न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
३८८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-( इह ) न्यायसिद्धान्तमें अर्थापत्ति पृथक् प्रमाण नहीं है, क्योंकि
व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानहीमें इसकी गतार्थता होसकतीहै ॥ १४४ ॥
अर्थापत्तेस्त्विति । अर्थापत्तिं प्रमाणान्तरं मन्यन्ते केचन ।
तथाहि यत्र देवदत्तस्य शतवर्षजीवित्वं ज्योतिःशास्त्रादवगतं
जीविनो गृहासत्त्वं च प्रत्यक्षादवगतं तत्र शतवर्षजीवित्वान्यथा-
नुपपत्त्या बहिः सत्त्वं कल्प्यते । तदनुमानेन गतार्थत्वान्नेष्यते ।
भाषा-कुमारलभट्ट तथा वेदान्तीलोग अर्थापत्तिको पृथक् प्रमाण मानतेहैं
( तथाहि ) जैसे जहां किसी देवदत्तादि पुरुषविशेषका शतवर्षतक जीना ज्योतिः
शास्त्रसे निश्चित किया अर्थात् उसकी जन्मपत्रिकाद्वारा जाना तो जीवतेहुए उसका
घरमें न होना प्रत्यक्षसे निश्चयहुआ तो ऐसे स्थलमें उसका शतवर्षतक जीवना
( अन्यथा ) प्रकारान्तरेण अनुपपन्न हुआ किसी बाह्यदेशमें उसके सत्त्वकी अर्थात्
होनेकी कल्पना करवाता है इस प्रकारकी अर्थापत्तकी प्रमाणान्तरताभी अनुमानहीमें
गतार्थ है इसलिये पृथक्प्रमाणता वांछित नहींहै.
तथाहि । यत्र जीवित्वस्य बहिःसत्त्वगृहसत्त्वान्यतरव्याप्यत्वं
गृहीतं तत्रान्यतरसिद्धौ जायमानायां गृहसत्त्वबाधाद्वहिःसत्त्वम-
नुमितौ भासते ।
भाषा-(तथाहि ) बहिर्देशमें होना या घरमें होना इन दोनोंमें किसी एकनिष्ठ
व्यापकतानिरूपित व्याप्यताका ग्रहण जहां देवदत्तके जीवनमें हुआहै अर्थात् जहां
“जीविनो जीवित्वं बहिःसत्त्वगृहसत्त्वान्यतरव्याप्यं” इत्याकारक ज्ञान हुआहै वहां
दोनोंमें एककोटिके साक्षात्कार हुए पश्चात् गृहसत्त्वका बाध होनेसे जीवी देवदत्तका
बाह्य सत्त्व “ देवदत्तो बहिःसत्त्ववान् जीवित्वे सति गृहाभावदर्शनात् ” इत्याकारक
अनुमितिमें प्रतीत होताहै.
एवं ‘पीनो देवदत्तो दिवा न भुंक्ते’ इत्यादौ पीनत्वस्य भोजन-
व्याप्यत्वावगमाद्भोजनसिद्धौ दिवाभोजनबाधे च रात्रिभोजनं
सिध्यति । अभावप्रत्यक्षस्यानुभविकत्वादनुपलम्भोऽपि न
प्रमाणन्तरम् ।
भाषा-एवं ( पीन ) 'स्थूल देवदत्त दिनमें भोजन नहीं करता' इत्यादि स्थलमें
पीनत्वधर्मकी भोजनके साथ “ यत्र यत्र पीनत्वं तत्र तत्र भोजनम् ” इत्याकारक
व्याप्ति अनेकवार गृहीत है इससे भोजनकी सिद्धि हुई तो दिनमें भोजन प्रत्यक्षसे
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकामेता. २८९
बाधित है, इसलिये “देवदत्तो रात्रिभोजी दिवाभुञ्जानत्वे सति पीनत्वात्”इत्याकारक
प्रयोगसे रात्रिभोजनकी सिद्धि होती है. विशेषणतादिसम्बन्धसे अभावका साक्षात्कार
होना अनुभवसिद्ध है इसलिये उसका ग्राहक अनुपलब्धिभी पृथक् प्रमाण नहींहै.
किंचानुपलम्भस्याज्ञातस्य हेतुत्वे ज्ञानाकरणकत्वात् प्रत्य-
क्षत्वं, ज्ञातस्य हेतुत्वे तु तत्राप्यनुपलम्भान्तरापेक्षेत्यनवस्था ।
भाषा-( किञ्च ) अनुपलब्धिको पृथक् प्रमाण माननेवालेसे यह पूँछना चाहिये
कि-जिसको आपने स्वतंत्रप्रमाण माना है वह प्रतियोग्युपलम्भाभाव स्वयं अज्ञात
हुआ अभावका ग्राहक है,किंवा ज्ञात हुआ? यदि अज्ञात हुआ कहो तो ज्ञानाकरणक
ज्ञान होनेसे प्रत्यक्षहीके अन्तर्भूत हुआ और यदि ज्ञात हुआ कहो तो उसमें फिर
अनुपलम्भान्तरकी अपेक्षा होगी क्योंकि उस प्रथम अनुपलम्भके जाननेके लिये कोई
दूसरा अनुपलम्भ अवश्य चाहिये, एवं दूसरेके लिये तीसरा तीसरेके लिये चौथा,
ऐसेही पश्चाद्भाविनी कारणमुखी अनवस्था होगी.
एवं चेष्टापि न प्रमाणान्तरं तस्याः सङ्केतग्राहकशब्दस्मारक-
त्वेन लिप्यादिसमशीलत्वाच्छब्द एवान्तर्भावात् । यत्र तु व्या-
प्यादिग्रहस्तत्रानुमितिरेवेति ॥ १४४ ॥
भाषा-एवं तांत्रिकलोग चेष्टाको पृथक् प्रमाण मानतेहैं सोभी ठीक नहीं; क्योंकि
जैसे ( लिपि ) लिखेहुए अक्षरोंसे वक्तृतात्पर्यके ग्राहक शब्दोंका स्मरण होकर
शाब्दबोध होताहै वैसेही चेष्टाद्वाराभी चेष्टाकारकपुरुषकृतसंकेतग्राहक शब्दोंका स्मरण
होकर शाब्दबोधही होताहै इसलिये चेष्टाकाभी शब्दहीमें अन्तर्भाव है, परन्तु जहां
मूकबधिरादिकोंकी विलक्षण चेष्टाकी क्षुधादिके साथ व्याप्ति गृहीत है वहां “अयं
मूकबधिरो भोजनाभिलाषी मुखप्रसारणादिविलक्षणचेष्टावत्त्वात् ” इत्यादि प्रयोगद्वारा
अनुमितिज्ञानही होता है. यहां यह भाव है कि-कृतसंकेता तथा अकृतसंकेता भेदसे
चेष्टा दोप्रकारकी है; उसमें प्रथमा तो संकेतग्राहक शब्दस्मारका है इसलिये लिपिआ-
दिकी तरह शब्दप्रमाणके अन्तर्भूत है और दूसरी व्याप्तिग्रहणद्वारा अनुमानके
अन्तर्भूत है ॥ १४४ ॥
सुखं निरूपयति, सुखं तु जगतामेवेति-
भाषा-अब ' सुखन्तु ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार सुखका निरूपण करतेहैं-
सुखं तु जगतामेव काम्यं धर्मेण जन्यते ॥
भाषा-संसारमात्रकी कामनाके विषयका नाम 'सुख' है. धर्मसे वह उत्पन्न होताहै.
२३
२९० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
काम्यमभिलाषाविषयः । धर्मेनेति । धर्मत्वेन सुखत्वेन कार्यकार-
रणभाव इत्यर्थः ।
भाषा-सबकी अभिलाषाके विषय होना मूलगत ' काम्य ' शब्दका अर्थ है.
एवं धर्मत्वेन धर्मका तथा सुखत्वेन सुखका परस्पर कार्यकारण भाव है अर्थात् सर्वत्र
धर्मकारण है तो सुखरूप कार्य है, अन्यथा नहीं.
