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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 350 में से

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पृष्ठ 325

परिच्छेदः ५ ] भाषाटीकासमेता. ३०१
स्वेष्टसाधनत्वमविज्ञाय तादृशकार्यताज्ञानसहस्रेणापि प्रवृत्ते-
रसम्भवात् ।
शंका-वेदप्रतिपादित कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञानसेही सन्ध्यावन्दनादिमें पुरु-
षकी प्रवृत्ति मान लीजाय तो दोष क्या है ? समाधान-पुरुषको जबतक स्वेष्ट-
साधनत्वप्रकारक ज्ञान न होय तबतक कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान सहस्त्रके होनेसेभी
प्रवृत्तिका होना असम्भव है.
यदपि पण्डापूर्व फलमिति, तदपि न । कामनाभावेऽकरण-
तापत्तेस्तौल्यात् । कामनाकल्पने त्वार्थवादिकफलमेव रात्रि-
सत्रन्यायात् कल्प्यताम्, अन्यथा प्रवृत्त्यनुपपत्तेः । तेनानुत्प-
त्तिमेवान्ये प्रत्यवायस्य मन्वते ।
प्रभाकरशंका-सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्मोंका ( पण्डापूर्व ) फलविशेषानाधा-
यक अपूर्वही फलरूपेण मानलिया जाय तो दोष क्या है? समाधान-पण्डापूर्वरूप
फलकी कामना जिसको न होगी उसको सन्ध्यावन्दनादि नहीं करने चाहिये. यह
दोष आपकोभी हमारे तुल्यही हुआ और यदि पण्डापूर्वकी कामना कल्पना करो
तो इससे तो रात्रिसत्रन्यायसे अर्थवादवाक्यप्रतिपादित फलकी कल्पना करनीही
उचित है, अर्थात् जैसे रात्रिसत्ररूप कर्मका कोई फल विशेष श्रवण नहीं और उस
प्रकरणमें अत्यन्त अश्रुत स्वर्गरूप फलकी कल्पना करनेमेंभी गौरव है इसलिये उसी
कर्मके प्रशंसक “ प्रतितिष्ठन्ति इह वा ये ” इत्यादि अर्थवादवाक्यसे “ रात्रिसत्ररूप
कर्मकर्ता पुरुषको इसी लोकमें प्रतिष्ठा होतीहै ” इत्याकारक फलकी कल्पना मीमां-
सकोंने करी है वैसेही सन्ध्यावन्दनादि नित्यकर्म्मकाभी ‘ सन्ध्यामुपासते ये तु ’
इत्यादि अर्थवादबोधित ब्रह्मलोकादिप्राप्तिरूप फलही कल्पना करना उचित है
अन्यथा सन्ध्यावन्दनादि करनेमें पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं हुई चाहिये. यह दोष तादव-
स्थ्य रहेगा अर्थवादिक फल कल्पनेमें लाघव है (तेन) इसीलिये कईलोग (प्रत्यवाय)
पापोंका ना उत्पन्न होनाही सन्ध्यावन्दनादिका फल मानतेहैं.
एवं “सन्ध्यामुपासते येतु सततं शंसितव्रताः ॥ विधूतपापास्ते
यान्ति ब्रह्मलोकमनामयम्” । एवं “दद्यादहरहः श्राद्धं पितृभ्यः
प्रीतिमावहन्” इत्यादिकमेव फलमस्तु ।
भाषा-एवं “प्रशंसितव्रतवाले पुरुष जो प्रतिदिन सन्ध्या उपासन करते हैं वे
विगतपाप कर सुखरूप ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं” इत्याद अर्थवादबोधक वाक्यों-