना चाहिये तथापि पटके असमवायिकारणके लक्षणमें
तुरीतन्तुसंयोगसे 'भिन्न' पदका निवेश करना उचित है अर्थात् तन्तुओंमें
समवेत हो और तुरीतन्तुसंयोगसे अन्य होकर पटका कारण हो, वही पटका
असमवायिकारण है और तुरीतन्तुसंयोगभी तुरीपटके संयोगके प्रति तो असम-
वायि कारण होसक्ता है, ऐसे वेगादिकभी वेगजन्य क्रियाके असमवायि कारण हो
सक्ते हैं, इसलिये तिस२विशेष कार्य्यके असमवायिकारणके लक्षणमें तिस२से भिन्न
पदका निवेश करना उचित है.
आत्मविशेषगुणानां तु कुत्राप्यसमवायिकारणत्वं नास्ति, तेन
१ शंका-तुरीतन्तुसंयोगकोभी पटके असमवायिकारणके लक्षणका लक्ष्यही माने
तो क्या दोष है? समाधान--नैयायिकोंने असमवायि कारणके नाशसे कार्य्यनाश
माना है, यदि तुरीतन्तुसंयोगभी पटका असमवायिकारण होगा तो उसके नाशसेभी पटका नाश
हुआ चाहिये और यह वार्त्ता देखनेमें तो नहीं आती याते उससे भिन्नत्वका निवेश
करना उचित है.
२ अर्थात् पटके असमवायिकारणके लक्षणमें 'तुरीतन्तुसंयोगभिन्नत्वे सति' का
निवेश करना चाहिये, ऐसे घटके असमवायिकारणके लक्षणमें 'चक्रकपालसंयोगभिन्नत्वे
सति' का निवेश करना चाहिये, तात्पर्य्य यह है कि-प्रत्येक कार्य्यके असमवायिकारणमें
निमित्तकारण तथा समवायिकारणका जो परस्पर संयोग उससे भिन्नत्वका निवेश.
करना उचित है.
३ यहां यह भाव है कि-आत्माके ज्ञानरूप विशेषगुणके प्रति आत्ममनःसंयोगको
असमवायिकारणता तो अवश्य माननीय है, एवं वही आत्ममनःसंयोग यदि अन्य
विशेष गुणोंकाभी असमवायि कारण बनसके तो आत्मविशेषगुणोंको परस्पर एक दूसरेके
प्रतिया किसी गुणान्तरके प्रति असमवायिकारणता माननी व्यर्थ है.