न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
काम्यमभिलाषाविषयः । धर्मेनेति । धर्मत्वेन सुखत्वेन कार्यकार-
रणभाव इत्यर्थः ।
भाषा-सबकी अभिलाषाके विषय होना मूलगत ' काम्य ' शब्दका अर्थ है.
एवं धर्मत्वेन धर्मका तथा सुखत्वेन सुखका परस्पर कार्यकारण भाव है अर्थात् सर्वत्र
धर्मकारण है तो सुखरूप कार्य है, अन्यथा नहीं.
दुःखं निरूपयति, अधर्मेति-
भाषा-एवं ' अधर्म ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार दुःखका निरूपण करते हैं-
अधर्मजन्यं दुःखं स्यात्प्रतिकूलं सचेतसाम्॥ १४५॥
भाषा-यावत् प्राणियोंको प्रतिकूल वेदनीय अर्थात् सबकी द्वेषके विषयका नाम
' दुःख ' है और अधर्मसे वह उत्पन्न होता है ॥ १४५ ॥
अधर्मत्वेन दुःखत्वेन कार्यकारणभाव इत्यर्थः । प्रतिकूलमिति ।
दुःखत्वज्ञानादेव सर्वेषां स्वाभाविकद्वेषविषय इत्यर्थः ॥१४५॥
भाषा-अधर्मत्वेन अधर्मका तथा दुःखत्वेन दुःखका परस्पर कार्यकारण भाव है
अर्थात् अधर्म कारण है तथा दुःखकार्य है. दुःखत्वेन रूपेण ज्ञात हुआही वह सम्पूर्ण
जीवोंके स्वाभाविक द्वेषका विषय होता है ॥ १४५ ॥
इच्छां निरूपयति, निर्दुःखत्व इति-
भाषा-एवं ' निर्दुःख' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार इच्छाका निरूपण करते हैं-
निर्दुःखत्वे सुखे चेच्छा तज्ज्ञानादेव जायते ।
इच्छा तु तदुपाये स्यादिष्टोपायत्वधीर्यदि ॥१४६॥
भाषा-दुःखाभावमें तथा सुखमें जीवकी इच्छा होती है, इन दोनोंके ज्ञानसे इच्छा-
की उत्पत्ति होती है; इन दोनोंके उपायमें यदि जीवको इष्टसाधनत्व प्रकारक ज्ञान
होय तो उपायविषयीणी इच्छाभी होती है ॥ १४६ ॥
इच्छा द्विविधा फलविषयीणी, उपायविषयीणी च । फलं तु सुखं
दुःखाभावश्च । तत्र फलेच्छां प्रति फलज्ञानं कारणम् । अत एव
स्वतः पुरुषार्थः सम्भवति, यज्ज्ञातं सत्स्ववृत्तितयेष्यते स पुरु-
षार्थ इति तल्लक्षणात् । इतरेच्छानधीनेच्छाविषयत्वं फलितो
ऽर्थः । उपायेच्छां प्रतीष्टसाधनताज्ञानं कारणम् ॥ १४६ ॥