दुःखं निरूपयति, अधर्मेति-
भाषा-एवं ' अधर्म ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दुःखका निरूपण करते हैं-
अधर्मजन्यं दुःखं स्यात्प्रतिकूलं सचेतसाम्॥ १४५॥
भाषा-यावत् प्राणियोंको प्रतिकूल वेदनीय अर्थात् सबकी द्वेषके विषयका नाम
' दुःख ' है और अधर्मसे वह उत्पन्न होता है ॥ १४५ ॥
अधर्मत्वेन दुःखत्वेन कार्यकारणभाव इत्यर्थः । प्रतिकूलमिति ।
दुःखत्वज्ञानादेव सर्वेषां स्वाभाविकद्वेषविषय इत्यर्थः ॥१४५॥
भाषा-अधर्मत्वेन अधर्मका तथा दुःखत्वेन दुःखका परस्पर कार्यकारण भाव है
अर्थात् अधर्म कारण है तथा दुःखकार्य है. दुःखत्वेन रूपेण ज्ञात हुआही वह सम्पूर्ण
जीवोंके स्वाभाविक द्वेषका विषय होता है ॥ १४५ ॥
इच्छां निरूपयति, निर्दुःखत्व इति-
भाषा-एवं ' निर्दुःख' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार इच्छाका निरूपण करते हैं-
निर्दुःखत्वे सुखे चेच्छा तज्ज्ञानादेव जायते ।
इच्छा तु तदुपाये स्यादिष्टोपायत्वधीर्यदि ॥१४६॥
भाषा-दुःखाभावमें तथा सुखमें जीवकी इच्छा होती है, इन दोनोंके ज्ञानसे इच्छा-
की उत्पत्ति होती है; इन दोनोंके उपायमें यदि जीवको इष्टसाधनत्व प्रकारक ज्ञान
होय तो उपायविषयीणी इच्छाभी होती है ॥ १४६ ॥
इच्छा द्विविधा फलविषयीणी, उपायविषयीणी च । फलं तु सुखं
दुःखाभावश्च । तत्र फलेच्छां प्रति फलज्ञानं कारणम् । अत एव
स्वतः पुरुषार्थः सम्भवति, यज्ज्ञातं सत्स्ववृत्तितयेष्यते स पुरु-
षार्थ इति तल्लक्षणात् । इतरेच्छानधीनेच्छाविषयत्वं फलितो
ऽर्थः । उपायेच्छां प्रतीष्टसाधनताज्ञानं कारणम् ॥ १४६ ॥
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९१
भाषा-एक फलविषयीणी, दूसरी उपायविषयीणी, इस भेदसे इच्छा दोप्रकार-
की है. सुख तथा दुःखाभाव ये दोनों फल हैं. उन दोनों इच्छाओंमें फलइच्छाके
प्रति फलज्ञान कारण है; इसीलिये वह फल स्वतः पुरुषार्थरूप है; क्योंकि-जो ज्ञात
हुआ स्ववृत्तितया वांछित होय अर्थात् स्वविषयक ज्ञानजन्य इच्छाके विषय होय वह
पुरुषार्थ है, यही पुरुषार्थका लक्षण है. फलितार्थ यह कि--जो इतर इच्छाधीन इच्छाके
विषय नहीं है,वह स्वतः पुरुषार्थ है. एवं उपायमें पुरुषार्थता वारण हुई. यदि इष्टसा-
नताज्ञान होय तो जीवको फलसाधक उपायविषयीणी इच्छाभी होती है ॥ १४६ ॥
चिकीर्षा कृतिसाध्यत्वप्रकारेच्छा च या भवेत् ।
तद्धेतुः कृतिसाध्येष्टसाधनत्वमतिर्भवेत् ॥ १४७ ॥
भाषा-कृतिसाध्यत्वप्रकारका इच्छाका नाम चिकीर्षा है. कृतिसाध्यत्वप्रकारक
ज्ञान तथा इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान चिकीर्षाके कारण है ॥ १४७ ॥
चिकीर्षेति । कृतिसाध्यत्वप्रकारिका कृतिसाध्यविषयिणीच्छा
चिकीर्षा । पाकं कृत्या साधयामीति तदनुभवात् । चिकीर्षां
प्रति कृतिसाध्यताज्ञानमिष्टसाधनताज्ञानं च कारणम् । अत
एव वृष्ट्यां कृतिसाध्यताज्ञानाभावान्न चिकीर्षा ॥ १४७ ॥
भाषा-कृतिसाध्यत्वप्रकारिका कृतिसाध्य पदार्थविषयीणी इच्छाका नाम 'चिकीर्षा'
है 'पाकं कृत्या साधयामि' यह कृतिसाध्यविषयीणी इच्छाका परिचायक अनुभव
है. “ इदं मत्कृतिसाध्यम् ” इत्याकारक कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान तथा “ इदं
मदिष्टसाधनम् ” इत्याकारक इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान उक्तचिकीर्षाके निमित्तकारण
हैं. चिकीर्षामें कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानकोभी हेतुता है(अत एव) इसीलिये पुरुषकी
वृष्टिमें चिकीर्षा नहीं होती; क्योंकि वृष्टिमें पुरुषका कृतिसाध्यत्वप्रकारकज्ञान नहींहै.
भाव यह कि- सर्वत्र उभयप्रकारक ज्ञानही चिकीर्षाका जनक है.अन्यतरके न होनेसे
चिकीर्षा नहीं होती ॥ १४७ ॥
बलवद्विष्टहेतुत्वमतिः स्यात्प्रतिबन्धिका ॥
भाषा-अत्यन्त (द्विष्ट) द्वेषका विषय जो दुःख उस दुःखके साधन सर्पादिका
ज्ञान उक्तचिकीर्षाका प्रतिबन्धक है.
बलवदिति। बलवद्विष्टसाधनताज्ञानं तत्र प्रतिबन्धकमतो मधुविष-
संपृक्तान्नभोजने न चिकीर्षा । बलवद्द्वेषः प्रतिबन्धक इत्यन्ये ।
२९२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-प्रबल द्वेषविषयक दुःखादिसाधनताक “इदं मद्दुःखसाधनम्” इत्याकारक
ज्ञान ( तत्र ) उक्त चिकीर्षामें प्रतिबन्धक है, इसलिये विषमिश्रित ( मधु ) शहदादि
अन्न भोजनमें पुरुषकी चिकीर्षा नहीं होती. यहां ( अन्ये ) और कई एक विद्वान्
लोग लाघवसे केवल प्रबल द्वेषहीको उक्तचिकीर्षाका प्रतिबन्धक मानते हैं.
तदहेतुत्वबुद्धेस्तु हेतुत्वं कस्य चिन्मते ॥ १४८ ॥
भाषा-किसी एक विद्वान्के सिद्धान्तमें ( तत् ) बलवदनिष्टके अजनक विषयक
ज्ञानको उक्त चिकीर्षाके प्रति कारणता है ॥ १४८ ॥
तदहेतुत्वेति । बलवदनिष्टाजनकत्वज्ञानं कारणमित्यर्थः। कृति-
साध्यताज्ञानादिमतो बलवदनिष्टसाधनताज्ञानशून्यस्य बलवद्-
निष्टाजनकत्वज्ञानं विनापि चिकीर्षायां विलम्बाभावात्कस्य-
चिन्मत इत्यस्वरसो दर्शितः ॥ १४८ ॥
भाषा-अर्थात् कोई एक विद्वान् ‘ इदं मद्बलवदनिष्टाजनकम् ” इत्याकारक
बलवदनिष्टाजनकत्वप्रकारक ज्ञानको उक्त चिकीर्षामें कारणता मानता है; सो
ठीक नहीं;क्योंकि पुरुषको जिस किसीएक पदार्थमें बलवदनिष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान
नहींहै और कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान है,उसको बलवदनिष्टाजनकत्वप्रकारक ज्ञानसे
विनाभी अर्थात् “ इदं मद्बलवदनिष्टाजनकम् ” इत्याकारक ज्ञान नाभी होय
तो चिकीर्षा होसकती है. यही ( कस्यचित् )किसी के मतमें कार्यकारणभावका व्य-
तिरेक व्यभिचाररूप अस्वरस है ॥ १४८ ॥
द्वेषं निरूपयति, द्विष्टसाधनतेति-
भाषा-एवं 'द्विष्टसाधनता' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार द्वेषका निरूपण करतेहैं-
द्विष्टसाधनताबुद्धिर्भवेद्द्वेषस्य कारणम् ।
भाषा-( द्विष्ट ) द्वेषके विषय दुःखादि साधनविषयक ज्ञान द्वेषका निमित्त
कारण है.
दुःखोपायविषयकं द्वेषं प्रति बलवद्विष्टसाधनताज्ञानं कारणमित्य-
र्थः । बलवदिष्टसाधनताज्ञानं च प्रतिबन्धकं तेन नान्तरीयकदुः-
खजनके पाकादौ न द्वेषः ।
अर्थात् दुःखके उपायविषयक द्वेषके प्रति ( द्विष्ट ) दुःखके उपायविषयक
ज्ञानको कारणता है. उसी पदार्थमें यदि प्रबल इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञानभी होय तो
वह उक्त द्वेषका प्रतिबन्धक होताहै. भाव यह कि-यद्यपि पाकनिर्माणकालमें पुरु
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९३
षको धूमादिजन्य दुःख नियमसे होता है, इसलिये पाकनिर्माणमें द्वेष हुआ चाहिये
तथापि ऐसे स्थलमें “ पाको मदिष्टसाधनम् ” इत्याकारक इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान
उक्त द्वेषका प्रतिबन्धक है; इसीलिये ( नान्तरीयक ) नियमपूर्वक दुःखके जनक
पाकादिकोंमें पुरुषका द्वेष नहीं होता है.
