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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 350 में से

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पृष्ठ 38

१४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-न्यायसिद्धान्तमें घटपटादि यावत् पदार्थ अपने २ घटत्व पटत्वादि
धम्मोंसे परस्पर पृथक् बनेरहते हैं, परन्तु विशेष पदार्थ उनसे उलटाहै; अर्थात्
नित्य द्रव्योंको पृथक् करता हुआ आप स्वयं पृथक् बना रहता है. यही इसका
स्वरूप है. अब इससे उलटा यदि इसमें विशेषत्व धर्म मानलिया जाय तो इसके
'स्वतओ व्यावृत्तत्व' रूप वास्तव स्वरूपकी हानि होगी, याते विशेषत्व धर्म्म जातिरूप
नहीं है ॥ ५ ॥ जाति अपने अधिकरणोंमें समवायसम्बन्धसे रहतीहै, यह पूर्व
कहचुके हैं. एवं इसमें समवायसम्बन्धके अभावसे समवायमें समवायत्व धर्म्म
जातिरूप नहीं है ॥६॥ अधिक देशमें रहनेवालीका नाम परसत्ता है; और न्यून
देशमें रहनेवालीका नाम अपरसत्ता है. घटत्त्वादि यावत् जातियोंकी अपेक्षा
अधिक देशमें रहनेवाली होनेसे सत्ता पर है इसी वार्त्ताके बोधनार्थ मूलमें
“द्रव्यादित्रिकवृत्तिस्तु” अर्थात् द्रव्यादि तीनमें रहनेवाली कहा. सत्ताकी अपेक्षासे
घटत्वादि यावत् जातियां अपर हैं ॥ ८ ॥
परभिन्ना तु या जातिः सैवापरतयोच्यते ।
द्रव्यत्वादिकजातिस्तु परा,परतयोच्यते ॥ ९ ॥
व्यापकत्वात्परापि स्याद्व्याप्यत्वादपरापि च ॥
भाषा-परसत्तासे भिन्न जातिको अपरजाति कहतेहैं और द्रव्यत्वादिक
जातियां तो पर भी हैं तथा अपरभी हैं ॥ ९ ॥ जात्यन्तरकी अपेक्षा
व्यापक होनेसे वही जाति पर कही जाती है. तथा व्याप्य होनेसे उसीमें अपर
व्यवहार होताहै.
व्यापकत्वादिति। पृथिवीत्वाद्यपेक्षया व्यापकत्वादधिकदेशवृत्ति-
त्वाद्द्रव्यत्वादेः परत्वम् । सत्ताऽपेक्षया व्याप्यत्वादल्पदेशवृत्ति-
त्वाच्च द्रव्यत्वस्याऽपरत्वम् । तथाच धर्मद्वयसमावेशादुभयमवि-
रुद्धम् ।
भाषा-पृथिवीत्वादि जातियोंकी अपेक्षासे व्यापकरूपसे अधिक देशमें वर्तनेवाली
होनेसे द्रव्यत्व आदि जातियोंको परत्व है. तैसे सत्ताकी अपेक्षा व्याप्यरूपसे अल्प
देशमें रहनेवाली होनेसे द्रव्यत्वादि जातियोंको अपरत्व है. इस रीतिसे एक
व्यक्तिमें धर्म्मद्वयका समावेश परस्पर विरुद्ध नहीं है.