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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 350 में से

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पृष्ठ 35

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ११
बुद्धिः सुखं दुःखमिच्छा द्वेषो यत्नो गुरुत्वकम् ॥
द्रवत्वं स्नेहसंस्कारावदृष्टं शब्द एव च ॥ ५ ॥
भाषा-रूपं. रसं गन्धं स्पर्शं संख्यां परिमाणं पृथक्त्व संयोगं विभागं परत्वं अपरत्वं
बुद्धि सुखं दुःखं इच्छा द्वेषं प्रयत्न गुरुत्वं द्रव्वत्वं स्नेहं संस्कार ( अदृष्ट ) धर्म्म
अधर्म्म और शब्दं ये चतुर्विंशति गुण हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥
एतेगुणा श्रतुर्विंशतिसंख्याकाः कणादेन कण्ठतश्च शब्देन च
दर्शिताः तत्र गुणत्वादिकजातिसिद्धिरेग्रे वक्ष्यते ॥ ४ ॥ ५ ॥
भाषा-शेषपद कारिकामें केवल पादपूर्तिके लिये हैं.ये चौबीस गुण कणाद मुनिने
अपने सूत्रोंमें कंठसे पढ़े तथा 'च' शब्दसे दिखलाये हैं, अर्थात् "प्रयत्नाश्च
गुणाः" ऐसे सूत्रके अन्तमें लिखा है.इससे यह सिद्ध हुआ कि १७ गुण कंठसे पढ़े हैं
और ७ 'च' शब्दसे दिखलाए हैं. उन गुणोंमें गुणत्वादि जातिकी सिद्धि
गुणनिरूपणावसरमें दिखलाई जायगी ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥
कर्माणि विभजते, उत्क्षेपणमिति-
भाषा-' उत्क्षेपणं ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार कर्म्मोंका विभाग दिखलाताहै-
उत्क्षेपणं ततोऽपक्षेपणमाकुञ्चनं तथा ॥
प्रसारणंच गमनं कर्म्माण्येतानि पञ्च च ॥ ६ ॥
भाषा-वस्तुका ऊपरको क्षेपण करना तैसे नीचेको क्षेपण करना.पटादि विस्तृत
पदार्थोंको संकोचना, तैसे संकुचित पदार्थोंको विस्तृत करना एवं परिच्छिन्न पदार्थकी
गमन क्रियाको मिलाकर यह पांचप्रकारका कर्म है ॥ ६ ॥
कर्म्मत्वजातिस्तु प्रत्यक्षसिद्धा । एवमुत्क्षेपणत्वादिकमपि ॥६॥
भाषा-चलनाकार अनुगत प्रत्यय ज्ञान होनेसे कर्म्मत्व जाति प्रत्यक्ष सिद्ध है.
ऐसे कर्म्मत्वजातिकी व्याप्य उत्क्षेपणत्व आदि जातियांभी प्रत्यक्ष सिद्ध हैं ॥ ६ ॥
नन्वत्र भ्रमणादिकमपि पञ्चकर्म्माधिकतया कुतो नोक्त-
मत आह । भ्रमणमित्यादि ।
शंका-यहां भ्रमणादि पांचकर्म्म औरभी क्यों नहीं कथन किये ? समाधान-
इसी शंकाके उत्तरमें 'भ्रमणं' इत्यादि ग्रन्थको मूलकार स्वयं लिखताहै-