न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकार्यताज्ञानमेव हेतुरस्तु,बलवदनिष्टाननुबन्धित्वं चेष्टोत्पत्तिना-
न्तरीयकदुःखाधिकदुःखजनकत्वम्, बलवद्वेषविषयदुःखजनक-
त्वं वेति चेत् । न । इष्टसाधनत्वकृतिसाध्यत्वयोर्युगपज्ज्ञातुमश-
क्यत्वात् । साध्यत्वसाधनत्वयोर्विरोधात् । असिद्धस्य हि साध्य-
त्वं सिद्धस्य च साधनत्वम् । न चैकमेकेनैकदा सिद्धमसिद्धं चे-
ति ज्ञायते, तस्मात्कालभेदादुभयं ज्ञायत इति !
नैयायिक शंका-इसकी अपेक्षासे अर्थात् बलवदनिष्टासम्बन्धित्वविशिष्ट इष्ट-
साधनताज्ञानजन्य कृतिसाध्यताज्ञानकी अपेक्षासे लाघवसे यदि बलवदनिष्टासम्बन्धि
इष्टसाधनताविषयक कार्यताज्ञानको प्रवृत्तिके प्रतिकारण मानलिया जाय तो हानि
क्याहै? यहां इष्टसाधनतामें बलवदनिष्टाननुबन्धित्व यहहै कि-पाकादिष्ट उत्पादनमें
नियमसे होनेवाले धूमादिजन्य दुःखसे अधिक दुःखके जनक न होना अथवा प्रबल द्वेषके
विषय मरणादिजन्य दुःखके जनक न होना एवं कृतिसाध्यताज्ञानमें इष्टसाधनताज्ञान-
जन्यत्व धर्म माननेकी अपेक्षा इष्टसाधनताविषयकत्व धर्म माननेमें लाघव है. क्योंकि
जन्यजनकभाव सर्वत्र अन्यवहित पूर्वोत्तरादिनियमघटित होताहै. इसलिये इसमें उप-
स्थितिकृत गौरव है. प्रभाकर-( इतिचेन्न ) यह कथन आपका योग्य नहीं;क्योंकि-
इष्टसाधनत्वका तथा कृतिसाध्यत्वका पुरुषको एक कालावच्छेदेन ज्ञान होना
असम्भव है. कारण यह कि-साध्यत्व, साधनत्व, ये दोनों धर्म परस्पर विरोधी हैं,
इसलिये एककालमें इन दोनोंका होनाही असम्भव है. क्योंकि, जो अभी सिद्ध न हुआ
होय, उसका नाम ‘ साध्य ’ है. ऐसे प्रथमलक्षणवृत्तिपाकादि हैं और जो किसी एक-
रूपसे सिद्ध होचुका होय, उसका नाम ‘ साधन ’ है. ऐसे अपाकावस्थापन्नपरिष्कृत
तण्डुलादि हैं. एवं एकपुरुष एकवस्तुको एककालावच्छेदेन सिद्धासिद्ध उभयरूपसे
नहीं जानसकता. भाव यह कि-यदि एक वस्तु सिद्धासिद्ध उभयभेदसे ज्ञात होगी तो
उसका “ असिद्धः पाकः कृतिसाध्यः सिद्धश्चेष्टसाधनं ” इत्याकारक समूहालम्बना-
त्मक ज्ञानही कहना होगा. सो बन नहीं सकता; क्योंकि सिद्धत्व असिद्धत्व ज्ञानोंका
परस्पर विरोध है, इसलिये सिद्ध साधन उभयका कालभेदसे ज्ञान माननाही उचितहै.
मैवम् । लाघवेन बलवदनिष्टाननुबन्धीष्टसाधनत्वे सति कृतिसा-
ध्यताज्ञानस्य तत्र हेतुत्वात् । न च साध्यत्वसाधनत्वयोर्विरोधः ।
यदा कदाचित् साध्यत्वसाधनत्वयोरविरोधादेकदासाध्यत्वसाध-
नत्वयोश्च ज्ञानात् ।