न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ गुण-
भाषा-( इह ) न्यायसिद्धान्तमें अर्थापत्ति पृथक् प्रमाण नहीं है, क्योंकि
व्यतिरेकव्याप्तिज्ञानहीमें इसकी गतार्थता होसकतीहै ॥ १४४ ॥
अर्थापत्तेस्त्विति । अर्थापत्तिं प्रमाणान्तरं मन्यन्ते केचन ।
तथाहि यत्र देवदत्तस्य शतवर्षजीवित्वं ज्योतिःशास्त्रादवगतं
जीविनो गृहासत्त्वं च प्रत्यक्षादवगतं तत्र शतवर्षजीवित्वान्यथा-
नुपपत्त्या बहिः सत्त्वं कल्प्यते । तदनुमानेन गतार्थत्वान्नेष्यते ।
भाषा-कुमारलभट्ट तथा वेदान्तीलोग अर्थापत्तिको पृथक् प्रमाण मानतेहैं
( तथाहि ) जैसे जहां किसी देवदत्तादि पुरुषविशेषका शतवर्षतक जीना ज्योतिः
शास्त्रसे निश्चित किया अर्थात् उसकी जन्मपत्रिकाद्वारा जाना तो जीवतेहुए उसका
घरमें न होना प्रत्यक्षसे निश्चयहुआ तो ऐसे स्थलमें उसका शतवर्षतक जीवना
( अन्यथा ) प्रकारान्तरेण अनुपपन्न हुआ किसी बाह्यदेशमें उसके सत्त्वकी अर्थात्
होनेकी कल्पना करवाता है इस प्रकारकी अर्थापत्तकी प्रमाणान्तरताभी अनुमानहीमें
गतार्थ है इसलिये पृथक्प्रमाणता वांछित नहींहै.
तथाहि । यत्र जीवित्वस्य बहिःसत्त्वगृहसत्त्वान्यतरव्याप्यत्वं
गृहीतं तत्रान्यतरसिद्धौ जायमानायां गृहसत्त्वबाधाद्वहिःसत्त्वम-
नुमितौ भासते ।
भाषा-(तथाहि ) बहिर्देशमें होना या घरमें होना इन दोनोंमें किसी एकनिष्ठ
व्यापकतानिरूपित व्याप्यताका ग्रहण जहां देवदत्तके जीवनमें हुआहै अर्थात् जहां
“जीविनो जीवित्वं बहिःसत्त्वगृहसत्त्वान्यतरव्याप्यं” इत्याकारक ज्ञान हुआहै वहां
दोनोंमें एककोटिके साक्षात्कार हुए पश्चात् गृहसत्त्वका बाध होनेसे जीवी देवदत्तका
बाह्य सत्त्व “ देवदत्तो बहिःसत्त्ववान् जीवित्वे सति गृहाभावदर्शनात् ” इत्याकारक
अनुमितिमें प्रतीत होताहै.
एवं ‘पीनो देवदत्तो दिवा न भुंक्ते’ इत्यादौ पीनत्वस्य भोजन-
व्याप्यत्वावगमाद्भोजनसिद्धौ दिवाभोजनबाधे च रात्रिभोजनं
सिध्यति । अभावप्रत्यक्षस्यानुभविकत्वादनुपलम्भोऽपि न
प्रमाणन्तरम् ।
भाषा-एवं ( पीन ) 'स्थूल देवदत्त दिनमें भोजन नहीं करता' इत्यादि स्थलमें
पीनत्वधर्मकी भोजनके साथ “ यत्र यत्र पीनत्वं तत्र तत्र भोजनम् ” इत्याकारक
व्याप्ति अनेकवार गृहीत है इससे भोजनकी सिद्धि हुई तो दिनमें भोजन प्रत्यक्षसे