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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 350 में से

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पृष्ठ 322

संकेतकल्पिता नूतनलिपिः" पहले पुरुषान्तरकृतिसाध्या कहीं नहीं देखी. एवं यौवना-
वस्थापन्न कामातुर हुए पुरुषनेभी अपनेसे पहले भोग पुरुषान्तरकृतिसाध्य कहीं नहीं
देखा अर्थात् इत्यादिस्थलोंमें नवीन कल्पित कार्यकारणभावका व्यतिरेक व्यभिचार
है, इसलिये उसके सिद्धांतसे प्रवृत्ति नहीं हुई चाहिये, परन्तु होती है, इसलिये नवी-
नकी कल्पना सम्यक् नहीं है.
इदं तु बोध्यम् । इदानीन्तनेष्टसाधनत्वादिज्ञानं प्रवर्तकं तेन भा-
वियौवराज्ये बालस्य न प्रवृत्तिस्तदानीं कृतिसाध्यत्वाज्ञानात् ।
भाषा-(इदन्तु बोध्यम् ) इतना यहां औरभी अधिक जानने योग्य है कि-
वर्तमानकालिक इष्टसाधनत्वादि ज्ञानको प्रवृत्तिमें कारणता है; इसलिये ( भावि )
होनेवाले यौवराज्यमें बालराजपुत्रकी प्रवृत्ति नहीं होसकती क्योंकि उस कालमें उस-
को कृतिसाध्यत्वप्रकारक ज्ञान नहीं है.
एवं तृप्तो भोजने न प्रवर्तते तदानीमिष्टसाधनत्वाज्ञानात् । प्रव-
र्तते च रोषदूषितचित्तो विषादिभक्षणे तदानीं बलवदनिष्टाननु-
बन्धित्वाज्ञानात् ।
भाषा-एवं तृप्तपुरुष भोजन करनेमें प्रवृत्त नहीं होता, क्योंकि उस कालमें उस
को इष्टसाधनत्वप्रकारक ज्ञान नहीं है और क्रोधाक्रान्त होकर पुरुष विषादिभक्षणमें
भी प्रवृत्त होजाता है, क्योंकि उस कालमें उसको विषमें बलवद्अनिष्टासम्बन्धित्व
ज्ञान होता है.
न चास्तिकस्यागम्यागमनशत्रुवधादिप्रवृत्तौ कथं बलवदनिष्टा-
ननुबन्धित्वबुद्धिर्नर कसाधनत्वज्ञानादिति वाच्यम् । उत्कटरा-
गादिना नरकसाधनताधीतिरोधानात् ।
शंका-आस्तिक पुरुषको अगम्या परस्त्री आदिके गमनमें तथा शत्रुवधादिकार्यों-
में प्रवृत्तिसे प्रथम बलवद्अनिष्टासम्बन्धित्वज्ञान कैसे होता है? क्योंकि उसको तो बल-
वत् जो नरकरूपअनिष्ट तत्साधनत्वज्ञान अगम्यागमनादि कुकर्मोंमें सदा बनारहताहै.
समाधान-उस कालमें उसका अगम्यागमनादिजन्य सुखमें अधिक राग होता है
उससे उसकी अगम्यागमनादिमें नरकसाधनताबुद्धिका तिरोधान होजाता है अर्थात्
अगम्यागमनादिजन्य सुखमें उत्कट प्रेमके होनेसे अगम्यागमनादिजन्य नरकमें प्रबल
द्वेष उत्पन्न नहीं होता.
वृष्ट्यादौ तु कृतिसाध्यताज्ञानाभावान्न चिकीर्षाप्रवृत्ती, किन्त्वि-