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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 350 में से

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पृष्ठ 36

१२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भ्रमणं रेचनं स्पंदनोर्ध्वज्वलनमेव च ।
तिर्यग्गमनमप्यत्र गमनादेव लभ्यते ॥ ७ ॥
भाषा-गोलाकार चलना, तिड़कना, थोड़ा२चलना, दीपशिखादिका ऊपरको ज्वलना,
सर्पादिका टेढ़ा चलना ये सब गमनके अंतर्भूत होनेसे प्रकृतमें गमन कथन मात्रहीसे
लाभ होसकते हैं ॥ ७ ॥
सामान्यं निरूपयति सामान्यमिति ॥
भाषा-‘सामान्यं’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार सामान्यका निरूपण करताहै-
सामान्यं द्विविधं प्रोक्तं परं चापरमेव च ॥
द्रव्यादित्रिकवृत्तिस्तु सत्तापरतयोच्यते ॥ ८ ॥
भाषा-पर और अपर भेदसे सामान्य दो प्रकारका है । द्रव्यादि तीन में
रहनेवाली सत्ताका नाम पर सामान्य है ॥ ८ ॥
तल्लक्षणं तु नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वम्, अनेकसमवेतत्वं
संयोगादीनामप्यस्त्यत उक्तं नित्यत्वे सतीति । नित्यत्वे सति
समवेतत्वं गगनपरिमाणादीनामप्यस्त्यत उक्तमनेकेति ।
नित्यत्वे सत्यनेकवृत्तित्वमत्यन्ताभावेऽप्यस्त्यतो वृत्तित्वसा-
मान्यं विहाय समवेतत्वमित्युक्तम् । एक व्यक्तिवृत्तिस्तु न
जातिः । तथाचोक्तम् । व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं संकरोऽथानव-
स्थितिः । रूपहानिरसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः ॥ १॥ इति ॥
तत्रैकव्यक्तिकत्वादाकाशत्वं न जातिः । तुल्यव्यक्तिकत्वाद्घ
टत्वं कलशत्वं न जातिद्वयम् । सङ्कीर्णत्वाद्भूतत्वं मूर्तत्वं च न
जातिः अनवस्थाभयात् सामान्यत्वं न जातिः ॥
१ परस्परात्यन्ताभावके समानाधिकरणमें रहनेवाले धर्मद्वयका एकत्र समावेश
संकर है, जैसे भूतत्वाभाववाले मनमें मूर्तत्व है और मूर्तत्वाभाववाले आकाशमें भूतत्व है
इन दोनोंका एकत्र समावेश पृथ्वी आदि चतुष्टयमें है, अर्थात् पृथ्वीआदि चतुष्टयमें भूतत्व
मूर्तत्व दोनों धर्म रहते हैं । इसलिये ये दोनों जातिरूप नहीं हैं.