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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 350 में से

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पृष्ठ 329

यजेत ' इस विधिवाक्यमें ' श्येन ' नाम कर्मविशेषका है. 'अभिचरन्' नाम शत्रुमर-
णकी कामना करतेहुएका है. समुदितार्थ यह हुआ कि-शत्रुमरणकी कामना करता
हुआ श्येननामक कर्मसे यजन करे, एवं ऐसे स्थलमें विध्यर्थका बलवदनिष्टाननुबन्धि-
त्वरूप विशेषण नहीं है; क्योंकि ' श्येन' नामक कर्मको शत्रुमारणानुकूल व्यापारात्मक
होनेसे हिंसारूपता है और हिंसा नरकका साधन होती है और यदि कहो कि विधिविहित
हिंसा दोषकर नहीं होती क्योंकि हिंसाका निषेधक “ माहिंस्यात् सर्वाभूतानि ” यह
सामान्य वाक्य है. इसलिये विशेषविधिवाक्यविहित यज्ञीय हिंसाको छोड़कर प्रवृत्त
होता है तो यह कथनभी युक्त नहीं क्योंकि “ अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छ्रैर्व्य-
पोहति ” इत्यादिशास्त्रसे ( अभिचार ) मारणादिक्रियाके प्रायश्चित्तका उपदेश है.
अर्थात् यदि यह क्रिया पापजनका न होय तो इसके उद्देश्यसे प्रायश्चित्तका विधानभी
नहीं हुआ चाहिये और यदि कहो कि साक्षात् परम्परासाधारण मारणानुकूलव्यापार
मात्रका नाम यदि ' हिंसा ' होये तो (खङ्ग) तलवार बनानेवालेको तथा कूप लगवा
नेवालेकोभी हिंसाका दोष लगना चाहिये; क्योंकि तलवारसेभी परम्परा कई जीव
मारे जातेंहैं और कूपमेंभी कई जीव मरजातेहैं. एवं यदि कोई भोजनकरणकालमें
गलेमें अन्न रुक जानेसे मरजाय तो उसको आत्महत्याका पाप लगना चाहिये; इस-
लिये साक्षात् परम्परासाधारण मारणानुकूल व्यापारमात्रका नाम 'हिंसा' नहीं, किन्तु
केवल साक्षात् मारणानुकूलव्यापारका नाम'हिंसा' है और श्येनकर्म साक्षात् मारणा-
नुकूलव्यापार नहीं है इसलिये “ मा हिंस्यात् ” इत्यादि निषेधका अविषय होनेसे
बलवदनिष्टका अननुबन्धि है तो यह कथनभी युक्त नहीं; क्योंकि मरणोद्देश्यकत्वरूप
धर्मकोभी क्रियाकी विशेषणता है अर्थात् शत्रुमरणोद्देशेन विधान किया ' श्येन ' नामक
कर्म हिंसारूपही है और यदि कहो कि मरणोद्देश्यका क्रियही यदि हिंसारूप
होय तो जहां मृगादिके उद्देशसे बाण चलाया लगा ब्राह्मणको तो उसके मरनेका
प्रायश्चित नहीं हुआ चाहिये क्योंकि ऐसे स्थलमें ब्राह्मणहिंसारूप क्रियामें ब्राह्मणेद्दे-
श्यकत्वधर्म नहीं है तो यह कथनभी युक्त नहीं क्योंकि ऐसे स्थलमें अज्ञानकृत ब्राह्म-
णवधका तत्तद् वचनविशेषोंद्वारा प्रायश्चित्त ऋषिलोगोंने विधान किया है और ज्ञान-
कृत ब्राह्मणवधका तो “ कामतो ब्राह्मणवधे निष्कृतिर्न विधीयते ” इत्यादि मनुवा-
क्यसे प्रायश्चित्तही नहींहै. भाव यह कि-मरणोद्देश्यकत्वरूप विशेषण हिंसारूपा क्रिया-
में देना व्यर्थ नहीं है.
श्येनवारणायादृष्टाद्वारकत्वेन विशेषणात् । अतएव काशीम-
रणार्थं कृतशिवपूजादेरपि न च हिंसात्वम् ।
१ शिरः कपाली ध्वजवान् भिक्षाशी कर्म वेदयन् ॥ ब्रह्महा द्वादशाब्दानि मितभुक् शुद्धिमा-
प्नुयात् ॥ २४३ ॥ इति याज्ञवल्क्यः ।