यत्नं निरूपयति, प्रवृत्तिश्चेति-
भाषा-एवं 'प्रवृत्तिश्च' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार प्रयत्नका निरूपण करते हैं-
प्रवृत्तिश्च निवृत्तिश्च तथा जीवनकारणम् ॥ १४९ ॥
एवं प्रयत्नत्रैविध्यं तान्त्रिकैः परिदर्शितम् ।
भाषा-प्रवृत्ति, निवृत्ति, तथा जीवनकारण ॥ १४९ ॥ भेदसे तीन प्रकारका
प्रयत्न शास्त्रकारोंने निरूपण किया है.
प्रवृत्तिनिवृत्तिजीवनयोनियत्नभेदात् प्रयत्नस्त्रिविध इत्यर्थः ।
भाषा-अर्थात् एक प्रवृत्तिरूप प्रयत्न, दूसरा निवृत्तिरूप प्रयत्न, और तीसरा जी-
नकारणप्रयत्न, इस भेदसे प्रयत्न तीन प्रकारका है.
चिकीर्षा कृतिसाध्येष्टसाधनत्वमतिस्तथा ॥ १५०॥
उपादानस्य चाध्यक्षं प्रवृत्तौ जनकं भवेत् ॥
भाषा-उपादेयपदार्थमें कृतिसाध्यविषयिणी इच्छा तथा कृतिसाध्यत्वविशिष्ट
इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान ॥१५०॥ और उपादेयपदार्थके समवायिकारणका साक्षात्कार
ये सभी प्रवृत्तिरूप प्रयत्नके जनक हैं.
चिकीर्षेत्यादि । मधुविषसंपृक्तान्नभोजनादौ बलवदनिष्टानुबन्धि-
त्वेन चिकीर्षाभावान्न प्रवृत्तिरिति भावः । कृतिसाध्यताज्ञाना-
दिवद्वलवदनिष्टाननुबन्धित्वज्ञानमपि स्वतन्त्रान्वयव्यतिरेका-
त्प्रवृत्तौ कारणमित्यपि वदन्ति । कार्यताज्ञानं प्रवर्तकमिति गुरवः।
भाषा-विषमिश्रित मधुर अन्नभोजनमें मरणरूप प्रबल अनिष्टजनकता है इसलिये
वहां चिकीर्षाके न होनेसे प्रवृत्तिभी नहीं होती. यहां कई विद्वान् लोग ऐसेभी कहतेहैं
कि-जैसे कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान तथा इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान प्रवृत्तिमें स्वतंत्र
कारण है; वैसेही बलवदनिष्टाजनकत्वप्रकारक ज्ञानभी अन्वयव्यतिरेकद्वारा
प्रवृत्तिमें स्वतंत्रहीकारण है. यहां ( गुरु ) प्रभाकर कार्यताज्ञानको प्रवर्तक मानते हैं
अर्थात् प्रवृत्तिके प्रति केवल कृतिसाध्यताज्ञानको हेतुता कहते हैं.
२९४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
तथाहि । ज्ञानेन प्रवृत्तौ जननीयायां चिकीर्षातिरिक्तं नापेक्षित-
मस्ति, सा च कृतिसाध्यताज्ञानसाध्या, इच्छायाः स्वप्रकारप्रका-
रकधीसाध्यत्वनियमात् । चिकीर्षा हि कृतिसाध्यत्वप्रकारि-
केच्छा ।
भाषा-( तथाहि ) " इदं मत्कृतिसाध्यम् " इत्याकारक कृतिसाध्यत्वप्रकारक
ज्ञानको प्रवृत्तिजननमें चिकीर्षासे अतिरिक्त किञ्चिदपि अपेक्षित नहीं है, किन्तु
मध्यमें व्यापाररूपेण केवल चिकीर्षा अपेक्षित है, वह चिकीर्षा कृतिसाध्यत्वप्रकार-
कज्ञानजन्या है क्योंकि यह नियम है कि-यद्विशेष्यक यत्प्रकारक इच्छा होतीहै
वह अवश्य तद्विशेष्यकतत्प्रकारकज्ञानजन्या होतीहै और कृतिसाध्यत्वप्रकारक
इच्छाहीका नाम ' चिकीर्षा ' है.
तत्र कृतिसाध्यत्वं प्रकारस्तत्प्रकारकज्ञानं चिकीर्षायां तद्वारा
प्रवृत्तौ च हेतुः, न त्विष्टसाधनताज्ञानं तत्र हेतुः, कृत्यसाध्येऽपि
चन्द्रमण्डलानयनादौ प्रवृत्त्यापत्तेः ।
भाषा-( तत्र ) उस इच्छामें ' कृतिसाध्यत्व ' रूप धर्मका प्रकाररूपेण भान है.
( तत्प्रकारक ) तादृश कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान चिकीर्षामें तथा चिकीर्षाद्वारा
प्रवृत्तिमें कारण है. एवं इष्टसाधनताज्ञानको प्रवृत्तिमें जनकता नहीं है. यदि इष्टसा-
धनत्वप्रकारक ज्ञानकोभी प्रवृत्तिजनकता होय तो पुरुषप्रयत्नसे असाध्य चन्द्रमण्डलके
आनयनादिकोंमेंभी पुरुषकी प्रवृत्ति हुई चाहिये.
ननु कृत्यसाध्यताज्ञानं प्रतिबन्धकमिति चेत् । न । तदभावापेक्ष-
या कृतिसाध्यताज्ञानस्य लघुत्वात् ।
भाषा-ऐसे स्थलमें यदि " चन्द्रमण्डलानयनं मत्प्रयत्नासाध्यम् " इत्याकारक
ज्ञानको प्रवृत्तिके प्रति प्रतिबन्धकता कहो तो यहभी उचित नहीं, क्योंकि प्रतिबन्ध-
काभावमें कारणता माननेकी अपेक्षासे कृतिसाध्यत्वप्रकारकज्ञानमें कारणता माननेमें
लाघव है. भाव यह कि--कृत्यसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानको प्रतिबन्धक मानकर तादृश
प्रतिबन्धकाभावको अर्थात् कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानको आपने प्रवृत्तिके प्रति कारण
मानना होगा इससे केवल कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानमें कारणता माननेमें लाघव है.
न च द्वयोरपि हेतुत्वम् । गौरवात् ।
शंका-कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान तथा इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान ये दोनोंही यदि
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९५
प्रवृत्तिके प्रति कारण मानलिये जाँय तो हानि क्या है? समाधान-यदि एकहीसे
निर्वाह होसके तो दोनोंमें कारणता माननेमें व्यर्थ गौरव है.
ननु तन्मतेऽपि मधुविषसंपृक्तान्नभोजने चैत्यवन्दने च प्रवृत्त्या-
पत्तिः कार्यताज्ञानस्य सत्त्वादिति चेत् । न । स्वविशेषणवत्ताप्र-
तिसन्धानजन्यकार्यताज्ञानस्य प्रवर्तकत्वात् ।
शंका-(त्वत्) प्रभाकरके सिद्धान्तमेंभी विषमिश्रित मधुरान्नभोजनमें तथा (चैत्य)
बुद्धप्रतिमादिके वन्दनमें पुरुषकी प्रवृत्ति हुई चाहिये; क्योंकि-प्रवृत्तिका कारणीभूत
“ विषमिश्रितमधुरान्नभोजनं बुद्धप्रतिमावन्दनं वा मत्कृतिसाध्यम् ” इत्याकारक ज्ञान
विद्यमान है. समाधान-हमारे सिद्धान्तमें हरएक कार्यताज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता
नहीं है किन्तु स्वविशेषणवत्ता प्रतिसन्धानजन्य कार्यताज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता है.
यहां ‘ स्व ’ पदसे प्रर्वतमान पुरुषका ग्रहण है; उसका विशेषण काम्यकर्मस्थलमें
कामना है और नित्यकर्मस्थलमें तत्कालिक शौचादि है; एतादृश विशेषणवत्ताका
पुरुषको जब अपनेमें ( प्रतिसन्धान ) ज्ञान होगा उस विशेषणवत्ताज्ञानको लिङ्गवि-
धया कार्यताज्ञानमें हेतुता है. जैसे “ पाको मत्कृतिसाध्यः, मत्कृतिं विनाऽसत्त्वे सति
मदिष्टसाधनत्वात् ”इस अनुमानजन्य कार्यताज्ञान काम्यस्थलमें प्रवृत्तिका कारण है.
एवं “अहं इदानींतनकृतिसाध्यसन्ध्यावन्दनको ब्राह्मणत्वे सति विहितसन्ध्याकालि-
कशौचादिमत्त्वात् ” इस अनुमानजन्य कार्यताज्ञान नित्यस्थलमें प्रवृत्तिका कारणहै.
