न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. १३
भाषा-नित्य और अनेक व्यक्तियोंमें समवायसम्बन्धसे रहनेवाला यह उस
सामान्यका लक्षण है. अनेक व्यक्तियोंमें समवाय सम्बन्धसे रहनेवाले
संयोगादि गुणभी हैं. सामान्यके लक्षणकी उनमें अतिव्याप्ति होगी, उसके
वारणार्थ लक्षणमें “नित्यत्वे सति” यह विशेषण कहा. संयोगादि गुण अनेक व्यक्ति-
योंमें समवायसम्बन्धसे रहते तो हैं परन्तु नित्य नहीं हैं, याते दोष नहीं. नित्य
तथा समवायसम्बन्धसे रहनेवाले आकाशके परिमाणादिभी हैं उनसे लक्षणकी
अतिव्याप्ति वारणार्थ ‘अनेक’ पद कहा. आकाशके परिमाणादि गुण नित्य
होकर समवायसम्बन्धसे रहते तो हैं, परन्तु अनेक व्यक्तियोंमें नहीं रहते किन्तु
केवल एक आकाशमात्रमें रहते हैं, याते दोष नहीं. नित्य होकर अनेक व्यक्तियोंमें
वर्तनेवाला अत्यन्ताभावभी है उससे लक्षणकी अतिव्याप्ति वारणार्थ साधारणरूपसे
वर्तनेको न कहकर समवायसम्बन्धसे वर्तना कहा. अत्यन्ताभाव अपने
अधिकरणोंमें स्वरूपसम्बन्धसे रहता है, समवाय से नहीं रहता; याते दोष नहीं
एकव्यक्तिमें वर्तनेवाला धर्म जातिरूप नहीं कहा जाता; इसी वार्ताको प्राचीनाचार्यों-
नेभी कहाहै ॥ व्यक्तिका अभेद तुल्यत्व, संकर, अनवस्था रूपहानि और
असम्बन्ध ये जातिके बाधकोंका संग्रह है ॥ १ ॥ उनमें आकाशादि एक व्यक्ति
में रहनेवाला होनेसे आकाशत्वादि धर्म जातिरूप नहीं है ॥ १ ॥ दोनोंका
सदृश स्वरूप होनेसे घटत्व और कलशत्व दोनों धर्म जातिरूप नहीं हैं, किन्तु शरीर
कृत लाघवसे घटत्वधर्मही जातिरूप है ॥ २ ॥ दोनोंका संकीर्ण होनेसे
भूतत्व और मूर्तत्व ये दोनों धर्म जातिरूप नहीं हैं ॥ ३ ॥ अनवस्थाके भयसे
सामान्यमें सामान्यत्व धर्म जातिरूप नहीं है ॥ ४ ॥
विशेषस्य व्यावृत्तस्वभावस्य रूपहानिः स्यादतो विशेषत्वं न
जातिः । समवायसम्बन्धाभावात् समवायो न जातिः । परत्वम-
धिकदेशवृत्तित्वम्। अपरत्वमल्पदेशवृत्तित्वम्। सकलजात्यपेक्ष-
याऽधिकदेशवृत्तित्वात् सत्तायाः परत्वम्। एतद्बोधनायैव द्रव्यादि
त्रिकवृत्तिरित्युक्तम्। तदपेक्षया चान्यासां जातीनामपरत्वम्॥८॥
१ भाव यह कि यदि विशेषपदार्थमें विशेषत्वरूप जाति मान ली जाय तो उसीसे उसको
व्यावर्तकत्व कहना होगा; क्योंकि सामान्याश्रयको सामान्यरूपसे भेदसाधकताका नियम है
परन्तु विशेषपदार्थको सामान्यरूपसे भेद साधकता बन नहीं सकती क्योंकि उनके स्वतः
व्यावर्त कत्वात्मक रूपकी हानि होती है.
२ समवायको या अभावको जातिवाला माननेसे प्रतियोगिताऽनुयोगिताऽन्यतरसम्बन्धसे
समवायाभावही बाधक है अर्थात् समवायमें प्रतियोगिताऽनुयोगिताऽन्यतर सम्बन्धसे समवाय
नहीं रहता. इति.