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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 350 में से

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पृष्ठ 32

८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
ऐसे स्थलमें मणिमंत्रादिसे अग्निकी दाहानुकूल शक्तिका विनाश होता है.
और उत्तेजक सूर्य्यकान्तमणिके समीप होनेसे किंवा चन्द्रकान्त मणिके दूर कर देनेसे
अग्निमें दाहानुकूल शक्तिकी उत्पत्ति होती है, ऐसी कल्पना होसकती है. ऐसेही
सादृश्यभी एक पृथक् पदार्थ है. वह सादृश्य, द्रव्यादि षट् भावपदार्थोंके अंतर्भूत
नहीं है, क्योंकि जैसे गोत्वजाति नित्य है वैसेही अश्वत्वजातिभी नित्य है. इसप्रती-
तिसे सादृश्यपदार्थ सामान्यमेंभी प्रतीत होता है. भाव यह है कि, द्रव्यादि षट्
भावपदार्थोंमेंसे किसीका कदापि केनचिद्रूपेण सामान्यमें भान नहीं होता और
सादृश्यका होता है. इस लिये पृथक् पदार्थ मानना चाहिये. ऐसेही सद्‌रूपसे अर्थात्
भावरूपसे प्रतीत होनेसे सादृश्यको अभावके अन्तर्भूत भी नहीं कह सकते एवं
शक्ति तथा सादृश्य उक्त द्रव्यादि सप्त पदार्थोंसे अतिरिक्त पदार्थ हैं.
मण्याद्यभावविशिष्टवन्ह्यादेर्दाहादिकं प्रति स्वातन्त्र्येण मण्य-
भावादेरेव वा हेतुत्वकल्पनेनैव सामञ्जस्येऽनन्तशक्तितत्प्राग-
भावध्वंसकल्पनानौचित्यात् । नचोत्तेजके सति प्रतिबन्धक-
सद्भावेऽपि कथं दाह इति वाच्यम्, उत्तेजकाभावविशिष्टमण्य-
भावस्य हेतुत्वात् । सादृश्यमपि न पदार्थान्तरम्, किन्तु तद्भि-
न्नत्वे सति तद्गतभूयोधर्मवत्त्वम् । यथा चन्द्रभिन्नत्वे सति चन्द्र-
गताह्लादकत्वादिमत्त्वं मुखे चन्द्रसादृश्यमिति ।
भाषा-चन्द्रकान्तमणि आदिके अभावविशिष्ट अग्निको, अथवा, स्वतंत्ररूपसे
मणिआदि के अभाव को दाहादि के प्रति कारण कल्पनेसे सम्यक् निर्वाह होय तो
मणिआदिके समवधानासमवधानसे अनेक वार शक्तिकी उत्पत्ति तथा उसके प्रागभाव
ध्वंसकी कल्पना करनी अनुचित है. शंका-उत्तेजक सूर्य्यकान्त मणिके सत्त्व
कालमें प्रतिबन्धक चन्द्रकान्तमणिके समीप होनेसेभी अग्निसे दाह कैसे होता है ?
समा०-केवल चन्द्रकान्तमणिही प्रतिबन्धक नहीं, किन्तु उत्तेजक सूर्य्यकान्तमणिके
अभावविशिष्ट चन्द्रकान्तमणि दाहके प्रति प्रतिबन्धक है और उत्तेजकाभाव
विशिष्टचन्द्रकान्तमणिके अभावको दाहके प्रति कारणता है. ऐसेही सादृश्य
भी उक्त पदार्थोंसे कोई पृथक् पदार्थ नहीं है; किन्तु "तद्भिन्नत्वे सति तद्गतभूयो
धर्मवत्त्व" ही सादृश्य है अर्थात् 'तत्' किसीएक वस्तुसे भिन्न पदार्थमें जो उस
वस्तुकी अनेक धर्मवन्ता, वही उस पदार्थमें सादृश्य है. जैसे चन्द्रसे भिन्न सुन्दर
मुखमें, चन्द्रगत (आह्लादकत्व) सुख विशेष जनकत्वादि धर्मंही चन्द्रनिरूपित