काम्ये हि यागपाकादौ कामनास्वविशेषणम् । ततश्च बलवदनि-
ष्टाननुबन्धिकाम्यसाधनताज्ञानेन कार्यताज्ञानम् । ततश्च प्रवृ-
त्तिः । तृप्तश्च भोजने न प्रवर्तते तदानीं कामनायाः पुरुषविशे-
षणत्वाभावात् । नित्ये च शौचादिकं पुरुषविशेषणं तेन शौचा-
दिज्ञानाधीनकृतिसाध्यताज्ञानात्तत्र प्रवृत्तिः ।
भाषा-यागपाकादि काम्य कर्म्मस्थलमें कामना ( स्व ) पुरुषका विशेषण है;
उससे प्रबल अनिष्टासम्बन्धि इष्टसाधनता ज्ञानद्वारा कार्यताका ज्ञान होताहै उस
ज्ञानसे प्रवृत्ति होतीहै. तृप्त हुए पुरुषकी भोजनमें प्रवृत्ति नहीं होती. क्योंकि उस
कालमें कामना पुरुषका विशेषणीभूत नहींहै एवं नित्यकर्मस्थलमें शौचादि पुरुषके
विशेषणरूप हैं इसलिये शौचादिज्ञानाधीन कृतिसाध्यत्वप्रकारकज्ञान होताहै. उससे
( तत्र ) नित्यकर्ममें प्रवृत्ति होतीहै.
ननु तदपेक्षया लाघवेन बलवदनिष्टाननुबन्धीष्टसाधनताविषयक-
कार्यताज्ञानमेव हेतुरस्तु,बलवदनिष्टाननुबन्धित्वं चेष्टोत्पत्तिना-
न्तरीयकदुःखाधिकदुःखजनकत्वम्, बलवद्वेषविषयदुःखजनक-
त्वं वेति चेत् । न । इष्टसाधनत्वकृतिसाध्यत्वयोर्युगपज्ज्ञातुमश-
क्यत्वात् । साध्यत्वसाधनत्वयोर्विरोधात् । असिद्धस्य हि साध्य-
त्वं सिद्धस्य च साधनत्वम् । न चैकमेकेनैकदा सिद्धमसिद्धं चे-
ति ज्ञायते, तस्मात्कालभेदादुभयं ज्ञायत इति !
नैयायिक शंका-इसकी अपेक्षासे अर्थात् बलवदनिष्टासम्बन्धित्वविशिष्ट इष्ट-
साधनताज्ञानजन्य कृतिसाध्यताज्ञानकी अपेक्षासे लाघवसे यदि बलवदनिष्टासम्बन्धि
इष्टसाधनताविषयक कार्यताज्ञानको प्रवृत्तिके प्रतिकारण मानलिया जाय तो हानि
क्याहै? यहां इष्टसाधनतामें बलवदनिष्टाननुबन्धित्व यहहै कि-पाकादिष्ट उत्पादनमें
नियमसे होनेवाले धूमादिजन्य दुःखसे अधिक दुःखके जनक न होना अथवा प्रबल द्वेषके
विषय मरणादिजन्य दुःखके जनक न होना एवं कृतिसाध्यताज्ञानमें इष्टसाधनताज्ञान-
जन्यत्व धर्म माननेकी अपेक्षा इष्टसाधनताविषयकत्व धर्म माननेमें लाघव है. क्योंकि
जन्यजनकभाव सर्वत्र अन्यवहित पूर्वोत्तरादिनियमघटित होताहै. इसलिये इसमें उप-
स्थितिकृत गौरव है. प्रभाकर-( इतिचेन्न ) यह कथन आपका योग्य नहीं;क्योंकि-
इष्टसाधनत्वका तथा कृतिसाध्यत्वका पुरुषको एक कालावच्छेदेन ज्ञान होना
असम्भव है. कारण यह कि-साध्यत्व, साधनत्व, ये दोनों धर्म परस्पर विरोधी हैं,
इसलिये एककालमें इन दोनोंका होनाही असम्भव है. क्योंकि, जो अभी सिद्ध न हुआ
होय, उसका नाम ‘ साध्य ’ है. ऐसे प्रथमलक्षणवृत्तिपाकादि हैं और जो किसी एक-
रूपसे सिद्ध होचुका होय, उसका नाम ‘ साधन ’ है. ऐसे अपाकावस्थापन्नपरिष्कृत
तण्डुलादि हैं. एवं एकपुरुष एकवस्तुको एककालावच्छेदेन सिद्धासिद्ध उभयरूपसे
नहीं जानसकता. भाव यह कि-यदि एक वस्तु सिद्धासिद्ध उभयभेदसे ज्ञात होगी तो
उसका “ असिद्धः पाकः कृतिसाध्यः सिद्धश्चेष्टसाधनं ” इत्याकारक समूहालम्बना-
त्मक ज्ञानही कहना होगा. सो बन नहीं सकता; क्योंकि सिद्धत्व असिद्धत्व ज्ञानोंका
परस्पर विरोध है, इसलिये सिद्ध साधन उभयका कालभेदसे ज्ञान माननाही उचितहै.
मैवम् । लाघवेन बलवदनिष्टाननुबन्धीष्टसाधनत्वे सति कृतिसा-
ध्यताज्ञानस्य तत्र हेतुत्वात् । न च साध्यत्वसाधनत्वयोर्विरोधः ।
यदा कदाचित् साध्यत्वसाधनत्वयोरविरोधादेकदासाध्यत्वसाध-
नत्वयोश्च ज्ञानात् ।
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९७
नैयायिक-(मैवम्) यह कथन आपका युक्त नहीं है; क्योंकि लाघवसे बलवद्
अनिष्टासबन्धि इष्टसाधनत्वविशिष्ट कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानकोही ( तत्र ) प्रवृत्तिमें
कारणता माननी उचित है. एवं साध्यत्व साधनत्व धर्मकाभी परस्पर विरोध नहीं है,
क्योंकि किसीएक कालमें होनेवाले साध्यत्वधर्मका किसी एककालमें होनेवाले साध-
नत्वधर्मके साथ विरोधका होना असम्भव है. भाव यह कि-यद्यपि एककालावच्छेदेन
एक धर्मीमें कृतिसाध्यत्व तथा इष्टसाधनत्वरूप धर्मद्वय विरोधीहैं, तथापि हमको एकका-
लीन कृतिसाध्यत्व इष्टसाधनत्वरूप धर्मके ज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता अपेक्षित नहीं है
किन्तु केवल कृतिसाध्यत्व इष्टसाधनत्वरूप धर्मके ज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता अपेक्षित
है वह धर्मद्वय किंचित् कालभेदसे एकधर्मीमें रहसकते हैं. एवं उनहीको विषय
करनेवाला इष्टसाधनत्वविशिष्ट कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानभी होसकता है और
वही प्रवृत्तिमें कारण है.
नवीनास्तु ममेदं कृतिसाध्यमिति ज्ञानं न प्रवर्तकमनागते तस्य
ज्ञातुमशक्यत्वात्। किंतु यादृशस्य पुंसः कृतिसाध्यं यद्दृष्टं ता-
दृशत्वं स्वस्य प्रतिसन्धाय तत्र प्रवर्तते, तेन 'ओदनकामस्य
तत्साधनताज्ञानवतस्तदुपकरणवतः पाकः कृतिसाध्यस्तादृश-
श्चाहम्' इति प्रतिसन्धाय पाके प्रवृत्तिरित्याहुः। तन्न। स्व-
कल्पितलिप्यादिप्रवृत्तौ यौवने कामोद्भेदादिना सम्भोगादौ च
तदभावात् ।
भाषा-और प्रभाकरके अनुयायी कईएक नवीनलोग तो यह कहतेहैं कि- "इदं
मत्कृतिसाध्यम्" इत्याकारक ज्ञान प्रवृत्तिमें कारणही नहीं है. क्योंकि ( अनागत )
भाविपदार्थमें ( तस्य ) कृतिसाध्यत्वरूप धर्मका ज्ञान होनाही असम्भव है किन्तु
जैसे पुरुषके प्रयत्नसे जिस पदार्थकी सिद्धि जिसने देखी, वह पुरुष अपनेको उस कृत
प्रयत्न पुरुष जैसा मानकर उसी पदार्थकी सिद्धिमें प्रवृत्त होताहै; जैसे पाकमें पुरुषकी
प्रवृत्ति ' ओदनकामस्य ओदनसाधनताज्ञानवतः ओदनोपकरणवतः पाकः कृति-
साध्यः तादृशश्चाहं-अर्थात् ओदनकी कामनावाले तण्डुलादिनिष्ठ ओदनसाधनताज्ञा-
नवाले तथा स्थालीकाष्ठादि ओदनउपकरण सामग्रीवाले पुरुषकी कृतिसे पाकसाध्य
है"और "तादृशश्चाहं-अर्थात् ओदनकामनावान् ओदन साधनताज्ञानवान् तथा ओद-
नोपकरणवान् मैंभी हूं"इत्याकारक ज्ञानद्वारा होती है! ( तन्न ) यह नवीनोंका कथन
सम्यक् नहीं है. क्योंकि अपने संकेतद्वारा कल्पना करी लिपि आदिकी प्रवृत्तिमें तथा
यौवनावस्थामें कामातुर हुए पुरुषकी भोगादि प्रवृत्तिमें उक्तज्ञान नहीं है; अर्थात् "स्व-
२४
संकेतकल्पिता नूतनलिपिः" पहले पुरुषान्तरकृतिसाध्या कहीं नहीं देखी. एवं यौवना-
वस्थापन्न कामातुर हुए पुरुषनेभी अपनेसे पहले भोग पुरुषान्तरकृतिसाध्य कहीं नहीं
देखा अर्थात् इत्यादिस्थलोंमें नवीन कल्पित कार्यकारणभावका व्यतिरेक व्यभिचार
है, इसलिये उसके सिद्धांतसे प्रवृत्ति नहीं हुई चाहिये, परन्तु होती है, इसलिये नवी-
नकी कल्पना सम्यक् नहीं है.
