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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 350 में से

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पृष्ठ 33

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ९
सादृश्य है; वह सादृश्य घटक धर्म कहीं जातिरूप है जैसे–घट 'सदृशःपटः' और
कहीं उपाधिरूप है. जैसे–"यथा गोत्वं नित्यं तथाऽश्वत्वमपि" इत्यादि.
द्रव्याणि विभजेत, क्षित्यबिति–
भाषा–' क्षित्यप् ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकारद्रव्योंका विभाग लिखताहै–
क्षित्यप्तेजोमरुद्व्योमकालदिग्देहिनो मनः॥
द्रव्याणि–
एतानि नव द्रव्याणीत्यर्थः ।
भाषा–पृथिवी जल अग्नि वायु आकाश काल दिशा आत्मा और मन ये नव द्रव्य हैं.
ननु द्रव्यत्वजातौ किं मानम्, नहि तत्र प्रत्यक्षं प्रमाणं घृतज-
तुप्रभृतिषु द्रव्यत्वाग्रहादिति चेत् न ।
शंका–द्रव्यत्वजातिमें क्या प्रमाण है ? यदि “ द्रव्यं द्रव्यं ” इस
अनुगत प्रतीतिसे प्रत्यक्ष प्रमाणही कहो तो सम्यक् नहीं, क्योंकि अशास्त्री
लोग घृत लाक्षादि पदार्थोंमें द्रव्य व्यवहार नहीं करते; इस लिये प्रत्यक्ष
प्रमाणसे सकल द्रव्य साधारण द्रव्यत्व जातिकी सिद्धि नहीं होती.
कार्यसमवायिकारणतावच्छेदकतया संयोगस्य विभागस्य वा
समवायिकारणतावच्छेदकतया द्रव्यत्वजातिसिद्धेरिति । ननु
( .१ ) समवायेन कार्य्यत्वावच्छिन्नके प्रति तादात्म्येन द्रव्यको कारणता है. कारणता
अवश्य किञ्चिद्धर्म्मावच्छिन्ना होती है । वह धर्मलाघवसे जातिरूप है। अनुमानप्रमाण
उसका साधक है । तथाहि । समवायसम्बन्धावच्छिन्न कार्य्यत्वावच्छिन्न कार्य्यनिष्ठ कार्य्यता
निरूपिततादात्म्य सम्बन्धावच्छिन्ना द्रव्यनिष्ठा या समवायिकारणता, सा किञ्चिद्धर्म्मावच्छिन्ना
कारणतात्वात्, घटगतकार्य्यतानिरूपितदण्डगतकारणतावत् १। यद्वा समवाय सम्बन्धावच्छिन्न
संयोगत्वावच्छिन्नसंयोगनिष्ठ कार्य्यता निरूपिता तादात्म्य सम्बन्धावच्छिन्नाद्रव्यनिष्ठा या
समवायिकारणता २ । अथवा समवायसम्बन्धावच्छिन्नविभागत्वावच्छिन्नविभागनिष्ठकार्य्यता
निरूपिता तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्ना द्रव्यनिष्ठा या समवायिकारणता ३ । इत्यादि
इन पिछले द्वय अनुमानमें साध्य हेतु तथा उदाहरणका निवेश प्रथम अनुमानवत्
करलेना. प्रथम अनुमानोंमें कार्य्यत्वधर्मको कार्य्यतावच्छेदक माननेमें उपस्थितिकृत गौरव है.
इसलिये द्वितीय कहा. द्वितीयमेंभी नित्यसंयोगवादीके मतसे संयोगत्वावच्छिन्ना कार्य्यता
अप्रसिद्ध है, इसलिये तृतीय कहा. नित्यविभागका आश्रय कोई द्रव्य नहीं है, इसलिये
विभागत्वावच्छिन्ना कार्य्यता अप्रसिद्ध नहीं है.