न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १५
विशेषं निरूपयति, अन्त्य इति-
भाषा-'अन्त्यः इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार विशेषका निरूपण करता है-
अन्त्यो नित्यद्रव्यवृत्तिर्विशेषः परिकीर्त्तितः ॥१०॥
भाषा-नित्य द्रव्योंके अवसानमें वर्त्तनेवालेका नाम विशेष कथन किया है॥१०॥
अन्तेऽवसाने वर्तते इत्यन्त्यो यदपेक्षया विशेषो नास्तीत्यर्थः ।
एकमात्रवृत्तिरिति फलितोऽर्थः । घटादीनां द्वयणुकपर्यन्तानां
तत्तदवयवभेदात् परस्परं भेदः परमाणूनां परस्परं भेदको विशेष
एव। स तु स्वत एव व्यावृत्तस्तेन तत्र विशेषान्तरापेक्षा नास्ती
ति भावः ।
भाषा-अन्तमें अर्थात् अवसानमें जो वर्त्ते उसका नाम 'अन्त्य' है, अर्थात् जिसकी
अपेक्षा दूसरा कोई विशेष नहीं है. फलितार्थ यह कि-विशेष पदार्थ प्रत्येक नित्य
द्रव्यकी एक व्यक्तिमात्रमें रहता है. घटादि स्थूलकार्योंसे लेकर द्वयणुकादि
सूक्ष्म कार्योंपर्य्यन्त अपने २ कपालपरमाणु आदि अवयवोंके भेदसे परस्पर भेद है,
परन्तु परमाणुओं का परस्पर भेदक विशेष पदार्थही है; वह आप स्वतः व्यावृत्तस्व-
रूप है, इससे उसमें विशेषान्तर कल्पना करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ १० ॥
समवायं दर्शयति, घटादीनामिति-
भाषा-'घटादीनां' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार समवाय को दिखलाताहै-
घटादीनां कपालादौ द्रव्येषु गुणकर्मणोः ॥
तेषु जातेश्च सम्बन्धः समवायः प्रकीर्तितः ॥ ११ ॥
भाषा-घटादि कार्योंका अपने कारण कपालादिकोंके साथ, तथा गुणकर्मोंका
द्रव्योंके साथ, एवं जातिका द्रव्यगुण कर्म तीनोंके साथ जो सम्बन्ध, उसका नाम
समवाय कहाहै ॥ ११ ॥
१ यहां ईश्वरकी नित्यज्ञानवत्त्वेन तथा आकाशकी शब्दसमवायिकारणत्वेन
व्यावृत्तिको मानते हुए विशेष पदार्थके माननेवालेभी कईएक पण्डित लोग ईश्वरमें तथा
आकाशमें विशेषपदार्थकी वृत्तिता नहीं मानते हैं, और नवीन लोग तो यह कहते हैं कि-
विशेषके अतिरिक्त पदार्थ माननेमें कोई प्रमाण नहीं है. जैसे-विशेष पदार्थ स्ववृत्ति धर्मसे
विना स्वयं व्यावृत्त हैं, वैसेही नित्य द्रव्योंकोभी मान सकते हैं. एवं विशेष पदार्थके
अतिरिक्त माननेका कुछ उपयोग नहीं.