इदं तु बोध्यम् । इदानीन्तनेष्टसाधनत्वादिज्ञानं प्रवर्तकं तेन भा-
वियौवराज्ये बालस्य न प्रवृत्तिस्तदानीं कृतिसाध्यत्वाज्ञानात् ।
भाषा-(इदन्तु बोध्यम् ) इतना यहां औरभी अधिक जानने योग्य है कि-
वर्तमानकालिक इष्टसाधनत्वादि ज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता है; इसलिये ( भावि )
होनेवाले यौवराज्यमें बालराजपुत्रकी प्रवृत्ति नहीं होसकती क्योंकि उस कालमें उस-
को कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान नहीं है.
एवं तृप्तो भोजने न प्रवर्तते तदानीमिष्टसाधनत्वाज्ञानात् । प्रव-
र्तते च रोषदूषितचित्तो विषादिभक्षणे तदानीं बलवदनिष्टाननु-
बन्धित्वाज्ञानात् ।
भाषा-एवं तृप्तपुरुष भोजन करनेमें प्रवृत्त नहीं होता, क्योंकि उस कालमें उस
को इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान नहीं है और क्रोधाक्रान्त होकर पुरुष विषादिभक्षणमें
भी प्रवृत्त होजाता है, क्योंकि उस कालमें उसको विषमें बलवद्अनिष्टासम्बन्धित्व
ज्ञान होता है.
न चास्तिकस्यागम्यागमनशत्रुवधादिप्रवृत्तौ कथं बलवदनिष्टा-
ननुबन्धित्वबुद्धिर्नर कसाधनत्वज्ञानादिति वाच्यम् । उत्कटरा-
गादिना नरकसाधनताधीतिरोधानात् ।
शंका-आस्तिक पुरुषको अगम्या परस्त्री आदिके गमनमें तथा शत्रुवधादिकार्यों-
में प्रवृत्तिसे प्रथम बलवद्अनिष्टासम्बन्धित्वज्ञान कैसे होता है? क्योंकि उसको तो बल-
वत् जो नरकरूपअनिष्ट तत्साधनत्वज्ञान अगम्यागमनादि कुकर्मोंमें सदा बनारहताहै.
समाधान-उस कालमें उसका अगम्यागमनादिजन्य सुखमें अधिक राग होता है
उससे उसकी अगम्यागमनादिमें नरकसाधनताबुद्धिका तिरोधान होजाता है अर्थात्
अगम्यागमनादिजन्य सुखमें उत्कट प्रेमके होनेसे अगम्यागमनादिजन्य नरकमें प्रबल
द्वेष उत्पन्न नहीं होता.
वृष्ट्यादौ तु कृतिसाध्यताज्ञानाभावान्न चिकीर्षाप्रवृत्ती, किन्त्वि-
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. २९९
ष्टसाधनताज्ञानादिच्छामात्रं कृतिश्च प्रवृत्तिरूपा बोध्या । तेन
जीवनयोनियतसाध्ये प्राणपञ्चकसञ्चारे न प्रवृत्तिः । इत्थंच प्रव-
र्त्तकत्वानुरोधाद्विधेरपीष्टसाधनतादिकमेवार्थः ।
भाषा-एवं वृष्टिआदि असाध्य कार्योंमें पुरुषको स्वकृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान
नहीं होता; इसलिये वृष्टिमें पुरुषकी चिकीर्षा तथा प्रवृत्ति नहीं होती किंतु केवल इष्ट-
साधनत्वप्रकारक ज्ञानसे "वृष्टिर्भवेत्" इत्याकारक इच्छा मात्र होती है। "कृतिसा-
ध्यताज्ञानं प्रवर्त्तकं" इस कथनमें 'कृति' पदसे प्रवृत्तिरूप कृतिका ग्रहण है; इस-
लिये पुरुषके जीवनका कारणीभूत जो विलक्षण प्रयत्न उस प्रयत्नसाध्य प्राणापानादि
प्राणपञ्चक संचारमें पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं है। (इत्थञ्च) इस पूर्वोक्त विचारसे प्रवृत्तिके
प्रति इष्टसाधनत्वादि ज्ञानको हेतुता सिद्ध हुई तो 'यजेत' इत्यादि विधिवाक्यभी
पुरुषकी प्रवृत्तिके बोधक हैं अर्थात् प्रवर्त्तकत्वानुरोधसे विधिवाक्योंकाभी बलवद्
अनिष्टाननुबन्धीष्टसाधनत्वविशिष्ट कृतिसाध्यत्वरूपही अर्थ मानना उचित है।
इत्थं च 'विश्वजिता यजेत' त्यादौ यत्र फलं न श्रूयते तत्रापि
स्वर्गः फलं कल्प्यते ।
भाषा--(इत्थञ्च) इस रीतिसे 'यजेत' इत्यादि विधिवाक्योंका इष्टसाधनत्वादि-
रूप अर्थ माना तो "विश्वजिता यजेत" इत्यादि जिन वाक्योंमें फलविशेषका श्रवण
नहींहै उन सबमें स्वर्गरूप फलकी कल्पना होसकतीहै.
नन्वहरहः सन्ध्यामुपासीतेत्यादाविष्टानुत्पत्तेः प्रवृत्तिः कथम्, न
चार्थवादिकं ब्रह्मलोकादि प्रत्यवायाभावो वा फलमिति वाच्यम्।
तथा सति काम्यत्वे नित्यत्वहान्यापत्तेः, कामनाभावेऽकरणापत्ते
श्च । इत्थंच यत्र फलश्रुतिस्तत्रार्थवादमात्रमिति चेत् । न ।
शंका-"अहरहः सन्ध्यामुपासीत-अर्थात् द्विजातिपुरुष प्रतिदिन सन्ध्योपासन
करे" इत्यादि विधिवाक्यबोधित सन्ध्यावन्दनादिसे कोई फलविशेष नहींहै; इसलिये
ऐसे स्थलमें इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान प्रवर्त्तक नहीं है और ना ऐसे स्थलमें विधिवा-
क्यका इष्टसाधनत्वादि अर्थ माननाही उचित है; क्योंकि कोई इष्ट उत्पन्न नहीं होता
तौ फिर प्रवृत्ति कैसे होतीहै? यदि कहो कि "सन्ध्यामुपासते ये तु सततं शंसित-
व्रताः॥ विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोकं सनातनम् " इत्यादि अर्थवादशास्त्रबोधित
ब्रह्मलोकादि अथवा (प्रत्यवाय) पापोंका विनाश होना सन्ध्यादि नित्यकर्मका फल
है तो इसको नित्यकर्म नहीं कहना चाहिये किन्तु काम्यकर्म कहना चाहिये और
३०० -न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
जब पुरुषको ब्रह्मलोक गमनकी या पापनिवारणकी कामना न होय तो पुरुषको यह
सन्ध्यावन्दनादि कर्म करनाभी नहीं चाहिये ( इत्यञ्च ) इस रीतिसे जहां नित्यकर्म-
का अर्थवादादिवाक्योंसे फलश्रवण है वहां अर्थवादवाक्यका केवल नित्यकर्मकी
प्रशंसा में तात्पर्य कल्पना करनाही उचित है. एवं सन्ध्यावन्दनादिकरणमें पुरुषकी
कैसे प्रवृत्ति है ?
ग्रहणश्राद्धादौ नित्यत्वनैमित्तिकत्वयोरिव ( भरणीश्राद्धे काम्य-
त्वनैमित्तिकत्वयोरिव, ) नित्यत्वकाम्यत्वयोरप्यविरोधात् ।
समाधान-ग्रहणकालिक श्राद्धादिकर्ममें जैसे मीमांसक लोगोंने नित्यत्व तथा
नैमित्तिकत्व उभय धर्म मानेंहैं अर्थात् ग्रहणकालिक श्राद्धादि कर्मको जैसे नित्यकर्मभी
मानाहै और नैमित्तिकभी मानाहै एवं भरणीनक्षत्रकालिक श्राद्धको जैसे काम्यकर्म
मानाहै और नैमित्तिकभी मानाहै वैसेही संध्यावन्दनादिकोभी नित्यकर्म मानके
काम्यकर्मभी मानलिया जाय तो नित्यत्व तथा काम्यत्वरूप धर्मद्वयका परस्पर
विरोध नहीं है.
