न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
दशमं द्रव्यं तमः कुतो नोक्तम् । तद्धि प्रत्यक्षेण गृह्यते, तस्य च
रूपवत्वात्कर्मवत्त्वाच्च द्रव्यत्वम्। तच्चगन्धशून्यत्वात् न पृथिवी,
नीलरूपवत्त्वाच्च न जलादिकम्। तत्प्रत्यक्षे चालोकनिरपेक्षं चक्षुः
कारणमिति चेत्,न, आवश्यकतेजोऽभावेनोपपत्तौ द्रव्यान्तरक-
ल्पनाया अन्याय्यत्वात् । रूपवत्ताप्रतीतिस्तु भ्रमरूपा, कर्म-
वत्त्वप्रतीतिरप्यालोकापसारणोपाधिकीभ्रांतिरेव । तमसोऽतिरिक्त
द्रव्यत्वेऽनन्तावयवादिकल्पना गौरवं च स्यात्। सुवर्णस्य यथा तेज
स्यान्तर्भावस्तथाऽग्रे वक्ष्यते ॥
भाषा-कार्यकी समवायि कारणताकी अवच्छेदक होनेसे संयोगकी
अथवा विभागकी समवायि कारणताकी अवच्छेदक होनेसे द्रव्यत्व
जातिकी सिद्धि होती है. मीमांसक शंका-दशम द्रव्य अन्धकार क्यों नहीं
कहा ? उसका नेत्रोंसे ग्रहणभी होसकता है. और नील रूपवाला होनेसे, तथा
गमनादि क्रियावाला होनेसे उसमें द्रव्यरूपता सिद्ध है. गन्धशून्य होनेसे वह
पृथिवीरूप नहीं है नीलरूपवाला होनेसे जलादि स्वरूपभी नहीं है. और उसके
प्रत्यक्षमें प्रकाशकी सहायतासे विनाही नेत्र इंद्रियको कारणता है ॥ एवं दशम द्रव्य
अन्धकारभी माननीय है. समाधान-उष्ण स्पर्श तथा भास्वर रूपवाला होनेसे अव-
श्य माननीय जो तेजःपदार्थ, उसके अभावमेंही यदि अन्धकार व्यव-
हार होसके तो और अधिक पृथक्द्रव्यकी कल्पना करनी अनुचित है और उसमें
रूपवत्ता प्रतीति तो भ्रमरूपहै. एवं कर्मवत्त्व प्रतीतिभी प्रकाशापसरण
रूप उपाधिबलसे भ्रमरूपा है. अन्धकारको पृथक् द्रव्य माननेसे, उसके अनेक
अवयव, तथा तिनके उत्पत्ति विनाश कल्पना करनेमें गौरवभी होता है. इसलिये
अन्धकार पृथक् द्रव्य नहीं है और सुवर्ण जैसे तेजः पदार्थ के अन्तर्भूत है,
वैसे तेजो निरूपण अवसरमें कहेंगे ॥ ३ ॥
गुणान् विभजते, अथ गुणा इति-
' अथगुण ' इत्यादि ग्रंथसे मूलकार गुणोंका विभाग दिखलाता हैं-
-अथ गुणा रूपं रसो गन्धस्ततः परम् ॥ ३ ॥
स्पर्शः संख्या परिमितिः पृथक्त्वं च ततः परम् ॥
संयोगश्च विभागश्च परत्वं चापरत्वकम् ॥ ४ ॥