न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-प्रबल द्वेषविषयक दुःखादिसाधनताक “इदं मद्दुःखसाधनम्” इत्याकारक
ज्ञान ( तत्र ) उक्त चिकीर्षामें प्रतिबन्धक है, इसलिये विषमिश्रित ( मधु ) शहदादि
अन्न भोजनमें पुरुषकी चिकीर्षा नहीं होती. यहां ( अन्ये ) और कई एक विद्वान्
लोग लाघवसे केवल प्रबल द्वेषहीको उक्तचिकीर्षाका प्रतिबन्धक मानते हैं.
तदहेतुत्वबुद्धेस्तु हेतुत्वं कस्य चिन्मते ॥ १४८ ॥
भाषा-किसी एक विद्वान्के सिद्धान्तमें ( तत् ) बलवदनिष्टके अजनक विषयक
ज्ञानको उक्त चिकीर्षाके प्रति कारणता है ॥ १४८ ॥
तदहेतुत्वेति । बलवदनिष्टाजनकत्वज्ञानं कारणमित्यर्थः। कृति-
साध्यताज्ञानादिमतो बलवदनिष्टसाधनताज्ञानशून्यस्य बलवद्-
निष्टाजनकत्वज्ञानं विनापि चिकीर्षायां विलम्बाभावात्कस्य-
चिन्मत इत्यस्वरसो दर्शितः ॥ १४८ ॥
भाषा-अर्थात् कोई एक विद्वान् ‘ इदं मद्बलवदनिष्टाजनकम् ” इत्याकारक
बलवदनिष्टाजनकत्वप्रकारक ज्ञानको उक्त चिकीर्षामें कारणता मानता है; सो
ठीक नहीं;क्योंकि पुरुषको जिस किसीएक पदार्थमें बलवदनिष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान
नहींहै और कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान है,उसको बलवदनिष्टाजनकत्वप्रकारक ज्ञानसे
विनाभी अर्थात् “ इदं मद्बलवदनिष्टाजनकम् ” इत्याकारक ज्ञान नाभी होय
तो चिकीर्षा होसकती है. यही ( कस्यचित् )किसी के मतमें कार्यकारणभावका व्य-
तिरेक व्यभिचाररूप अस्वरस है ॥ १४८ ॥
द्वेषं निरूपयति, द्विष्टसाधनतेति-
भाषा-एवं 'द्विष्टसाधनता' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार द्वेषका निरूपण करतेहैं-
द्विष्टसाधनताबुद्धिर्भवेद्द्वेषस्य कारणम् ।
भाषा-( द्विष्ट ) द्वेषके विषय दुःखादि साधनविषयक ज्ञान द्वेषका निमित्त
कारण है.
दुःखोपायविषयकं द्वेषं प्रति बलवद्विष्टसाधनताज्ञानं कारणमित्य-
र्थः । बलवदिष्टसाधनताज्ञानं च प्रतिबन्धकं तेन नान्तरीयकदुः-
खजनके पाकादौ न द्वेषः ।
अर्थात् दुःखके उपायविषयक द्वेषके प्रति ( द्विष्ट ) दुःखके उपायविषयक
ज्ञानको कारणता है. उसी पदार्थमें यदि प्रबल इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञानभी होय तो
वह उक्त द्वेषका प्रतिबन्धक होताहै. भाव यह कि-यद्यपि पाकनिर्माणकालमें पुरु