न च कामनाभावेऽकरणापत्तिः । त्रिकालस्तवपाठादाविव
कामनासद्भावस्यैव कल्पनात् ।
शंका-यदि पुरुषको कुछ कामना न होय तो सन्ध्यादि नित्यकर्म नहींभी
करने चाहिये. समाधान-त्रिकाल स्तुतिपाठादिकी तरह सन्ध्यावन्दनादिमेंभी
कामनासद्भाव रहताही है अर्थात् जैसे विष्णुसहस्रनामस्तोत्रादि पाठ विधिविहित काम्य
कर्म नहींभी है तौभी फलकामनासे पुरुषोंकी स्तोत्रपाठोंमें प्रवृत्ति होती है वैसेही
सन्ध्यावन्दनादि कर्म्मस्थलमेंभी फलकामना अवश्य रहतीही है.
ननु वेदबोधितकार्यताज्ञानात्प्रवृत्तिः सम्भवतीति चेत् । न ।
१ यहां यह भाव है कि-नित्यश्राद्ध अग्निष्वात्ताआदि षड्दैवत होताहै और ग्रहणादि नैमि-
त्तिकभी पूर्वोक्त षड्दैवतही होताहै. एवं ग्रहणादिविशेषकालमें एकरूपसे श्राद्धरूप कर्मद्वयकी
प्राप्ति हुई तो “नित्यश्राद्धं न कुर्वीत प्रसङ्गाद्यत्र सिद्ध्यति ॥ श्राद्धान्तरे कृतेऽन्यत्र नित्यत्वासन्न
हापयेत्” ॥१॥ इस मात्स्यवचनसे नित्यत्व तथा नैमित्तिकत्वरूप धर्मद्वयका समावेश एकही
क्रियामें जैसे प्राप्त होताहै ॥ ॥ एवं “ भरणी पितृपक्षे तु महती परिकीर्तिता ॥ अस्यां श्राद्धं
कृतं येन स गयाश्राद्धकृद्भवेत् ”॥ १ ॥ इस मात्स्यवचनसे भरणीश्राद्धमें नैमित्तिकत्व धर्म
तो स्पष्टही है परन्तु गयाश्राद्धवत् कथनसे उसीमें काम्यत्वधर्मका समावेशभी हुआ; क्योंकि
गयाश्राद्धकरनेवालेको “ उद्धरेत्सप्त गोत्राणि कुलमेकोत्तरं शतम् ” इस वचनसे एकोत्तरशत
कुलोंका उद्धारक लिखा है वैसेही संध्यावन्दनादि कर्मोंमेंभी नित्यत्व तथा काम्यत्वरूप धर्मद्व-
यका समावेश विरुद्ध नहीं है.
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३०१
स्वेष्टसाधनत्वमविज्ञाय तादृशकार्यताज्ञानसहस्रेणापि प्रवृत्ते-
रसम्भवात् ।
शंका-वेदप्रतिपादित कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानसेही सन्ध्यावन्दनादिमें पुरु-
षकी प्रवृत्ति मान लीजाय तो दोष क्या है ? समाधान-पुरुषको जबतक स्वेष्ट-
साधनत्वप्रकारक ज्ञान न होय तबतक कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान सहस्त्रके होनेसेभी
प्रवृत्तिका होना असम्भव है.
यदपि पण्डापूर्व फलमिति, तदपि न । कामनाभावेऽकरण-
तापत्तेस्तौल्यात् । कामनाकल्पने त्वार्थवादिकफलमेव रात्रि-
सत्रन्यायात् कल्प्यताम्, अन्यथा प्रवृत्त्यनुपपत्तेः । तेनानुत्प-
त्तिमेवान्ये प्रत्यवायस्य मन्वते ।
प्रभाकरशंका-सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्मोंका ( पण्डापूर्व ) फलविशेषानाधा-
यक अपूर्वही फलरूपेण मानलिया जाय तो दोष क्या है? समाधान-पण्डापूर्वरूप
फलकी कामना जिसको न होगी उसको सन्ध्यावन्दनादि नहीं करने चाहिये. यह
दोष आपकोभी हमारे तुल्यही हुआ और यदि पण्डापूर्वकी कामना कल्पना करो
तो इससे तो रात्रिसत्रन्यायसे अर्थवादवाक्यप्रतिपादित फलकी कल्पना करनीही
उचित है, अर्थात् जैसे रात्रिसत्ररूप कर्मका कोई फल विशेष श्रवण नहीं और उस
प्रकरणमें अत्यन्त अश्रुत स्वर्गरूप फलकी कल्पना करनेमेंभी गौरव है इसलिये उसी
कर्मके प्रशंसक “ प्रतितिष्ठन्ति इह वा ये ” इत्यादि अर्थवादवाक्यसे “ रात्रिसत्ररूप
कर्मकर्ता पुरुषको इसी लोकमें प्रतिष्ठा होतीहै ” इत्याकारक फलकी कल्पना मीमां-
सकोंने करी है वैसेही सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्म्मकाभी ‘ सन्ध्यामुपासते ये तु ’
इत्यादि अर्थवादबोधित ब्रह्मलोकादिप्राप्तिरूप फलही कल्पना करना उचित है
अन्यथा सन्ध्यावन्दनादि करनेमें पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं हुई चाहिये. यह दोष तादव-
स्थ्य रहेगा अर्थवादिक फल कल्पनेमें लाघव है (तेन) इसीलिये कईलोग (प्रत्यवाय)
पापोंका ना उत्पन्न होनाही सन्ध्यावन्दनादिका फल मानतेहैं.
एवं “सन्ध्यामुपासते येतु सततं शंसितव्रताः ॥ विधूतपापास्ते
यान्ति ब्रह्मलोकमनामयम्” । एवं “दद्यादहरहः श्राद्धं पितृभ्यः
प्रीतिमावहन्” इत्यादिकमेव फलमस्तु ।
भाषा-एवं “प्रशंसितव्रतवाले पुरुष जो प्रतिदिन सन्ध्या उपासन करते हैं वे
विगतपाप कर सुखरूप ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं” इत्याद अर्थवादबोधक वाक्यों-
३०२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
सेभी सन्ध्यावन्दनादिका फल प्रतीत होताहै. एवं “ पितृगण हमारे पर प्रेम रक्खें
इस मनोरथसे पुरुष पितृगणके उद्देश्यसे प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक दान किया करे ”
इत्यादिअर्थकवचनबोधित पितृप्रीतिरूपही पितृश्राद्धादि नित्यकर्मका फल है.
न च पितृप्रीतिः कथं फलं व्यधिकरणत्वादिति वाच्यम् । गया-
श्राद्धादाविवोद्देश्यत्वसम्बन्धेनैव फलजनकत्वस्य क्वचित्कल्प-
नात् अतएवोक्तं शास्त्रदर्शितफलमनुष्ठानकर्तरीत्युत्सर्ग इति ।
शंका-क्रियाका फल नियमसे क्रियाके कर्ताहीको हुआ करता है.एवं पितृश्राद्ध-
का पितृप्रेमहीरूप फल नहीं बन सकता क्योंकि क्रियाके साथ उसका सामानाधिकरण
नहीं है अर्थात् श्राद्धक्रियाका कर्ता चैत्र और प्रीतिरूप फल उसके पितृगणमें मानना
अनुभवविरुद्ध है. समाधान-गयाश्राद्धकी तरह कई स्थलोंमें उद्देश्यतासम्बन्धसेभी
फलकी कल्पना होसकती है इसलिये “ शास्त्रबोधित क्रियाका फल अनुष्ठानकर्ताहीको
होताहै ” इस प्रवादको मीमांसक लोगोंने ( उत्सर्ग ) प्रायो वाद माना है अर्थात्
अनुष्ठानकर्ताको तो होताही है, परन्तु जहां जिसके उद्देशसे क्रिया करी जावे वहां
उसकोभी फल अवश्य होताहै.
पितॄणां मुक्तत्वे तु स्वस्य स्वर्गफलम्,यावन्नित्यनैमित्तिकानुष्ठा-
नस्य सामान्यतः स्वर्गफलकल्पनात् । पण्डापूर्वार्थं प्रवृत्तिश्च न
सम्भवति । न हि तत्सुखदुःखाभाववत् स्वतः पुरुषार्थो न वा
तत्साधनं प्रत्यवायानुत्पत्तौ कथं प्रवृत्तिरिति चेत् ।
भाषा-और जिन पितृगणके निमित्त श्राद्धादिक्रिया करीहै यदि वे मुक्त होगए हों
तो उसक्रियाकाभी स्वर्गादिफल क्रियानुष्ठानकर्ताहीको होताहै,क्योंकि यावत् नित्यनै-
मित्तिकविहित अनुष्ठानको सामान्यरूपसे स्वर्गफलजनकता शास्त्रसिद्ध है और
फलविशेषानाधायक पण्डापूर्वके उद्देश्यसे तो पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं होसकती, क्योंकि
पुरुषकी प्रवृत्तिका उद्देश्य सुख है या दुःखाभाव है या इन दोनोंके साधन हैं और
पण्डापूर्व स्वयं सुखरूप नहीं है तथा दुःखाभावरूप नहीं है तथा इन दोनोंका साध-
नभी नहीं है.शंका-आपने पूर्वनित्यकर्मका फल प्रत्यवायाभाव माना है वह प्रत्यवा-
याभावभी पण्डापूर्वकी तरह स्वयं सुख नहीं, दुःखाभाव नहीं और इन दोनोंका साध-
नभी नहीं तो उसके उद्देश्यसे सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्ममें प्रवृत्तिका कैसे सम्भव
होसकताहै?
इत्थम् । यथा हि नित्ये कृते प्रत्यवायाभावस्तिष्ठति तदभावे
तदभावः । एवं प्रत्यवायाभावस्य सत्त्वे दुःखप्रागभावसत्त्वं तद-
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३०३
भावे तद्भाव इति योगक्षेमसाधारणकारणताया दुःखप्रागभावं
प्रत्यपि सुवचत्वात् । एवमेव प्रायश्चित्तस्यापि दुःखप्रागभाव-
हेतुत्वमिति ।
समाधान-( इत्थम् ) जैसे सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्म करनेवाले पुरुषमें
प्रत्यवायका अभाव रहता है और न करनेवालेमें (तद्भाव) अर्थात् प्रत्यवायाभावका
अभाव प्रत्यवाय रहेगा वैसेही प्रत्यवायाभावकी दुःखप्रागभावके साथ व्याप्ति है अर्थात्
नित्यकर्मद्वारा जिस पुरुषमें प्रत्यवायाभाव रहेगा उसीमें दुःखप्रागभावभी रहेगा और
जिसमें प्रत्यवायाभाव नहीं रहेगा उसमें (तद्भाव) अर्थात् दुःखप्रागभावभी नहीं रहेगा
किन्तु दुःखप्रागभावाभाव अर्थात् दुःखी रहेगा इस रीतिसे योगक्षेम साधारण प्रवृ-
त्तिकारणता दुःखप्रागभावमेंभी बनसकती है एवं प्रायश्चित्तकर्मकोभी योगक्षेम साधार-
णही दुःखप्रागभाव हेतुता है अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक कर्म करणप्रवृत्तिमें उद्देश्य
विधया दुःखप्रागभावही कारण है.
ननु न कलञ्जं भक्षयेदित्यत्र विध्यर्थे कथं नञर्थान्वयः, इष्टसाध-
नत्वाभावस्य कृतिसाध्यत्वाभावस्य च बोधयितुमशक्यत्वाद्वि-
ति चेत् । न ।
शंका—“ न कलञ्जं भक्षयेत् ” इत्यादि विधिवाक्योंमें विध्यर्थ नञर्थका परस्पर
कैसे अन्वय होताहै? क्योंकि आपने पूर्व इष्टसाधनत्वादि विध्यर्थ मानाहै और नञ्का
अभावरूप अर्थ स्पष्टही है. एवं विध्यर्थके साथ यदि नञर्थका अन्वय होय तो “ न
कलञ्जं” इत्यादि वाक्यसे 'कलञ्जभक्षणं पुरुषेष्टसाधनत्वाभाववत् कृतिसाध्यात्वाभावञ्च'
यही बोध होगा सो इसका होना सम्भव नहीं क्योंकि ' कलञ्ज ' नाम शुष्कमांस
विशेषका है उसके भक्षणमें “ कलञ्जभक्षणमिष्टसाधनत्वाभाववत्कृतिसाध्यत्वाभाव-
वच्च ” इत्याकारक बोध बाधित है किन्तु पुरुषको साधारणरूपेण उभयप्रकारक
बोधकलञ्ज भक्षणमें रहताही है इसलिये विध्यर्थके साथ अन्वित हुआ नञर्थ इष्टसाध-
नत्वाभावके तथा कृतिसाध्यत्वाभावके बोधनमें समर्थ नहीं होसकता.
१ अप्राप्तकी प्राप्तिका नाम 'योग' है और प्राप्तके संरक्षणका नाम ' क्षेम ' है. प्रत्यवाया-
भाव स्वतः पुरुषार्थ नहीं,पुरुषार्थसाधनभी नहीं; इसलिये उसमें प्रवृत्तिकारणता प्राप्त न थी परन्तु
दुःखप्रागभावके साथ उसकी व्याप्ति बनाकर उसमें युक्तिसे प्रवृत्तिकारणता प्राप्त करी यही
'योग' है.एवं इष्टसाधनताज्ञानको प्रवृत्तिकारणता सिद्धही थी परन्तु प्रभाकरके कुतर्क जालोंकों
निरासकर उसका संरक्षण किया यही ' क्षेम ' है, इस रीतिसे योगक्षेम साधारण सिद्ध हुई
प्रवृत्तिकारणता दुःखप्रागभावमेंभी सुवच बनसकती है.
| ३०४ | न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- | [ गुण- |
|---|
तत्र बाधादिष्टसाधनत्वं कृतिसाध्यत्वं च न विध्यर्थः, किंतु बल-
वदनिष्टाननुबन्धित्वमात्रं तदभावश्च नञा बोध्यते । अथवा बल-
वदनिष्टाननुबन्धित्वविशिष्टेष्टसाधनत्वे सति कृतिसाध्यत्वं विध्य-
र्थः तदभावश्च नञा बोध्यमानो विशिष्टाभावो विशेष्यवति विशे-
षणाभावे विश्राम्यति ।
समाधान—ऐसे स्थलमें यह अर्थ बाधित है इसलिये ऐसे स्थलमें इष्टसाधनत्व
या कृतिसाध्यत्व विध्यर्थ नहीं है किन्तु ऐसे स्थलमें केवल बलवदनिष्टाननुबन्धित्व
मात्रही विध्यर्थ है उस बलवदनिष्टाननुबन्धित्वका अभाव नञसे बोधित होताहै. भाव
यह कि—इष्टसाधनत्व कृतिसाध्यत्व तथा बलवदनिष्टाननुबन्धित्व इस भेदसे विध्यर्थके
तीन अंश है उनमें विधिद्वारा किसीस्थलमें किसी अंशका बोध होताहै और किसी
स्थलमें किसीका, एवं जहां जिस अंशका
यजेत ' इस विधिवाक्यमें ' श्येन ' नाम कर्मविशेषका है. 'अभिचरन्' नाम शत्रुमर-
णकी कामना करतेहुएका है. समुदितार्थ यह हुआ कि-शत्रुमरणकी कामना करता
हुआ श्येननामक कर्मसे यजन करे, एवं ऐसे स्थलमें विध्यर्थका बलवदनिष्टाननुबन्धि-
त्वरूप विशेषण नहीं है; क्योंकि ' श्येन' नामक कर्मको शत्रुमारणानुकूल व्यापारात्मक
होनेसे हिंसारूपता है और हिंसा नरकका साधन होती है और यदि कहो कि विधिविहित
हिंसा दोषकर नहीं होती क्योंकि हिंसाका निषेधक “ माहिंस्यात् सर्वाभूतानि ” यह
सामान्य वाक्य है. इसलिये विशेषविधिवाक्यविहित यज्ञीय हिंसाको छोड़कर प्रवृत्त
होता है तो यह कथनभी युक्त नहीं क्योंकि “ अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छ्रैर्व्य-
पोहति ” इत्यादिशास्त्रसे ( अभिचार ) मारणादिक्रियाके प्रायश्चित्तका उपदेश है.
अर्थात् यदि यह क्रिया पापजनका न होय तो इसके उद्देश्यसे प्रायश्चित्तका विधानभी
नहीं हुआ चाहिये और यदि कहो कि साक्षात् परम्परासाधारण मारणानुकूलव्यापार
मात्रका नाम यदि ' हिंसा ' होये तो (खङ्ग) तलवार बनानेवालेको तथा कूप लगवा
नेवालेकोभी हिंसाका दोष लगना चाहिये; क्योंकि तलवारसेभी परम्परा कई जीव
मारे जातेंहैं और कूपमेंभी कई जीव मरजातेहैं. एवं यदि कोई भोजनकरणकालमें
गलेमें अन्न रुक जानेसे मरजाय तो उसको आत्महत्याका पाप लगना चाहिये; इस-
लिये साक्षात् परम्परासाधारण मारणानुकूल व्यापारमात्रका नाम 'हिंसा' नहीं, किन्तु
केवल साक्षात् मारणानुकूलव्यापारका नाम'हिंसा' है और श्येनकर्म साक्षात् मारणा-
नुकूलव्यापार नहीं है इसलिये “ मा हिंस्यात् ” इत्यादि निषेधका अविषय होनेसे
बलवदनिष्टका अननुबन्धि है तो यह कथनभी युक्त नहीं; क्योंकि मरणोद्देश्यकत्वरूप
धर्मकोभी क्रियाकी विशेषणता है अर्थात् शत्रुमरणोद्देशेन विधान किया ' श्येन ' नामक
कर्म हिंसारूपही है और यदि कहो कि मरणोद्देश्यका क्रियही यदि हिंसारूप
होय तो जहां मृगादिके उद्देशसे बाण चलाया लगा ब्राह्मणको तो उसके मरनेका
प्रायश्चित नहीं हुआ चाहिये क्योंकि ऐसे स्थलमें ब्राह्मणहिंसारूप क्रियामें ब्राह्मणेद्दे-
श्यकत्वधर्म नहीं है तो यह कथनभी युक्त नहीं क्योंकि ऐसे स्थलमें अज्ञानकृत ब्राह्म-
णवधका तत्तद् वचनविशेषोंद्वारा प्रायश्चित्त ऋषिलोगोंने विधान किया है और ज्ञान-
कृत ब्राह्मणवधका तो “ कामतो ब्राह्मणवधे निष्कृतिर्न विधीयते ” इत्यादि मनुवा-
क्यसे प्रायश्चित्तही नहींहै. भाव यह कि-मरणोद्देश्यकत्वरूप विशेषण हिंसारूपा क्रिया-
में देना व्यर्थ नहीं है.
श्येनवारणायादृष्टाद्वारकत्वेन विशेषणात् । अतएव काशीम-
रणार्थं कृतशिवपूजादेरपि न च हिंसात्वम् ।
१ शिरः कपाली ध्वजवान् भिक्षाशी कर्म वेदयन् ॥ ब्रह्महा द्वादशाब्दानि मितभुक् शुद्धिमा-
प्नुयात् ॥ २४३ ॥ इति याज्ञवल्क्यः ।
३०६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
समाधान-‘श्येन’ नामक कर्ममें हिंसात्वधर्मके वारणार्थ हम अदृष्टाद्वारकत्वेन
विशेषण देतेहैं अर्थात् ‘अदृष्टाद्वारकं यद्वैरिमरणानुकूलं कर्म तद्हिंसा’ और श्येनकर्म
तो अदृष्टद्वारा शत्रुनाशक है, इसलिये हिंसा नहीं है अदृष्टाद्वारक शत्रुमरणानुकूल
क्रियाहीका नाम हिंसा है. (अतएव) इसीलिये जिस पुरुषने काशीमरणके उद्देश्यसे
शंकरार्चनादि क्रिया करीहै उस क्रियाकोभी हिंसात्व नहींहै.
न च साक्षान्मरणजनकस्यैव हि हिंसात्वं श्येनस्तु न तथा किंतु
तज्जन्यापूर्वमिति वाच्यम्। खड्गाघातेन ब्राह्मणे व्रणपाकपरम्प-
रया मृते हिंसात्वानापत्तेः।
शंका-अदृष्टाद्वारक मरणजनकत्वकी अपेक्षा साक्षात् मरणजनकत्वरूप
क्रियामें विशेषण देनेमें लाघव है अर्थात् साक्षात् मरणजनिका क्रियाका
नाम ‘हिंसा’ है. ऐसे कथनसे शंकरार्चनादि क्रियाका तथा श्येनादिक्रियाकाभी वारण
होसकता है क्योंकि श्येन शंकरार्चनादि क्रिया साक्षात् मरणजनिका नहीं है किन्तु
स्वजन्य अदृष्टद्वारा है. समाधान-साक्षात् मरणजनिका क्रियाका नाम ‘हिंसा’ नहीं
कहसकते, क्योंकि यदि ऐसा होय तो जहां प्रथम अल्प खड्गपरिहारसे ब्राह्मणको
व्रण हुआहै पीछे उसी व्रणपाकद्वारा उस ब्राह्मणका मरण हुआ. वहां वह मरणरूपा
क्रिया हिंसात्मिका नहीं हुई चाहिये; परन्तु उस क्रियाका हिंसात्मक होना अनुभव
सिद्ध है, इसलिये ऐसी हिंसाके संग्रहार्थ तथा श्येनादि क्रियाके वारणार्थ अदृष्टाद्वारक
मरणजनिका क्रियाहीका नाम ‘हिंसा’ कहना उचित है.
केचित्तु श्येनस्य हिंसा फलं न तु मरणम्, तेन श्येनजन्यखड्गाघा-
तादिरूपा हिंसाऽभिचारपदार्थस्तस्य च पापजनकत्वमतः श्येन-
स्य वैधत्वात् पापाजनकत्वेऽप्यग्रिमपापं प्रतिसन्धाय सन्तो न
प्रवर्तन्त इत्याहुः।
भाषा-और कई एक विद्वान् लोग तो यह कहतेहैं कि-‘श्येन’ नामक कर्मका
साक्षात् शत्रुमरणफलक व्यापारही फल है अर्थात् श्येनकर्म अपने कर्ताके शत्रुपर
खड्गाघातादि करवा देताहै. एवं खड्गाघातादि मात्र श्येनक्रियाका फल है किन्तु
शत्रुमरणरूप फल नहीं है. इसलिये श्येनक्रियाजन्य खड्गाघातादिरूपा हिंसाहीका
नाम ‘अभिचार’ है और उसी खड्गाघातादिरूप अभिचार पदार्थको पापजनकता है
अर्थात् श्येनक्रियाको साक्षात् पापजनकता नहींहै. एवं श्येनक्रियाको विधिविहित
होनेसे यद्यपि साक्षात् पापजनकता नहींहै तथापि परम्परा उत्पन्न होनेवाले
भाविपापको चिन्तन कर सत्पुरुष श्येनादिक्रिया करनेमेंभी प्रवृत्त नहीं होते.
परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३०७
आचार्यास्तु आप्ताभिप्रायो विध्यर्थः'पाकं कुर्याः' इत्यादावाज्ञा-
दिरूपेच्छावाचित्ववल्लिङ्मात्रस्येच्छावाचित्वं लाघवात् । एवं
च 'स्वर्गकामो यजेत'इत्यादौ यागः स्वर्गकामकृतिसाध्यतया-
ऽऽप्तेष्ट इत्यर्थः।
भाषा-आर उदयनाचार्य तो आप्तवक्ताके अभिप्रायको विध्यर्थ मानतेहैं; जैसे
"पाकं कुर्याः" इत्यादि वाक्यमें लिङ्को आज्ञादिरूप इच्छावाचकत्व है, वैसेही
लाघवसे सर्वत्र लिङ्मात्रको इच्छावाचकत्व है. एवं " स्वर्गकामो यजेत " इत्यादि
स्थलमें याग स्वर्गकी कामनावाले पुरुषकी कृतिसाध्यतारूपेण आप्तवक्ताकी इच्छाका
विषय है ऐसा वाक्यार्थबोध होता है.
ततश्चाप्तेष्टत्वेनेष्टसाधनत्वादिकमनुमाय प्रवर्तते । कलञ्जभक्ष-
णादौ तदभावान्न प्रवर्तते ।
भाषा-( ततश्च ) उस बोधानन्तर अधिकारी पुरुषकी आप्त इच्छा विषयत्वरूप
हेतुसे स्वेष्टसाधनताके अनुमानद्वारा यागादि क्रियामें प्रवृत्ति होती है अर्थात् विधि-
वाक्यार्थबोधसे पीछे अधिकारी पुरुष "यागो मम स्वर्गकामस्य बलवदनिष्टाननुबन्धीष्ट-
साधनं मत्कृतिसाध्यतया आप्तेनेष्यमाणत्वात् मन्मात्रकृतिसाध्यतयेष्यमाणमद्भोज-
नवत् " इत्याकारक अनुमानद्वारा यागादिक्रियामें प्रवृत्त होताहै.एवं कलञ्जादिके
भक्षणमें अधिकारी पुरुषको आप्त इष्टत्वाभावप्रयुक्त स्वेष्टसाधनत्वज्ञानकाभी अभाव है
अर्थात् ऐसे स्थलमें ' नञ् ' से निषिध्यमाण आप्ताभिप्रायरूप विध्यर्थ अधिकारीको
स्वेष्टसाधनताका अनुमापकभी नहीं होता.
यस्तु वेदे पौरुषेयत्वं नाभ्युपैति तं प्रति विधिरैव तावद्दर्भ इव
श्रुतिकुमार्याः पुंयोगे मानम् ।
शंका-वेदगत लिङादिद्वारा किसकी इच्छाका बोध होगा ? क्योंकि वह अपौ-
रुषेय वाक्य है,उसका आद्यवक्ता कोई नहीं है.समाधान-जो पुरुष वेदको पौरुषेय
अर्थात् पुरुषप्रणीत नहीं मानता है"तंमति तावत्कुमार्य्याः पुंयोगे गर्भ इव श्रुतिकुमार्य्या
पुंयोगे विधिरेव मानम्-अर्थात् जैसे कुमारीकन्याको गर्भवती देखकर उसके पुरुषसंसर्गका
अनुमान होता है वैसेही वेदवचनोंको विधिगर्भित देखकर पुरुषसंसर्गका अनुमान है.
भाव यह कि-वक्तासे भिन्न इच्छाके बोधनमें विधिका सामर्थ्यही नहीं है इसलिये
विधिवाक्यही वेदोच्चारक ईश्वरमें प्रमाणरूप है.